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आपराधिक कानून
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 311 का उद्देश्य सत्य को उजागर करना है, न कि किसी पक्षकार का पक्ष लेना
«26-Jun-2026
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सी. बनाम राजस्थान राज्य और अन्य "दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 311 का उद्देश्य अभियोजन पक्ष या अभियुक्त के पक्ष में या उसके विरुद्ध निर्णय लेना नहीं है, अपितु किसी मामले में न्यायपूर्ण निर्णय लेने के लिये सत्यता को स्वाभाविक रूप से उजागर करना है।" न्यायमूर्ति अनूप कुमार ढांड |
स्रोत: राजस्थान उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अनूप कुमार धंद ने सी. बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य (2026) के मामले में, दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 311 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 348) के अधीन एक आवेदन को खारिज करने के विचारण न्यायालय के निर्णय को चुनौती देने वाली याचिका को मंजूर करते हुए विचारण न्यायालय को अभियोक्त्री के स्कूल के प्रधानाचार्य को उसके कक्षा प्रथम के प्रवेश अभिलेखों के साथ समन करने का निदेश दिया, यह मानते हुए कि यह प्रावधान सत्यता को उजागर करने के लिये है, न कि अभियोजन पक्ष या अभियुक्त के पक्ष में।
सी. बनाम राजस्थान राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता पर लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) के अधीन एक मामले में आरोप लगाया गया था, जिसमें अभियोक्त्री की आयु अधिनियम की प्रयोज्यता निर्धारित करने के लिये एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न था।
- विचारण न्यायालय ने अभियोक्त्री के कक्षा 4 के प्रवेश पत्र पर विश्वास किया था, जिसमें उसका जन्म वर्ष 2001 दर्ज था, यह साबित करने के लिये कि कथित घटना के समय वह अवयस्क थी।
- याचिकाकर्त्ता ने तर्क दिया कि पीड़िता की आयु के संबंध में विरोधाभासी दस्तावेज़ मौजूद थे: माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा जारी की गई उसकी कक्षा 10 की मार्कशीट में उसका जन्म वर्ष 2000 दर्ज था, और दूसरे स्कूल से प्राप्त कक्षा 1 के प्रवेश पत्र में उसका जन्म वर्ष 1999 दर्ज था।
- इन विरोधाभासों के आधार पर, याचिकाकर्त्ता ने धारा 311 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन एक आवेदन प्रस्तुत किया, जिसमें अभियोक्त्री के कक्षा प्रथम के प्रवेश अभिलेखों के साथ दूसरे स्कूल के प्रधानाचार्य को समन करने की मांग की गई, जिससे यह साबित किया जा सके कि कथित घटना के समय वह व्यस्क थी।
- विचारण न्यायालय ने इस आवेदन को इस आधार पर खारिज कर दिया कि इसे अंतिम बहस के प्रक्रम में, अर्थात् विचारण के "बिल्कुल अंतिम प्रक्रम" में दायर किया गया था।
- इस अस्वीकृति से व्यथित होकर याचिकाकर्त्ता ने राजस्थान उच्च न्यायालय में यह याचिका दायर की।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 311 के उद्देश्य पर : न्यायालय ने कहा कि यह उपबंध न तो अभियोजन पक्ष के पक्ष में है और न ही अभियुक्त के विरुद्ध। इसका एकमात्र उद्देश्य सत्यता को स्वाभाविक रूप से उजागर करना है जिससे न्यायालय मामले में उचित निर्णय ले सके। विचारण की कोई भी अवस्था, जिसमें अंतिम बहस की अवस्था भी शामिल है, इसके प्रयोग में बाधा नहीं है।
- किशोर न्याय अधिनियम के अधीन आयु अवधारण पर: न्यायालय ने किशोर न्याय (देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 94 का हवाला देते हुए कहा कि जहाँ किसी व्यक्ति की आयु पर संदेह करने के लिये उचित आधार हों, वहाँ आयु का अवधारण विद्यालय से प्राप्त जन्म प्रमाण पत्र या संबंधित परीक्षा बोर्ड से प्राप्त मैट्रिकुलेशन या समकक्ष प्रमाण पत्र (यदि उपलब्ध हो) के आधार पर किया जाना चाहिये।
- विरोधाभासी दस्तावेज़ों पर: न्यायालय ने कहा कि अभियोक्त्री की जन्मतिथि के संबंध में विरोधाभासी दस्तावेज़ अभिलेख में विद्यमान थे, और इससे कथित घटना के समय उसकी आयु को लेकर एक वास्तविक विवाद उत्पन्न हो गया।
- स्कूल के अभिलेख मंगवाने के संबंध में: न्यायालय ने माना कि अभियोक्त्री की वास्तविक जन्मतिथि के संबंध में सही तथ्य सामने लाने के लिये, याचिकाकर्त्ता द्वारा धारा 311 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन आवेदन के माध्यम से मांगे गए अनुसार, उसके दूसरे स्कूल के अभिलेख को मंगवाना आवश्यक था।
- विचारण न्यायालय को निदेश देने पर: याचिका को मंजूर करते हुए, न्यायालय ने विचारण न्यायालय के नामंजूरी आदेश को अपास्त कर दिया और उसे संबंधित विद्यालय के प्रधानाचार्य को सुसंगत अभिलेखों के साथ समन करने का निदेश दिया।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 348 क्या है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 348 — आवश्यक साक्षी को समन करने या उपस्थित व्यक्ति की परीक्षा करने की शक्ति:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 348, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की पुरानी धारा 311 के समान है, जिसमें विषयवस्तु में कोई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन नहीं किया गया है।
मुख्य उपबंध:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अंतर्गत किसी भी जांच, विचारण या अन्य कार्यवाही के किसी भी प्रक्रम में कोई भी न्यायालय निम्नलिखित शक्तियों का प्रयोग कर सकता है:
- किसी भी व्यक्ति को साक्षी के रूप में समन कर सकता।
- न्यायालय में उपस्थित किसी भी व्यक्ति परीक्षा कर सकता है, भले ही उसे औपचारिक रूप से साक्षी के रूप में समन न किया गया हो।
- जिन व्यक्तियों की पहले ही परीक्षा हो चुकी है, उन्हें पुन: बुलाना उनकी पुनः परीक्षा कर सकता है।
- यदि किसी व्यक्ति का साक्ष्य मामले के न्यायसंगत निर्णय के लिये आवश्यक प्रतीत होता है, तो न्यायालय (अनिवार्य रूप से) ऐसे किसी भी व्यक्ति को समन करेगा, उसकी परीक्षा करेगा या उसे पुन: बुलाएगा।
दो-भाग संरचना:
- प्रथम भाग विवेकाधीन है - न्यायालय अपनी पहल पर इस शक्ति का प्रयोग कर सकता है।
- द्वितीय भाग अनिवार्य है - न्यायालय उस स्थिति में कार्रवाई करने के लिये बाध्य है जहाँ किसी व्यक्ति का साक्ष्य न्यायसंगत निर्णय के लिये आवश्यक हो।
न्यायिक निर्वचन (धारा 348, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के संदर्भ में समान रूप से लागू):
- इस शक्ति का प्रयोग संयमपूर्वक और सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिये।
- इसका प्रयोग केवल अभियोजन पक्ष या प्रतिरक्षा के मामले में कमियों को भरने या त्रुटियों को सुधारने के लिये नहीं किया जा सकता है।
- इसका उद्देश्य न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति करना है, न कि किसी पक्ष को अपनी त्रुटियों को सुधारने का दूसरा अवसर देना।
- संवेदनशील मामलों में, विशेष रूप से लैंगिक अपराधों के पीड़ितों से जुड़े मामलों में, न्यायलयों को साक्षी को पुन: पेश होने का आदेश देने से पहले बार-बार पेश होने से होने वाली कठिनाई पर विचार करना चाहिये।