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सिविल कानून

केवल सकारात्मक अल्कोहल परीक्षण से दुर्घटना बीमा दावे को खारिज नहीं किया जा सकता

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 29-Jun-2026

यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम सालप्रिया 

"केवल शराब का सेवन करने और 'शराब के प्रभाव में होनेमें बहुत अंतर है। केवल शराब का सेवन करना किसी दावे को खारिज करने के लिये पर्याप्त नहीं है और यह रिकॉर्ड में अभिलिखित किया जाना चाहिये कि व्यक्ति शराब के प्रभाव में था।" 

न्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन 

स्रोत: केरल उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

केरल उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन ने यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम सालप्रिया (2026)के मामले मेंबीमाकर्त्ता द्वारा दायर एक रिट याचिका को खारिज कर दियाजिसमें सकारात्मक विष विज्ञान रिपोर्ट के आधार पर दुर्घटना बीमा दावे को अस्वीकार करने की मांग की गई थी। उन्होंने कहा कि मृतक व्यक्ति के शरीर में शराब की मात्र उपस्थिति "शराब के प्रभाव में" होने के समान नहीं हैजो कि पॉलिसी के अपवर्जन खंड को लागू करने के लिये आवश्यक सीमा है। 

यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम सालप्रिया (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • 30 नवंबर, 2020 को बाबू नाम का एक व्यक्ति सड़क किनारे बेहोश पाया गया और उसे तुरंत इलाज के लिये नेय्यर मेडिसिटी ले जाया गयाअगले दिन उसका निधन हो गया। 
  • उनके विधिक वारिसों ने उनकी मोटरसाइकिल बीमा पॉलिसी के अधीन बीमा दावा दायर कियाजिसमें यह तर्क दिया गया कि उनकी मृत्यु सड़क दुर्घटना का परिणाम थी। 
  • यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी ने तिरुवनंतपुरम स्थित स्थायी लोक अदालत के समक्ष इस दावे का विरोध करते हुए तर्क दिया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु का कारण "कोरोनरी धमनी अवरोध" बताया गया हैन कि दुर्घटना। 
  • बीमा कंपनी ने अमृता इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च सेंटर की एक विष विज्ञान रिपोर्ट पर भी विश्वास कियाजिसमें शराब के लिये सकारात्मक परीक्षण आया थाऔर इसी आधार पर उसने नशे से संबंधित पॉलिसी के अपवर्जन खंड का हवाला दिया। 
  • स्थायी लोक अदालत ने बीमा कंपनी के तर्कों को खारिज कर दिया और विधिक वारिसों को 15 लाख रुपए का प्रतिकर देने का आदेश दिया। 
  • इस निर्णय से व्यथित होकर यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी ने रिट याचिका के माध्यम से केरल उच्च न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • शराब के सेवन और उसके प्रभाव के बीच अंतर:न्यायालय ने माना कि शराब का सेवन करने और शराब के प्रभाव में होने की स्थिति में स्पष्ट और विधिक रूप से महत्वपूर्ण अंतर है। न्यायालय ने कहा कि बीमाकर्त्ता को शराब के सेवन और दुर्घटना के बीच कारण संबंध सिद्ध करना होगाया यह स्थापित करना होगा कि घटना के समय मृतक की मानसिक क्षमताएँ गंभीर रूप से प्रभावित थीं। 
  • बीमाकर्त्ता पर साक्ष्य का भार:न्यायालय ने माना कि केवल सकारात्मक विष विज्ञान रिपोर्ट ही बीमा दावे को अस्वीकार करने के लिये पर्याप्त नहीं है। बीमाकर्त्ता का यह दायित्त्व है कि वह इस बात का पुख्ता सबूत पेश करे कि बीमित व्यक्ति दुर्घटना के समय मत्तता के दशा में था और यह मत्तता ही दुर्घटना या मृत्यु का मुख्य कारण थी 
  • प्रत्यक्ष कारण और अंतर्निहित चिकित्सीय स्थिति के संबंध में:पोस्टमार्टम रिपोर्ट में अवरोधक कोरोनरी धमनी रोग की उपस्थिति का उल्लेख किया गया थासाथ ही यह भी स्पष्ट रूप से अभिलिखित किया गया था कि दुर्घटना में लगी चोटें "मृत्यु को तेज या प्रेरित कर सकती थीं।"अलका शुक्ला बनाम भारतीय जीवन बीमा निगम के मामलेमें उच्चतम न्यायालय के निर्णय के सिद्धांत को लागू करते हुएन्यायालय ने माना कि जहाँ दुर्घटना में लगी चोट प्रत्यक्षत: मृत्यु का कारण बनती हैवहाँ पहले से विद्यमान चिकित्सीय स्थिति बीमाकर्त्ता को उसके संविदात्मक दायित्त्व से मुक्त नहीं करती है। 
  • प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) में मृत्यु का कारण दुर्घटना न बताए जाने पर:न्यायालय ने माना कि मात्र FIR में मृत्यु का कारण सड़क दुर्घटना न बताया जाना बीमा दावे को अस्वीकार करने का पर्याप्त आधार नहीं है। प्रत्येक साक्ष्य पर पोस्टमार्टम रिपोर्ट और चिकित्सा अभिलेखों के आलोक में समग्र रूप से विचार किया जाना चाहिये 
  • अंतिम निर्णय पर:मृतक के शराब के कारण अक्षम होने का कोई ठोस सबूत न मिलने और शराब के सेवन तथा दुर्घटना के बीच कोई कारण संबंध स्थापित न होने के कारणन्यायालय ने रिट याचिका खारिज कर दी और विधिक वारिसों को दिये गए प्रतिकर को बरकरार रखा। 

भारत में ड्राइविंग के लिये अल्कोहल टेस्ट क्या है? 

लागू प्रावधान:धारा 185, मोटरयान अधिनियम, 1988 (मोटर यान (संशोधन) अधिनियम, 2019 द्वारा संशोधित) 

रक्त में अल्कोहल की अनुमेय सांद्रता (BAC) सीमा: 

  • भारत में निजी वाहन चालकों के लिये विधिक BAC सीमा 0.03% हैजो प्रति 100 मिलीलीटर रक्त में 30 मिलीग्राम अल्कोहल के समान है। 
  • वाणिज्यिक वाहन चालकों के लियेअनुमेय सीमा शून्य सहनशीलता है - शरीर में किसी भी मात्रा में अल्कोहल का पता नहीं चलना चाहिये 

परीक्षण विधियाँ: 

  • यातायात पुलिस सांस विश्लेषक का उपयोग करके जांच करती हैजो चालक के सांस के नमूने का विश्लेषण करके रक्त में अल्कोहल की मात्रा मापता है। यदि मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक पाई जाती हैतो आगे की कार्रवाई की जाती है। लड़खड़ाती चाल और अस्पष्ट वाणी जैसे अन्य लक्षणों का भी आकलन किया जाता है। यदि अपराधी सहयोग नहीं करता है या मत्तता में होने से इंकार करता हैतो रक्त परीक्षण भी किया जा सकता है। 

शास्ति (2019 के संशोधन के बाद): 

  • प्रथम बार अपराध करने पर: ₹10,000 का जुर्माना या महीने तक का कारावासया दोनों। 
  • तत्पश्चात् के अपराधों (वर्ष के भीतर): ₹15,000 का जुर्माना और वर्ष तक का कारावासया दोनों। अधिकारियों को ड्राइवर का लाइसेंस निलंबित या रद्द करने का भी अधिकार हैऔर वाहन जब्त किये जा सकते हैं।