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सिविल कानून
यालय वादी को व्यादेश के बदले प्रतिकर स्वीकार करने के लिये बाध्य नहीं कर सकते
« »23-Jun-2026
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रजत कुमार और अन्य बनाम एस.डी. आदर्श जैन कन्या महा विद्यालय सधौरा और अन्य "मूल वादी द्वारा प्रतिवादियों से उनके द्वारा किये गए अतिक्रमण के लिये किसी भी प्रकार की क्षतिपूर्ति या प्रतिकर की मांग नहीं की गई थी।" न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने रजत कुमार और अन्य बनाम एस.डी. आदर्श जैन कन्या महा विद्यालय सधौरा और अन्य (2026) मामले में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के उस निर्णय को अपास्त कर दिया, जिसमें अतिक्रमण हटाने संबंधी डिक्रियों के स्थान पर वादियों को मौद्रिक प्रतिकर देने का उपबंध था। न्यायालय ने यह प्रतिपादित किया कि किसी अपीलीय न्यायालय द्वारा अभिवचनों में प्रार्थित न किये गए अनुतोष को प्रदान करना विधि की दृष्टि से अनुमेय नहीं है।
रजत कुमार और अन्य बनाम एस.डी. आदर्श जैन कन्या महा विद्यालय सधौरा और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- वादी ने प्रत्यर्थियों के विरुद्ध दो सीवी वाद दायर किये, जिनमें कथित रूप से अतिक्रमण करने वाली दीवार और उसके घर की दीवार पर निर्मित चौखट को हटाने की मांग की गई थी।
- विचारण न्यायालय ने दोनों वादों में निर्णय सुनाते हुए ढाँचों को हटाने और आगे निर्माण पर रोक लगाने का आदेश दिया। प्रथम अपील न्यायालय ने इन डिक्रियों को बरकरार रखा।
- द्वितीय अपील में, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने प्रतिवादियों को प्रतिकर देने का निदेश देकर और विवादित दीवार को एक साझा दीवार मानते हुए डिक्रियों में संशोधन किया।
- 2013 में, उच्चतम न्यायालय ने सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 100 के अधीन विधि के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों को तैयार करने में असफलता के कारण उन निर्णयों को अपास्त कर दिया और मामलों को उच्च न्यायालय को वापस भेज दिया।
- पुनर्विचार के लिये भेजे जाने पर, उच्च न्यायालय ने फिर से डिक्री को अपास्त कर दिया और निष्पादन न्यायालय को निर्माणों के मूल्य का आकलन करने और वादियों को प्रतिकर देने का निदेश दिया।
- इससे व्यथित होकर मूल वादी के विधिक वारिसों ने एक बार फिर उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- बिना प्रार्थना के अनुतोष देने पर: न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय ने अपीलकर्त्ता-वादी को मौद्रिक प्रतिकर स्वीकार करने के लिये बाध्य करने में त्रुटी की, जबकि इस प्रकार का कोई अनुतोष अभिवचन की कार्यवाही के किसी भी प्रक्रम पर नहीं मांगा गया था, और इस प्रकार के कदम के लिये विधिक वारिसों की सहमति भी नहीं थी।
- निष्पादन न्यायालय को निदेश देते हुए: न्यायालय ने माना कि एक बार जब उच्च न्यायालय द्वारा वादी के पक्ष में दी डिक्रियों को अपास्त कर दिया गया, तो कोई भी निष्पादन योग्य डिक्री शेष नहीं रही जिससे निष्पादन न्यायालय के लिये दीवार के मूल्य का कोई आकलन करने का कोई अवसर नहीं रह गया।
- सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 21 के दायरे पर: न्यायालय ने टिप्पणी की कि किसी भी डिक्री द्वारा समर्थित न होने पर निष्पादन न्यायालय को दीवार के मूल्य का आकलन करने का निदेश देना सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 21 के अधीन कोई आधार नहीं पाता है।
- पुनर्विचार हेतु पुनः सुनवाई: न्यायालय ने यह देखते हुए कि द्वितीय अपील में उच्च न्यायालय का निर्णय विधिवत नहीं था क्योंकि कोई महत्त्वपूर्ण विधिक प्रश्न नहीं उठाया गया था, उसे धारा 100 सिविल प्रक्रिया संहिता के अनुसार दोनों अपीलों पर पुनर्विचार करने और शीघ्रता से निर्णय लेने का निदेश दिया, यह देखते हुए कि द्वितीय अपील 2008 की हैं।
व्यादेश क्या होता है?
बारे में:
- व्यादेश एक निवारक उपचार है जो किसी अन्य व्यक्ति के कृत्यों से पीड़ित पक्ष को अनुदत्त किया जाता है, जो आगे की क्षति को रोकने के लिये, न्याय के सिद्धांतों पर आधारित, गलत काम करने वाले को ऐसे कृत्यों को जारी रखने से रोकता है।
व्यादेश के प्रकार:
- अस्थायी व्यादेश (सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश 39):
- किसी पक्षकार को किसी विनिर्दिष्ट कार्य को करने से अस्थायी रूप से रोकता है।
- इसे मुकदमे के किसी भी प्रक्रम में प्रदान किया जा सकता है और यह वाद के निपटारे या न्यायालय के अगले आदेश तक प्रभावी रहता है।
- सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 39 के नियम 1 और 2 द्वारा शासित।
- अत्यावश्यक मामलों में, आदेश 39 नियम 3 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन एकपक्षीय अस्थायी व्यादेश जारी किया जा सकता है।
- इस उल्लंघन पर विधिवत 2क सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन संपत्ति की कुर्की और/या तीन महीने तक का सिविल कारावास का दण्ड हो सकता है।
- शाश्वत व्यादेश (विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963):
- यह व्यादेश केवल वाद की सुनवाई एवं गुण-दोष के आधार पर पारित डिक्री द्वारा ही प्रदान किया जाता है।
- यह प्रतिवादी को वादी के अधिकारों के विपरीत किसी अधिकार का दावा करने या कोई कार्य करने से स्थायी रूप से रोकता है।
- विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 38 द्वारा शासित; उपधारा (1) वादी के पक्ष में विद्यमान बाध्यता के भंग को रोकने के लिये अनुदान की अनुमति देता है, चाहे वह अभिव्यक्य हो या विवक्षित हो।
अस्थायी व्यादेश प्राप्त करने के लिये आवश्यक बातें:
- वादी को अपने पक्ष में प्रथम दृष्टया मामला साबित करना होगा।
- यदि व्यादेश नहीं दिया जाता है तो वादी को अपूरणीय क्षति साबित करनी होगी।
- सुविधा का संतुलन वादी के पक्ष में होना चाहिये, जिसमें दोनों पक्षकारों के हितों और लोक हित को ध्यान में रखा जाए।
- वादी को पर्याप्त वैकल्पिक उपचार की अनुपलब्धता को साबित करना होगा ; मौद्रिक प्रतिकर की उपलब्धता वाद की मंजूरी के विरुद्ध एक कारक हो सकती है।