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सांविधानिक विधि

संशोधित चयन सूची में मात्र सम्मिलित होने से कोई निहित अधिकार प्राप्त नहीं होता

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 19-Jun-2026

सेंथिल कुमारन बोस बनाम तमिलनाडु राज्य और अन्य 

"संशोधित चयन सूची में नाम सम्मिलित होने मात्र से किसी भी प्रकार के निहित अधिकार का दावा नहीं किया जा सकताविशेष रूप से तब जब नई चयन प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार छीना नहीं जा रहा हो।" 

न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय केन्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकरकी खंडपीठ नेएस. सेंथिल कुमारन बोस बनाम तमिलनाडु राज्य और अन्य (2026)के मामले मेंमोटरयान निरीक्षक ग्रेड-II के 113 पदों के लिये एक नई भर्ती प्रक्रिया आयोजित करने के मद्रास उच्च न्यायालय के निदेश को बरकरार रखायह मानते हुए कि चयनित सूची में शामिल अभ्यर्थी नियुक्ति के निहित अधिकार का दावा नहीं कर सकते हैं जब अन्य पात्र अभ्यर्थियों के अपवर्जन को दूर करने के लिये एक नए चयन का आदेश दिया जाता है। 

एस. सेंथिल कुमारन बोस बनाम तमिलनाडु राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • वर्ष 2018 में जारी एक अधिसूचना के माध्यम सेतमिलनाडु लोक सेवा आयोग (TNPSC) ने तमिलनाडु परिवहन अधीनस्थ सेवाओं द्वारा की जाने वाली सीधी भर्ती के माध्यम से मोटरयान निरीक्षक ग्रेड-II के 113 पदों को भरने की मांग की थी। 
  • TNPSC को 2176 आवेदन प्राप्त हुएप्रारंभिक जांच के बाद, 1328 अभ्यर्थियों को लिखित परीक्षा में बैठने की अनुमति दी गईऔर अंततः 2019 में एक वर्ष के कार्य अनुभव की आवश्यकता के आधार पर 32 अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिये योग्य पाया गया।  
  • मद्रास उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश ने 24 जनवरी, 2020 के एक आदेश द्वारा इन 32 अभ्यर्थियों के अस्थायी चयन को इस आधार पर अपास्त कर दिया कि उन्होंने उन कार्यशालाओं में कार्य अनुभव प्राप्त किया था जिनके लाइसेंस समाप्त हो चुके थे और सरकार द्वारा नवीनीकृत नहीं किये गए थे। सभी 1328 अभ्यर्थियों के कार्य अनुभव प्रमाण पत्रों के नए सिरे से सत्यापन का निदेश दिया गया। 
  • अपील परखंडपीठ ने कार्य अनुभव संबंधी निदेश को छोड़कर एकल न्यायाधीश के सभी निदेशों को बरकरार रखा। इसे आगे चलकरइलवरसन और अन्य बनाम आर. विजयराज और अन्य के मामलेमें उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई जिसे 2021 में खारिज कर दिया गया। 
  • चयन प्रक्रिया नए सिरे से शुरू की गई और लिखित परीक्षा में प्राप्त अंकों के आधार पर, 2021 में मौखिक परीक्षा के लिये 226 अभ्यर्थियों को बुलाया गया।  
  • इस सूची को दोबारा उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। एकल न्यायाधीश ने TNPSC को चयन प्रक्रिया पूरी करने और अंतिम सूची प्रकाशित करने का निदेश दिया। आगे अपील करने परखंडपीठ ने पूरी भर्ती प्रक्रिया को दोबारा करने का निदेश दियायह दोहराते हुए कि कार्यशालाओं के संचालन के लिये अनुमोदन का नवीनीकरण नहीं हुआ थाऔर परिवहन विभाग के आयुक्त को चार सप्ताह के भीतर भूतलक्षी नवीनीकरण पर निर्णय लेने का निदेश दिया। 
  • पीड़ित अभ्यर्थियों ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया: एक समूह (जो मूल रूप से 32 अभ्यर्थियों की सूची का भाग था) ने अंतिम सूची में शामिल होने की मांग कीजबकि दूसरे समूह (226 अभ्यर्थियों की सूची से) ने नए सिरे से भर्ती प्रक्रिया शुरू करने के उच्च न्यायालय के निदेश को चुनौती दी।  

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • मूल सूची में शामिल 32 अभ्यर्थियों के संबंध में:न्यायालय ने पाया कि मोटर यान रखरखाव विभाग ने सभी संबंधित कार्यशालाओं को भूतलक्षी अनुमोदन प्रदान किया था। पुनः सत्यापन करने परइन अभ्यर्थियों के कार्य अनुभव प्रमाण पत्र योग्य पाए गएऔर न्यायालय ने माना कि वे TNPSC द्वारा प्रकाशित की जाने वाली चयन सूची में शामिल किये जाने के पात्र होंगे।  
  • 226 अभ्यर्थियों की सूची के संबंध में:न्यायालय ने माना कि खंडपीठ द्वारा नई भर्ती का निदेश देना उचित थाक्योंकि कार्यशालाओं की भूतलक्षी स्वीकृति पर निर्णय लंबित होने के कारण अभ्यर्थियों को उनकी अपनी गलती के बिना ही नुकसान उठाना पड़ा था। सरकारी रिकॉर्ड में कार्यशालाओं को हमेशा से ही स्वीकृत दिखाया गया थाऔर नवीनीकरण लंबित रहने के दौरान भी सरकारी वाहनों की मरम्मत वहीं की जा रही थी। नवीनीकरण के समय पर न तो अभ्यर्थियों का और न ही कार्यशालाओं का कोई नियंत्रण थाऔर यह किसी अभ्यर्थी को ऐसी कार्यशालाओं में प्राप्त अनुभव के आधार पर नियोजन प्राप्त करने के अधिकार से वंचित करने का आधार नहीं हो सकता।  
  • राज्य के लिये नीति और दिशा-निर्देश के अभाव में:चूँकि नवीकरण आवेदनों के लंबित रहने के लिये अभ्यर्थियों को दोषी नहीं पाया गयाऔर इस मुद्दे पर किसी निश्चित नीति के अभाव मेंन्यायालय ने राज्य सरकार को नवीकरण प्रदान करने या अस्वीकार करने के संबंध में भूतलक्षी प्रभाव से निर्णय लेने के निदेश को बरकरार रखा।  
  • निहित अधिकारों के संबंध में:न्यायालय ने माना कि संशोधित चयन सूची में नाम सम्मिलित होने मात्र से नियुक्ति का निहित अधिकार प्राप्त नहीं हो जाताविशेषकर तब जब नई चयन प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार न छीना गया हो। न्यायालय को खंडपीठ के नए भर्ती अभियान के निदेश में हस्तक्षेप करने का कोई उचित कारण नहीं मिला। 
  • अंकों के प्रकटीकरण के संबंध में:न्यायालय ने उच्च न्यायालय के उस निदेश को भी बरकरार रखा कि जनहित मेंचयनित न होने वाले अभ्यर्थियों के अंकों का प्रकटन किया जाना चाहिये 

निहित अधिकार क्या है? 

बारे में: 

  • एकनिहित अधिकारवह अधिकार है जो किसी व्यक्ति में स्थिरपूर्ण और स्थापित हो चुका हैइस प्रकार कि यह किसी भविष्य की घटना या स्थिति पर निर्भर नहीं करता है और सामान्यत: विधि की उचित प्रक्रिया के बिना इसे छीना नहीं जा सकता है। 
  • एक बार कोई अधिकार "प्राप्त" हो जाने परवह धारक के विधिक हक का भाग बन जाता हैजो इसे मात्र अपेक्षाआशा या आकस्मिक दावे से अलग करता है। 

मुख्य विशेषताएँ: 

  • पूर्ण और तत्काल – आकस्मिक अधिकार (जो किसी अनिश्चित भविष्य की घटना पर निर्भर करता है) के विपरीतनिहित अधिकार वर्तमान में लागू करने योग्य होता हैभले ही इसका वास्तविक प्रयोग या भोग भविष्य की किसी तिथि तक स्थगित कर दिया जाए। 
  • मनमानी से वंचित किये जाने से संरक्षित – किसी निहित अधिकार को सामान्यत: बाद के किसी विधिनियम या कार्यकारी कार्रवाई द्वारा भूतलक्षी रूप से नहीं छीना जा सकता हैजब तक कि ऐसा करने के लिये स्पष्ट विधायी आशय और अधिकार न हो। 
  • "अपेक्षा" से अंतर – केवल पात्र होनाकिसी प्रक्रिया में अभ्यर्थी होना या किसी लाभ की आशा रखना स्वतः ही किसी निहित अधिकार का सृजन नहीं करता। कोई अधिकार तभी निहित होता है जब उसके प्राप्ति की सभी शर्तें पूरी हो जाती हैं।