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सिविल कानून

प्रलक्षित पूर्व-न्याय उपेक्षा से छोड़े गए आधारों को रोकता है

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 15-Jun-2026

मकरध्वज राम बनाम जगदीश राय (मृत) उनके विधिक उत्तराधिकारियों और अन्य 

"यह सिद्धांत उन मामलों में भी समान रूप से लागू होता है जहाँ उपेक्षाअनभिज्ञता या दुर्घटना के कारण वह आधार नहीं उठाया गया जिसे उठाया जा सकता था और उठाया जाना चाहिये था। दूसरे शब्दों में, 'उचित थाऔर 'लागू होना चाहिये थाका सिद्धांत बिना किसी अपवाद के पूर्ण बल के साथ लागू होता है। इसलियेसंबंधित पक्ष इन त्रुटियों को अपने जोखिम पर करता है।" 

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ मकरध्वज राम बनाम जगदीश राय (मृत) उनके विधिक उत्तराधिकारियों और अन्य (2026)के मामले में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 11 के अधीन प्रलक्षित पूर्व-न्याय के मार्गदर्शक सिद्धांतों का सारांश प्रस्तुत किया। न्यायालय ने दोहराया कि पक्षकारों को वे सभी आधार उठाने होंगे जो पूर्ववर्ती कार्यवाही में उठाए जा सकते थे और उठाए जाने चाहिये थेऔर वे लोप को उपेक्षाअसावधानी या दुर्घटना का कारण बताकर इस सिद्धांत के प्रभाव से बच नहीं सकते। 

  • इन सिद्धांतों को दोहराते हुएन्यायालय ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के उस निर्णय को अपास्त कर दियाजिसमें प्रलक्षित पूर्व-न्याय के आधार पर स्वामित्व की घोषणा के लिये दायर एक वाद को खारिज कर दिया गया थायह मानते हुए कि इस मामले के तथ्यों पर सिद्धांत को गलत तरीके से लागू किया गया था।  

मकरध्वज राम बनाम जगदीश राय (मृत) उनके विधिक उत्तराधिकारियों और अन्य (2026)के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी 

  • यह विवाद उस जमीन से संबंधित था जो मूल रूप से महावीर राय की थी। जुलाई 1960 मेंउन्होंने 95.80 एकड़ जमीन अपनी माता राज मोहानी उर्फ ​​रूपझारी और अपने पुत्र मकरध्वज राम को अंतरित कर दी थी। 
  • अप्रैल 1962 मेंमहावीर रायउनकी पत्नी गुलमती और उनकी माता ने महावीर के चचेरे भाई रामभजन के पक्ष में एक सामान्य अधिकार पत्र निष्पादित किया। उस अधिकार का प्रयोग करते हुएरामभजन ने जनवरी 1969 में 21.43 एकड़ भूमि प्रेम प्रकाश को और फरवरी 1969 में 33.76 एकड़ भूमि चंद्र साव को बेच दी। बाद में जून 1969 में यह अधिकार पत्र रद्द कर दिया गया। 
  • दो विक्रय विलेख को चुनौती देने वाले दो वाद खारिज कर दिये गए। बाद मेंजब रामभजन ने राजस्व अभिलेखों में अपना नाम अभिलिखित कराने के लिये रजिस्ट्रीकरण करायातो मकरध्वज राम ने शेष भूमि पर स्वामित्व और कब्जे की घोषणा के लिये एक नया वाद संस्थित किया। 
  • विचारण न्यायालय ने मई 1993 में वाद को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निर्णय दिया कि मकरध्वज राम दावा की गई 95.80 एकड़ भूमि में से 43.69 एकड़ भूमि के हकदार हैं। अपील परछत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने द्वितीय अपील में इस निर्णय को अपास्त कर दिया और वाद को प्रलक्षित पूर्व-न्याय के आधार पर खारिज कर दियाक्योंकि मकरध्वज राम पूर्ववर्ती कार्यवाही में 1960 के अंतरण विलेख के आधार पर स्वामित्व का दावा कर सकते थे। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • प्रलक्षित पूर्व-न्याय के प्रयोजन पर:न्यायालय ने माना कि इस सिद्धांत का उद्देश्य पक्षकारों को उचित प्रक्रम में सभी उपलब्ध आधारों को प्रस्तुत करने के लिये बाध्य करके मुकदमेबाजी की बहुलता को रोकना है। यह लोक नीति और इस सिद्धांत पर आधारित है कि किसी व्यक्ति को एक ही प्रकार के मुकदमे के लिये दो बार तंग नहीं किया जाना चाहिये 
  • रिट कार्यवाही पर लागू होने के संबंध में:न्यायालय ने पुनः पुष्टि की कि प्रलक्षित पूर्व-न्याय न केवल सिविल कार्यवाही पर अपितु भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 और 32 के अधीन रिट कार्यवाही पर भी लागू होता है। 
  • काल्पनिक अवधारणा और उसकी सीमाओं पर:न्यायालय ने पाया कि यद्यपि प्रलक्षित पूर्व-न्याय विधि में एक काल्पनिक अवधारणा हैलेकिन इसका अनुप्रयोग एकसमान नहीं है और यह प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता हैजिसमें पूर्व की कार्यवाही के दायरे और छोड़े गए विवाद्यक तथा उसमें शामिल विवाद के बीच संबंध को ध्यान में रखा जाता है।  
  • " Ought" (करना चाहिये था)" के अर्थ पर: "संभवतः" और "चाहिये" वाक्यांश में "चाहिये" अभिव्यक्ति को स्पष्ट करते हुएन्यायालय ने कहा कि सीमा मात्र संभावना से कहीं अधिक है। किसी आधार को उठाया जाना चाहिये था या नहींइसका आकलन युक्तियुक्त तत्परता और मुकदमे के वैध दायरे के परिप्रेक्ष्य से किया जाना चाहिये।  
  • उपेक्षा या अनपेक्षित लोप को बहाना न मानने के संबंध में:न्यायालय ने माना कि यह सिद्धांत उन मामलों में भी समान रूप से लागू होता है जहाँ उपेक्षाअनपेक्षित लोप या दुर्घटना के कारण कोई आधार छूट गया हो। ऐसे मामलों मेंवादी लोप के परिणामों को भुगतता है और ऐसी त्रुटियाँ अपने जोखिम पर करता है। 
  • उच्च न्यायालय द्वारा गलत तरीके से लागू किये जाने पर:न्यायालय ने उच्च न्यायालय के तर्क से असहमति जताते हुए कहा कि मकरध्वज राम का बड़े भूभाग पर स्वामित्व 1960 के विलेख के आधार पर निर्विवाद रूप से उनके पक्ष में स्थापित था। पूर्ववर्ती वाद विशेष रूप से रामभजन द्वारा पावर ऑफ अटॉर्नी के अधीन किये गए अंतरणों के विरुद्ध थेऔर उन कार्यवाही में शेष भूमि पर स्वामित्व की घोषणा की मांग करने का कोई अवसर नहीं था। इस प्रकार के स्वामित्व को साबित करने की आवश्यकता तभी उत्पन्न हुई जब रामभजन ने विक्रय संव्यवहार में शामिल भूमि से अधिक भूमि पर अपने नाम का रजिस्ट्रीकरण कराने की मांग की। 
  • पारिवारिक संपत्ति विवादों में निष्पक्षता के संबंध में:न्यायालय ने पाया कि मामले के तथ्यों पर प्रलक्षित पूर्व-न्याय लागू करने से अनुचित रूप से कठोर और अन्यायपूर्ण परिणाम निकलेंगेजो विधि और निष्पक्षता दोनों के विरुद्ध होंगे। न्यायालय ने यह भी कहा कि पारिवारिक संपत्ति विवादों से निपटने वाले न्यायालयों को आसपास के तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार किये बिना विधिक सिद्धांतों को कठोरता से लागू नहीं करना चाहिये 

प्रलक्षित पूर्व-न्याय का सिद्धांत क्या हैं? 

प्रलक्षित पूर्व-न्यायसिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 11 और स्पष्टीकरण 4 के अंतर्गत आता है। यह सिद्धांत न केवल उन विवाद्यकों को रोकता है जो पूर्ववर्ती की कार्यवाही में वास्तव में उठाए और तय किये गए थेअपितु उन विवाद्यकों को भी रोकता है जिन्हें उठाया जा सकता था और उठाया जाना चाहिये था। 

उच्चतम न्यायालय ने मार्गदर्शक सिद्धांतों को निम्नलिखित रूप में संक्षेप में प्रस्तुत किया: 

  • प्रलक्षित पूर्व-न्याय यह अनिवार्य करता है कि पूर्ववर्ती कार्यवाही में जिन सभी आधारों का उपयोग किया जा सकता था और किया जाना चाहिये थाउनका प्रयोग किया जाना चाहियेजिससे कार्यवाही की बहुलता से बचा जा सके। 
  • यह विधि की एक काल्पनिक अवधारणा हैलेकिन इसका अनुप्रयोग एकसमान नहीं है और यह प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता हैजिसमें पूर्व की कार्यवाही के दायरे और छोड़े गए मामले और विवाद की प्रकृति के बीच संबंध को ध्यान में रखा जाता है। 
  • यह सिद्धांत लोक नीति और इस सिद्धांत पर आधारित है कि किसी व्यक्ति को एक ही प्रकार के वाद के लिये दो बार तंग नहीं किया जाना चाहिये। यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 और 32 के अंतर्गत आने वाली कार्यवाही पर समान रूप से लागू होता है। 
  • " might and ought" (कर सकते थे और करना चाहिए था)" वाक्यांश में "ought" शब्द मात्र संभावना से परे एक सीमा का संकेत देता है। 
  • मुकदमेबाजी करने वाले पक्षकारों से उचित सावधानी बरतने की अपेक्षा की जाती है। इसी परिप्रेक्ष्य से न्यायालयों को यह आकलन करना चाहिये कि विवाद से उत्पन्न होने वाले सभी विवाद्यकजिन्हें उठाया जाना चाहिये थावास्तव में उठाए गए थे या नहीं। 
  • यह सिद्धांत उन मामलों में भी समान रूप से लागू होता है जहाँ उपेक्षाउपेक्षा या दुर्घटना के कारण वह आधार नहीं उठाया गया जिसे उठाया जा सकता था और उठाया जाना चाहिये था। "उठाया जा सकता था" और "उठाया जाना चाहिये था" की शर्तें संचयी रूप से और बिना किसी अपवाद के लागू होती हैंऔर पक्षकार ऐसी त्रुटियाँ अपने जोखिम पर करता है। 

प्रलक्षित पूर्व-न्याय क्या है 

  • प्रलक्षित पूर्व-न्याय का सिद्धांतपूर्व-न्याय के सिद्धांत का ही विस्तार है। 
  • विधि में इस सिद्धांत की उत्पत्ति सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 11 के साथ पढ़े गएआदेश नियम 2 में निहित उपबंधों में पाई जा सकती है। 
  • सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 11 मेंपूर्व-न्याय का सिद्धांत निहित हैजिसके अनुसारयदि पहले से ही समान विवाद्यक से संबंधित और समान पक्षकारों के बीच कोई वाद चलाया जा चुका हैतो समान पक्षकारों के बीच किसी दावे के संबंध में बाद में दायर किया गया वाद वर्जित है। 
  • सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 11 में संलग्नस्पष्टीकरण 4 में यह उपबंध है कि कोई भी मामला जिसे पूर्ववर्ती वाद में प्रतिरक्षा या आक्रमण का आधार बनाया जा सकता था या बनाया जाना चाहिये थाउसे ऐसे वाद में प्रत्यक्ष और सारतः विवाद का मामला माना जाएगा। 
  • माननीय उच्चतम न्यायालय ने नागभूषण बनाम कर्नाटक राज्य (2011)के मामले मेंयह निर्णय दिया कि सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 11 के स्पष्टीकरण 4 में वर्णित प्रलक्षित पूर्व-न्याय का सिद्धांत रिट याचिकाओं पर लागू होता है।