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आपराधिक कानून

पक्षद्रोही साक्षियों की उपस्थिति के होते हुए भी डीएनए साक्ष्य ने लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत अभियुक्त की दोषसिद्धि की पुष्टि की

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 06-Jun-2026

मुरुगन बनाम राज्य 

"विचारण न्यायालय ने DNA रिपोर्ट पर विश्वास करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचने में पूरी तरह से सही काम किया कि बालक अपीलकर्त्ता और पीड़ित लड़की से पैदा हुआ था और इसने स्पष्ट रूप से पीड़ित लड़की के विरुद्ध लैंगिक उत्पीड़न के आरोप को साबित करने के लिये आधारभूत तथ्य प्रदान किया।" 

न्यायमूर्ति एन. आनंद वेंकटेश और न्यायमूर्ति के.के. रामकृष्णन 

स्रोत: मद्रास उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ के न्यायमूर्ति एन. आनंद वेंकटेश और न्यायमूर्ति के.के. रामकृष्णन की खंडपीठ नेमुरुगन बनाम राज्य (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि अवयस्क पीड़िता से जन्मे बच्चे के पितृत्व को स्थापित करने वाले फोरेंसिक DNA साक्ष्यलैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 की धारा 5()(ii) के अधीन दोषसिद्धि को बरकरार रखने के लिये पर्याप्त हैंभले ही विचारण के दौरान पीड़िता और उसके माता-पिता ने विरोध जताया हो। न्यायालय ने दोषसिद्धि को बरकरार रखालेकिन दण्ड को आजीवन कारावास से संशोधित करके बीस वर्ष के कठोर कारावास में परिवर्तित कर दिया और साथ ही सहायक साक्ष्यों के अभाव में धारा 506 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन दोषसिद्धि को अपास्त कर दिया। 

मुरुगन बनाम राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह मामला 2020 की शुरुआत में दायर कराए गए एक परिवाद से प्रारंभ हुआजिसमें एक तेरह वर्षीय लड़की के साथ बार-बार लैंगिक उत्पीड़न किया गया था। पीड़िता के गर्भवती होने का पता चलने परउसकी माता ने पुलिस में औपचारिक परिवाद दर्ज करायाजिसके परिणामस्वरूप लगभग चालीस वर्ष के अभियुक्त मुरुगन को गिरफ्तार किया गया। 
  • विचारण के दौरानपीड़िता और उसके परिवार के सदस्य पक्षद्रोही हो गए और अभियोजन पक्ष के मामले से काफी हद तक अलग हो गएजिससे दोषसिद्धि को चुनौती मिली। यद्यपिविचारण न्यायालय ने फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला द्वारा प्रस्तुत DNA रिपोर्ट पर विश्वास कियाजिससे यह साबित हुआ कि पीड़िता से पैदा हुए बच्चे का पिता अभियुक्त ही थाऔर उसे लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन आजीवन कारावास का दण्ड दिया 
  • अभियुक्त ने मद्रास उच्च न्यायालय में दोषसिद्धि और दण्ड को चुनौती दीयह तर्क देते हुए कि पीड़िता और उसके माता-पिता की पक्षद्रोही परिसाक्ष्य ने अभियोजन पक्ष के मामले को अस्थिर बना दिया है और इसके अलावा अभिरक्षा श्रृंखला में कथित कमियों और दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 207 के अधीन दस्तावेज़ों को प्रस्तुत करने में प्रक्रियात्मक अनियमितताओं के आधार पर DNA साक्ष्य पर भी प्रश्न उठाया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • DNA साक्ष्य के प्रमाणिक महत्त्व पर:न्यायालय ने माना कि पितृत्व स्थापित करने वाली सकारात्मक DNA रिपोर्ट निर्णायक फोरेंसिक साक्ष्य है जो लैंगिक उत्पीड़न के मामले में दोषसिद्धि को बरकरार रखने में सक्षम हैभले ही प्रत्यक्ष पक्षद्रोही साक्षियों के परिसाक्ष्यों के कारण कमजोर पड़ जाए। फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला के उप निदेशक (PW13) ने विचारण न्यायालय के समक्ष DNA परिणामों की पर्याप्त व्याख्या की थीऔर वे निष्कर्ष निर्विवाद रहे। 
  • अभिरक्षा श्रृंखला की अखंडता पर:न्यायालय ने वर्तमान मामले को करनदीप शर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य के मामले से अलग बतायाजिसमें दूषित संग्रह प्रक्रियाओं के कारण DNA साक्ष्य को खारिज कर दिया गया था। वर्तमान मामले मेंबच्चे के जन्म के बाद रक्त के नमूने उचित सावधानी के साथ एकत्र किये गए और उनका प्रबंधन किया गयाऔर कार्यवाही के किसी भी प्रक्रम में अभियुक्त द्वारा संग्रह प्रक्रिया के संबंध में कोई आपत्ति नहीं उठाई गई थी। इसलिये न्यायालय ने अभिरक्षा श्रृंखला को देर से दी गई चुनौती को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया।      
  • पीड़ित के धारा 164 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन दिये गए कथन पर:न्यायालय ने माना कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के अधीन पीड़ित द्वारा अभिलिखित किया गया स्वैच्छिक कथन बरकरार है और इसका उपयोग अभिलेख पर विद्यमान अन्य साक्ष्यों के खंडन और पुष्टि दोनों के लिये किया जा सकता हैजिससे DNA रिपोर्ट के साथ-साथ अभियोजन पक्ष के मामले को बनाए रखने के लिये एक अतिरिक्त आधार मिलता है। 
  • दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 207 के अधीन प्रक्रियात्मक आपत्ति पर:न्यायालय ने पाया कि अभियुक्त को विशेषज्ञ साक्षियों से प्रतिपरीक्षा करने का पर्याप्त अवसर दिया गया था और उसने वास्तव में उस अधिकार का प्रयोग किया था। इसलियेदण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 207 के अधीन दस्तावेज़ों को प्रस्तुत करने संबंधी आपत्ति को खारिज कर दिया गया क्योंकि इससे अभियुक्त को कोई नुकसान नहीं हुआ था।  
  • दण्ड में संशोधन:लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 5()(ii) के अधीन दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुएन्यायालय ने दण्ड सुनाते समय संतुलित दृष्टिकोण अपनाया। साक्षियों के पक्षद्रोही स्वभाव और विचारण की समग्र परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुएन्यायालय ने आजीवन कारावास के दण्ड को बीस वर्ष के कठोर कारावास में संशोधित किया। आपराधिक अभित्रास के लिये भारतीय दण्ड संहिता की धारा 506 के अधीन दोषसिद्धि को साक्ष्य के अभाव में अपास्त कर दिया गयाक्योंकि पीड़िता के पक्षद्रोही परिसाक्ष्य से उस आरोप की पुष्टि नहीं हो पाई थी 
  • तदनुसारन्यायालय ने लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन दोषसिद्धि को बरकरार रखादण्ड को संशोधित करके बीस वर्ष के कठोर कारावास में परिवर्तित कर दिया और धारा 506 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन दोषसिद्धि को अपास्त कर दिया। 

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO), 2012 क्या है? 

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 का परिचय 

क्रमांक 

पहलू 

जानकारी 

  1.  

शीर्षक 

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 

  1.  

अधिनियम संख्या 

अधिनियम सं. 32, 2012 

  1.  

अधिनियमित होने की तिथि 

19 जून, 2012 

  1.  

प्रवर्तन की तिथि  

14 नवंबर, 2012 

  1.  

स्थानीय विस्तार 

यह अधिनियम संपूर्ण भारत पर लागू होता है। 

  1.  

उद्देश्य 

लैंगिक हमलालैंगिक उत्पीड़न और अश्लील साहित्य के अपराधों से बालकों का संरक्षण करने और ऐसे अपराधों का विचारण करने के लिये विशेष न्यायालयों की स्थापना तथा उनसे संबंधित या आनुषंगिक विषयों के लिये उपबंध करने के लिये अधिनियम 

  1.  

कुल धाराएँ एवं कुल अध्याय 

कुल धाराएँ46 

कुल अध्याय: 9 

  1.  

महत्त्वपूर्ण संशोधन 

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2019 अधिनियमन की तिथि5 अगस्त 2019 

प्रवर्तन की तिथि 

16 अगस्त, 2019 

महत्त्वपूर्ण धाराएँ: 

  • धारा 2(1)(घ): "बालक की परिभाषा" - 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति को बालक के रूप में परिभाषित किया गया है। 
  • धारा 3: "प्रवेशन लैंगिक हमला" - इसमें किसी बालक के शारीरिक छिद्रों में लिंग या गैर-लिंग द्वारा प्रवेश करने का कोई भी कृत्यया बालक के लैंगिक अंगों पर मुँह लगाना शामिल हैचाहे वह प्रत्यक्ष रूप से किया गया हो या बालक को यह कृत्य करने के लिये विवश करके किया गया हो। 
  • धारा 4: " प्रवेशन लैंगिक हमला के लिये दण्ड" - कम से कम 10 वर्ष का कारावासजिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है। यदि बालक 16 वर्ष से कम आयु का हैतो न्यूनतम कारावास 20 वर्ष है। 
  • धारा 5: "गुरुतर प्रवेशन लैंगिक हमला" - यह तब लागू होता है जब अपराध किसी लोक सेवकसशस्त्र बलों के सदस्यगिरोहरिश्तेदार या विश्वास के पद पर आसीन व्यक्ति द्वारा किया जाता हैया जिसके परिणामस्वरूप गर्भावस्था, HIV, घोर उपहति या मृत्यु होती हैया बालक 12 वर्ष से कम आयु का होता है। 
  • धारा 6: " गुरुतर प्रवेशन लैंगिक हमले के लिये दण्ड" - कम से कम 20 वर्ष का कठोर कारावासजिसे आजीवन कारावास या मृत्युदण्ड तक बढ़ाया जा सकता हैऔर पीड़ित को पुनर्वास के लिये जुर्माना देय होगा। 
  • धारा 7: "लैंगिक हमला" — इसमें बच्चे के जननांगों को छूना या लैंगिक आशय से किया गया कोई भी शारीरिक संपर्क शामिल हैजिसमें प्रवेशन शामिल नहीं है। त्वचा से त्वचा का संपर्क आवश्यक नहीं हैलैंगिक असशी ही निर्णायक कारक है। 
  • धारा 8: "लैंगिक हमले के लिये दण्ड" - कम से कम वर्ष का कारावासजिसे वर्ष तक बढ़ाया जा सकता हैऔर जुर्माना। 
  • धारा और 10: "गुरुतर लैंगिक हमला और उसका दण्ड" - धारा में लैंगिक हमले के मामले में धारा के समान गुरुतर परिस्थितियों का उल्लेख है। धारा 10 में से वर्ष तक के कारावास और जुर्माने का उपबंध है। 
  • धारा 11 और 12: "लैंगिक उत्पीड़न और उसका दण्ड" - धारा 11 में लैंगिक आशय से इशारे करनाबार-बार संपर्क करनाधमकी देना या बहकाना जैसे कृत्य शामिल हैं। धारा 12 में वर्ष तक की कारावास और जुर्माने के उपबंध है। 
  • धारा 13-15: "बाल अश्लीलता" - धारा 13 अश्लील प्रयोजनों के लिये बालक के उपयोग को दण्डनीय बनाती है। धारा 14 में से वर्ष के कारावास का उपबंध है। धारा 15 ऐसी सामग्री के भंडारण को दण्डनीय बनाती हैऔर वाणिज्यिक कब्जे के लिये दण्ड का प्रावधान अधिक है। 
  • धारा 16-18: "दुष्प्रेरण और प्रयत्न" - अधिनियम के अधीन किसी भी अपराध को करने के लिये दुष्प्रेरण और प्रयत्न करना स्वतंत्र रूप से दण्डनीय हैजिसमें मूल अपराध के लिये निर्धारित अधिकतम दण्ड के आधे तक का दण्ड दिया जा सकता है। 
  • धारा 19 और 21: "अनिवार्य रिपोर्टिंग" - धारा 19 के अधीन किसी भी अपराध की जानकारी रखने वाले व्यक्ति के लिये पुलिस को इसकी सूचना देना अनिवार्य है। धारा 21 के अधीन सूचना न देना दण्डनीय अपराध हैयद्यपि बालकों को इससे छूट दी गई है। 
  • धारा 28 और 35: "विशेष न्यायालय और समय सीमा" - धारा 28 प्रत्येक जिले में एक विशेष न्यायालय की नियुक्ति अनिवार्य करती है। धारा 35 के अनुसारसाक्ष्य 30 दिनों के भीतर दर्ज किये जाने चाहिये और संज्ञान प्राप्त होने के एक वर्ष के भीतर विचारण पूर्ण होना चाहिये 
  • धारा 29 और 30: "उपधारणा" - यह माना जाता है कि अभियुक्त ने अपराध किया है और उसने दोषी मानसिक स्थिति के साथ काम किया हैजब तक कि उचित संदेह से परे अन्यथा साबित न हो जाए। 
  • धारा 33 और 36: "बाल-हितैषी विचारण" — धारा 33 बाल-हितैषी न्यायालय वातावरण अनिवार्य करती हैआक्रामक पूछताछ पर रोक लगाती है और बालक की पहचान की सुरक्षा करती है। धारा 36 परिसाक्ष्य के दौरान बालक को अभियुक्त के सीधे संपर्क में आने से रोकती है।