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आपराधिक कानून

किशोर न्याय अधिनियम की धारा 74

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 20-Jul-2026

गिरीश पाटिल और अन्य. बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य 

"यह ध्यान में रखना आवश्यक है कि बालक कई मामलों के प्रति संवेदनशील होते हैं और समाचार पत्र में उनका नाम प्रकाशित करना और बालक से संबंधित किसी भी घटना को प्रचारित करनाभले ही बालक पीड़ित होसदैव बालक के हित में नहीं हो सकता है।" 

न्यायमूर्ति अनंत रामनाथ हेगड़े 

स्रोत: कर्नाटक उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति अनंत रामनाथ हेगड़े की एकल न्यायाधीश पीठ नेगिरीश पाटिल और अन्य बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य (2026) के मामलेमेंएक पत्रकार और एक कन्नड़ दैनिक के संपादक द्वारा दायर आपराधिक याचिका को खारिज कर दियाजिन पर हमले के शिकार एक बालक की पहचान उजागर करने वाली समाचार रिपोर्ट प्रकाशित करने का आरोप था। पीठ ने यह माना कि मीडिया बालक के हित में किये जाने के आधार पर बालक की पहचान प्रकाशित नहीं कर सकता हैऔर किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 74(1) के अधीन चल रहे अभियोजन को बरकरार रखा। 

गिरीश पाटिल बनाम कर्नाटक राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • जनवरी 2020 मेंकन्नड़ डेली ने एक स्कूल में हुई घटना के बारे में एक समाचार रिपोर्ट प्रकाशित कीजिसमें एक शिक्षक पर एक अवयस्क छात्र के साथ कथित तौर पर मारपीट करने का आरोप लगाया गया था और बालक की पहचान का प्रकटन किया गया था। 
  • किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 74(1) के अधीन रिपोर्टर और संपादक के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई और उसके बाद उनके विरुद्ध अन्वेषण पूर्ण कर लिया गया 
  • इस कथित अपराध के संबंध में दांडेली मजिस्ट्रेट कोर्ट में आपराधिक कार्यवाही लंबित थी। 
  • रिपोर्टर और संपादक ने लंबित कार्यवाही को रद्द करने की मांग करते हुए कर्नाटक उच्च न्यायालय का रुख कियायह तर्क देते हुए कि रिपोर्ट बालक के लिये न्याय सुनिश्चित करने के लिये प्रकाशित की गई थीन कि अवयस्क की छवि को धूमिल करने के लिये 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • धारा 74(1) के दायरे पर:न्यायालय ने माना कि किसी भी समाचार पत्रपत्रिकासमाचार पत्रऑडियो-विजुअल मीडिया या संसूचना के अन्य रूप में किसी भी जांचअन्वेषण या न्यायिक कार्यवाही के संबंध में कोई भी रिपोर्ट विधि का उल्लंघन करने वाले बालकदेखरेख और संरक्षण की आवश्यकता वाले बालकया अपराध के पीड़ित या साक्षी बालक का नामपतास्कूल या कोई अन्य विवरण प्रकट नहीं करेगी जिससे उसकी पहचान हो सकेन ही बालक की तस्वीर प्रकाशित की जाएगी। 
  • बालकों की श्रेणियों के संबंध में:न्यायालय ने माना कि धारा 74 के अधीन निषेध इस बात पर लागू होता है कि बालक पीड़ित हैसाक्षी है या विधि का उल्लंघन करने वाले बालक हैऔर यहाँ तक ​​कि जहाँ बालक पीड़ित हैवहाँ भी बालक का नाम प्रकट नहीं किया जा सकता है।  
  • "बाल हित" की प्रतिरक्षा पर:न्यायालय ने याचिकाकर्त्ता के इस तर्क को खारिज कर दिया कि बाल हित में प्रकाशन एक वैध प्रतिरक्षा हो सकती हैयह मानते हुए कि याचिकाकर्त्ता 2015 अधिनियम की धारा 74 के उद्देश्य और विधायी आशय को ध्यान में रखते हुए ऐसी प्रतिरक्षा नहीं उठा सकते। 
  • इस प्रतिबंध के पीछे के तर्क पर:न्यायालय ने माना कि बालक अपने से जुड़ी घटनाओं के प्रचार के प्रति संवेदनशील होते हैंऔर ऐसा प्रचारभले ही बालक पीड़ित होसदैव बालक के हित में नहीं होता हैक्योंकि बालक उस पर इस प्रकार से प्रतिक्रिया दे सकता है जो उसके अपने हित में न हो। 
  • किशोर न्याय अधिनियम के उद्देश्य पर:न्यायालय ने माना कि 2015 के अधिनियम का उद्देश्य विधि का उल्लंघन करने वाले विधि का उल्लंघन करने वाले बालकबालकों और देखरेख और संरक्षण की आवश्यकता वाले बालकों के लिये व्यापक उपबंध प्रदान करना हैजिससे बाल-हितैषी दृष्टिकोण अपनाकर देखरेखसंरक्षणविकासउपचार और सामाजिक पुनर्एकीकरण के माध्यम से उनकी मूल आवश्यकताओं को सुनिश्चित किया जा सके। 
  • अनुतोष प्रदान करने पर:याचिकाकर्त्ताओं के तर्कों में कोई योग्यता न पाते हुएन्यायालय ने आपराधिक याचिका खारिज कर दी और किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 74(1) के अधीन चल रहे अभियोजन को बरकरार रखा। 

किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 74 क्या है? 

किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 का परिचय 

क्रमांक 

पहलू 

जानकारी 

1. 

शीर्षक 

किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 

2.  

अधिनियम संख्या 

अधिनियम संख्या 02 वर्ष 2015 

3. 

अधिनियमित होने की तिथि 

31 दिसंबर, 2015 

4.  

Date of Enforcement 

15 जनवरी, 2016 

5.  

 
स्थानीय सीमा 

यह विधि जम्मू और कश्मीर के पूर्ववर्ती राज्य के सिवाय पूरे भारत पर लागू होती है (अब यह पूरी तरह से लागू है)। 

6.  

उद्देश्य 

विधि से संघर्षरत पाए गए अथवा विधि का उल्लंघन करने वाले आरोपित बालकों तथा देखरेख एवं संरक्षण की आवश्यकता वाले बालकों से संबंधित विधि का उपबंध करनाजिससे उनकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति समुचित देखरेखसंरक्षणविकासउपचार तथा सामाजिक पुनर्समेकन के माध्यम से की जा सकेबालकों के सर्वोत्तम हित को दृष्टिगत रखते हुएमामलों के न्यायनिर्णयन एवं निस्तारण में बालक-अनुकूल दृष्टिकोण अपनाया जा सकेतथा इस अधिनियम के अधीन उपबंधित प्रक्रियाओं एवं स्थापित संस्थाओं तथा निकायों के माध्यम से उनके पुनर्वास को सुनिश्चित किया जा सकेऔर उनसे संबद्ध अथवा आनुषंगिक विषयों का भी उपबंध किया जा सके।  

7.  

संघटन 

कुल धाराएँ112 

कुल अध्याय: 10 

8.  

महत्त्वपूर्ण संशोधन 

किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) (संशोधन) अधिनियम, 2021 

अधिनियमित होने की तिथि: 7 अगस्त, 2021 

प्रवर्तन की तिथि: 1 सितंबर, 2022 

अधिनियम की धारा 74: 

धारा 74 – बालक की पहचान का प्रकटन का प्रतिषेध: 

  • उपधारा (1) – किसी जांच या अन्वेषण या न्यायिक प्रक्रिया के बारे में किसी समाचारपत्रपत्रिका या समाचार पृष्ठ या दृश्य-श्रव्य माध्यम या संचार के किसी अन्य रूप में की किसी रिपोर्ट में ऐसे नामपते वा विद्यालय या किसी अन्य विशिष्ट को प्रकट नहीं किया जाएगाजिससे विधि का उल्लंघन करने वाले बालक या देखरेख और संरक्षण की आवश्यकता बाले बालक या किसी पीड़ित बालक या किसी अपराध के साक्षी कीजो तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन ऐसे मामले में अंतर्वलित हैपहचान हो सकती है और न ही ऐसे किसी बालक का चित्र प्रकाशित किया जाएगा। परंतु यथास्थितिजांच करने वाला बोर्ड या समितिऐसा प्रकटनलेखबद्ध किये जाने वाले ऐसे कारणों से तब अनुज्ञात कर सकेगीजब उसकी राय में ऐसा प्रकटन बालक के सर्वोत्तम हित में हो 
  • उपधारा (2) – पुलिसचरित्र प्रमाणपत्र के प्रयोजन के लिये या अन्यथा बालक के किसी अभिलेख का लंबित मामलों में या ऐसे मामले में प्रकटन नहीं करेगी जिसमें कि मामला बंद किया जा चुका हो या उसका निपटारा किया जा चुका हो 
  • उपधारा (3) – दण्डउपधारा (1) के उपबंधों का उल्लंघन करने वाला कोई व्यक्ति ऐसे कारावास मेंजिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी वा जुर्माने सेजो दो लाख तक का हो सकेगा या दोनों में दण्डनीय होगा