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आपराधिक कानून

उच्चतम न्यायालय ने विचाराधीन बंदियों को छोड़ने हेतु जिला समितियों के प्रभावी कार्यान्वयन का निदेश दिया

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 03-Sep-2026

सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो एवं अन्य 

"हमने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया है कि जिला स्तरीय अधिकार प्राप्त समितियों (DLECs) की बैठकें नियमित रूप से आयोजित नहीं की जा रही हैंजैसा कि दिनांक 02.12.2025 के संशोधित SOP में अनिवार्य किया गया है।" 

न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले 

उच्चतम न्यायालय  

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ नेसतेंद्र कुमार अंतिल बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो और अन्य (2026)में एक विविध आवेदन की सुनवाई करते हुए सभी राज्यों को जिला स्तरीय अधिकार प्राप्त समितियों (DLECs) के नियमित कामकाज को सुनिश्चित करने का निदेश दिया और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) को यह सुनिश्चित करने का निदेश दिया कि जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSAs) पर्याप्त कदम उठाएं जिससे वित्तीय/सामाजिक स्थिति रिपोर्टों के अभाव में मामले लंबित न रहें। 

सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (2022) के मामले मेंउच्चतम न्यायालय ने पात्र विचाराधीन बंदियों को छोड़ने के लिये एक तंत्र बनाने का निदेश दिया था जिससे उन्हें अनावश्यक रूप से अभिरक्षा में न रखा जाए। 
  • जमानत बंधपत्र के लिये पैसे न होने के कारण जेल में सड़ रहे विचाराधीन बादियों की सहायता के लियेकेंद्र ने "गरीब बंदियों को सहायता" योजना शुरू कीजिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी बंदी केवल वित्तीय अभाव के कारण जेल में न रहे। 
  • दिसंबर, 2025 को न्यायालय द्वारा रिकॉर्ड में ली गई योजना के अधीनविचाराधीन बंदियों के मामलों की परीक्षा करने और निर्धारित दिशानिर्देशों और दिसंबर, 2025 की संशोधित मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) के अनुसार उनकी रिहाई के लिये पात्रता का आकलन करने के लिये जिला स्तरीय अधिकार प्राप्त समितियों (DLECs) का गठन किया गया था। 
  • 18 अगस्त 2026 को हुई सुनवाई के दौरानइस मामले में न्यायालय-मित्र (Amicus Curiae) के रूप में उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने न्यायालय के संज्ञान में समिति के निर्देशों एवं सुझावों के अनुपालन न किए जाने के कई मामलों को लायाविशेष रूप से पंजाब और महाराष्ट्र से संबंधित मामलों को।  
  • उत्तर प्रदेश द्वारा न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत आंकड़ों से पता चला कि बैठकें आयोजित होने के बावजूद कई मामले जिला स्तरीय अधिकार प्राप्त समितियों (DLECs) के समक्ष लंबित बने हुए हैं। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं 

  • मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) के अनुपालन न होने पर: 
    न्यायालय ने पाया कि संशोधित SOP दिनांक दिसंबर, 2025 के अधीन अनिवार्य रूप से जिला स्तरीय अधिकार प्राप्त समितियों (DLECs) की बैठकें नियमित रूप से आयोजित नहीं की जा रही थींऔर निर्देश दिया कि सभी जिला स्तरीय अधिकार प्राप्त समितियों (DLECs) नियमित रूप से बैठक करें और उनके समक्ष विचाराधीन मामलों पर निर्णय लेंऔर अनुपालन की रिपोर्ट अगली सुनवाई की तारीख से पहले एमिकस को दी जाए।  
  • बैठकों के होते हुए भी लंबित मामलों पर: 
    न्यायालय ने उत्तर प्रदेश द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों पर ध्यान दियाजिसमें दिखाया गया कि कई मामले जिला स्तरीय अधिकार प्राप्त समितियों (DLECs) के समक्ष लंबित रहेभले ही बैठकें हो चुकी थींजो बैठकों के आयोजन और व्यक्तिगत मामलों पर वास्तविक निर्णय लेने के बीच अंतर को दर्शाता है।  
  • वित्तीय/सामाजिक स्थिति रिपोर्टों के न मिलने के कारण विलंब: 
    न्यायालय ने पाया कि कई मामलों मेंसंबंधित जिला विधि सेवा प्राधिकरणों से वित्तीय/सामाजिक स्थिति रिपोर्ट प्राप्त न होने के कारण विचाराधीन बंदियों को छोड़ने पर विचार में विलंब हो रहा थाऔर तदनुसार NALSA को निदेश दिया कि वह सुनिश्चित करे कि सभी जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSAs) पर्याप्त कदम उठाएं जिससे ऐसी रिपोर्टों के अभाव में मामले लंबित न रहें। 
  • अनुपालन की रिपोर्टिंग के संबंध में: 
    न्यायालय ने निदेश दिया कि उसके निर्देशों के अनुपालन की रिपोर्ट अगली सुनवाई की तारीखजो अक्टूबर, 2026 को निर्धारित हैसे पहले प्रस्तुत की जाए। 

"गरीब बंदियों को सहायता" योजना क्या है? 

पृष्ठभूमि एवं उद्देश्य: 

  • यह योजना केंद्र सरकार द्वारा उन विचाराधीन बंदियों की सहायता के लिये शुरू की गई थी जो केवल इसलिये रिहा नहीं हो पा रहे हैं क्योंकि उनके पास जमानत बंधपत्र या प्रत्याभूति पेश करने के लिये धन की कमी है। 
  • इसका उद्देश्य सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (2022) के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्देशों को प्रभावी बनाना हैजिसमें विचाराधीन बंदियों को अनावश्यक रूप से अभिरक्षा में रखे जाने से रोकने के लिये एक संरचित तंत्र की मांग की गई थी। 

संस्थागत तंत्र: 

  • योजना के अधीन रिहाई के पात्र विचाराधीन बंदियों के मामलों की परीक्षा और निर्णय लेने के लिये जिला स्तर पर जिला स्तरीय अधिकार प्राप्त समितियों (DLECs) का गठन किया गया है।  
  • दिसंबर, 2025 की संशोधित मानक संचालन प्रक्रिया में यह निर्धारित किया गया है कि DLECs को किस प्रकार कार्य करना हैजिसमें बैठकों की आवृत्ति और निर्णय लेने की समयसीमा शामिल है। 
  • जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSAs) विचाराधीन बंदियों की वित्तीय/सामाजिक स्थिति रिपोर्ट तैयार करने और प्रस्तुत करने के लिये उत्तरदायी हैंजो NALSA के समग्र पर्यवेक्षण के अधीन DLECs द्वारा रिहाई के लिये पात्रता का आकलन करने का आधार बनती हैं। 

विचाराधीन बंधी कौन होते हैं? 

  • विचाराधीन बंदी वह व्यक्ति होता है जिसे गिरफ्तार किया गया है और अन्वेषणजांच या विचारण की लंबितता के दौरान न्यायिक अभिरक्षा में हैलेकिन अभी तक उस पर लगाए गए अपराध के लिये उसे दोषी नहीं ठहराया गया है। 
  • भारत की जेलों में बंद बंदियों की संख्या सबसे अधिक हैऔर बिना विचारण या दोषसिद्धि के लंबे समय तक कारावास संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के संबंध में चिंताएं उत्पन्न करता है। 

भारत में विचाराधीन बंदियों से संबंधित उपबंध क्या हैं? 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 479: 

  • इसका उद्देश्य विचाराधीन बंदियों की लंबे निरोध को कम करना हैजिसमें विशेष रूप से प्रथम बार अपराध करने वालों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। 
  • प्रथम बार अपराध करने वालों के लिये शिथिल मानक:प्रथम बार अपराध करने वालेअर्थात ऐसे व्यक्ति जिनका कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं हैअपराध के लिये विहित अधिकतम दण्ड का एक तिहाई हिस्सा पूरा करने के बाद जमानत पर छोड़ने के हकदार हैं। 
  • जमानत के लिये साधारण नियम:गैर-मृत्युदंडीय अपराधों (ऐसे अपराध जिनके लिये मृत्युदण्ड या आजीवन कारावास का दण्ड नहीं है) के अभियुक्त विचाराधीन बंदी अपराध के लिये विहित अधिकतम दण्ड का आधा हिस्सा पूरा करने के बाद जमानत के पात्र होते हैं। 
    • यह उपबंध दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 436क पर आधारित हैजिसमें इसी प्रकार अधिकतम दण्ड की आधी अवधि पूरी करने के बाद छोड़ने की अनुमति दी गई थी। 
  • अपवाद:ये शिथिल उपबंध उन मामलों में लागू नहीं होते जहाँ अभियुक्त एकाधिक अपराधों में शामिल हो या जहाँ उसके विरुद्ध एक से अधिक मामलों में अन्वेषणजांच या विचारण लंबित हो। 

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 436: 

  • जमानत की पात्रता:विचाराधीन बंदीजिसने कथित अपराध के लिये निर्धारित अधिकतम कारावास अवधि के आधे समय तक निरोध में बिताया हैप्रतिभू के साथ या बिना प्रतिभू के व्यक्तिगत बंधपत्र पर छोड़ने का हकदार है। 
  • अपवर्जन :यह उपबंध उन अपराधों पर लागू नहीं होता जिनके लिये मृत्युदण्ड एक दण्ड के रूप में निर्धारित है। 

न्यायपालिका के निदेश: 

  • जेल की स्थितियों पर उच्चतम न्यायालय की जनहित याचिका (2013): 1382 जेलों में अमानवीय स्थितियों के संबंध मेंउच्चतम न्यायालय ने भीड़भाड़विलंबित विचारणों और विचाराधीन बंदियों की लंबे निरोध सहित प्रणालीगत विवाद्यकों पर प्रकाश डाला और राज्य सरकारों को दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 436क के अधीन पात्र विचाराधीन बंदियों की समय पर पहचान और रिहाई सुनिश्चित करने का निदेश दिया। 
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 479 का भूतलक्षी अनुप्रयोग: 
    उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 479 के अधीन शिथिल जमानत प्रावधान इसके अधिनियमन से पहले दायर किये गए मामलों पर भूतलक्षी रूप से लागू होंगे। 
  • अनुच्छेद 21 के एक पहलू के रूप में त्वरित विचारण : 
    न्यायालय ने इस बात पर बल दिया है कि त्वरित विचारण संविधान के अनुच्छेद 21 से प्राप्त एक मौलिक अधिकार हैऔर विचारण में कोई भी अनुचित विलंब स्वयं जमानत देने का आधार बन सकता है।