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सिविल कानून
स्वभावतः अवधारणीय संविदा का विनिर्दिष्ट पालन प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता
«29-Aug-2026
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मेसर्स सदा आनंद डेवलपर्स बनाम श्री बालाजी रियल्टी "समझौता ज्ञापन की प्रकृति ही ऐसी है कि इसे समाप्त किया जा सकता है, इसलिये इसके विनिर्दिष्ट पालन पर बल नहीं दिया जा सकता है।" न्यायमूर्ति आरती साठे |
बॉम्बे उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति आरती साठे ने मेसर्स सदा आनंद डेवलपर्स बनाम श्री बालाजी रियल्टी (2026) के मामले में अपील को मंजूर करते हुए विचारण न्यायालय के उस आदेश को अपास्त कर दिया, जिसमें अपीलकर्त्ता को कुछ अंतरणीय विकास अधिकारों (TDR) से निपटने से रोक दिया गया था। उन्होंने कहा कि चूँकि अंतर्निहित समझौता ज्ञापन स्वाभाविक रूप से समाप्त होने योग्य था, इसलिये इसके विनिर्दिष्ट पालन पर बल नहीं दिया जा सकता था और परिणामस्वरूप, अंतरिम व्यादेश के माध्यम से इसे संरक्षित नहीं किया जा सकता था।
मेसर्स सदा आनंद डेवलपर्स बनाम श्री बालाजी रियल्टी (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह विवाद 13 जुलाई, 2022 के एक करार से उत्पन्न हुआ, जिसके अधीन प्रत्यर्थी ने अपीलकर्त्ता से 5,200 वर्ग मीटर के अंतरणीय विकास अधिकार (TDR) खरीदने पर सहमति व्यक्त की थी।
- समझौते ज्ञापन के अधीन, अपीलकर्त्ता को निर्धारित अवधि के भीतर विकास अधिकार प्रमाण पत्र (DRC) प्राप्त करना आवश्यक था।
- चूँकि अपीलकर्त्ता DRC प्राप्त करने में असमर्थ था, इसलिये उसने 18 अक्टूबर, 2023 को एक नोटिस जारी कर समझौता ज्ञापन को रद्द कर दिया।
- इसके बाद प्रत्यर्थी ने 5वें संयुक्त सिविल न्यायाधीश से संपर्क किया, जिसने 14 फरवरी, 2025 के आदेश द्वारा अपीलकर्त्ता को TDR में किसी भी तीसरे पक्ष के हित को अंतरित करने, बेचने या बनाने से अस्थायी रूप से रोक दिया।
- अपीलकर्त्ता ने आदेश से अपील के माध्यम से इस आदेश को चुनौती दी, यह तर्क देते हुए कि समझौता ज्ञापन के खंड 4A और 4B में रद्द करने या निर्धारित अवधि के भीतर DRC प्राप्त करने में विफलता की स्थिति में प्रत्यर्थी द्वारा भुगतान की गई राशि की वापसी का प्रावधान था, और यह कि समझौता ज्ञापन, अपनी प्रकृति से ही, एक अवधारणीय दस्तावेज था, जो इसे विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 14(घ) के अधीन अप्रवर्तनीय बनाता है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- समझौता ज्ञापन की प्रकृति एक समाप्ति योग्य संविदा के रूप में:
न्यायालय ने समझौता ज्ञापन के खंड 4A और 4B को पुनः प्रस्तुत किया और समग्र रूप से उनका निर्वचन करते हुए कहा कि इन दोनों खंडों को अलग-अलग नहीं पढ़ा जा सकता है और संयुक्त रूप से पढ़ने पर समझौता ज्ञापन स्वाभाविक रूप से समाप्ति योग्य है, क्योंकि पक्षकारों को इसे समाप्त करने का कोई कारण बताने की आवश्यकता नहीं है और समाप्ति की शर्तें स्वयं संविदा के भीतर परिकल्पित हैं। - विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम की धारा 14(घ) के अधीन वजर्न पर:
न्यायालय ने माना कि एक बार जब कोई संविदा स्वाभाविक रूप से समाप्त होने योग्य पाई जाती है, तो उसमें निहित दायित्वों को विशेष रूप से लागू करने के लिये विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम के प्रावधानों को लागू नहीं किया जा सकता है, और ऐसी संविदा के विनिर्दिष्ट पालन पर बल नहीं दिया जा सकता है। - विचारण न्यायालय द्वारा अंतरिम व्यादेश दिये जाने पर:
न्यायालय ने माना कि ऐसी कोई मौजूदा संपत्ति या किसी संपत्ति से बेदखली का खतरा नहीं था जिसके लिये संरक्षण की आवश्यकता हो, और विचारण न्यायालय ने समझौता ज्ञापन की प्रवर्तनीयता पर प्रथम दृष्ट्या राय बनाए बिना सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 39 नियम 1 के अधीन अधिकारिता का प्रयोग करने में त्रुटि की थी। - विचरण न्यायालय के दृष्टिकोण की शुद्धता पर:
न्यायालय ने पाया कि विचारण न्यायालय ने समझौते की समाप्ति योग्य प्रकृति के संबंध में अपीलकर्त्ता के तर्क पर कोई निष्कर्ष दिये बिना सीधे आदेश 39 नियम 1 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन व्यादेश जारी कर दिया था, और इसे एक गलत दृष्टिकोण माना। - न्यायालय ने तदनुसार दिनांक 14 फरवरी, 2025 के विवादित आदेश को अपास्त कर दिया और आदेश के विरुद्ध अपील को मंजूर कर लिया।
विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 के अंतर्गत अवधारणीय संविदा क्या है?
पृष्ठभूमि एवं उद्देश्य:
- विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 14 उन संविदाओं की श्रेणियों को सूचीबद्ध करती है जिन्हें विशिष्ट रूप से लागू नहीं किया जा सकता है।
- धारा 14 का खंड (घ) ऐसी संविदा के विनिर्दिष्ट पालन पर रोक लगाता है जो अपनी प्रकृति में ही समाप्त करने योग्य है - अर्थात्, ऐसी संविदा जिसे कोई भी पक्ष बिना कोई कारण बताए समाप्त कर सकता है, जहाँ समाप्ति की शर्तें स्वयं संविदा में निहित हों।
- इसके पीछे तर्क यह है कि न्यायालय किसी ऐसे दायित्व के पालन को बाध्य नहीं करेगा या व्यादेश के माध्यम से उसकी रक्षा नहीं करेगा जिसे कोई पक्षकार संविदा की शर्तों के अधीन समाप्त करने के लिये स्वतंत्र है।