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आपराधिक कानून
पुलिस गर्भाधान-पूर्व और प्रसव-पूर्व निदान-तकनीक अधिनियम के अधीन अपराधों के लिये प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं कर सकती और न ही अन्वेषण कर सकती है
« »20-Aug-2026
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उत्तर प्रदेश राज्य बनाम बृज पाल सिंह "पुलिस को इस अधिनियम के अधीन अपराधों का अन्वेषण करने का अधिकार नहीं है।" न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने उत्तर प्रदेश राज्य बनाम बृज पाल सिंह (2026) के मामले में यह अभिनिर्धारित किया कि पुलिस गर्भाधान पूर्व एवं प्रसवपूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम, 1994 (PC & PNDT Act) के अधीन अपराधों के लिये प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं कर सकती और प्राथमिक अन्वेषण प्राधिकरण के रूप में कार्य नहीं कर सकती, और यह स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट पुलिस चार्जशीट के आधार पर ऐसे अपराध का संज्ञान नहीं ले सकता।
उत्तर प्रदेश राज्य बनाम बृज पाल सिंह (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह मामला इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 30 सितंबर 2024 के एक निर्णय से उत्पन्न हुआ, जिसमें पुलिस की FIR दर्ज करने और गर्भाधान पूर्व एवं प्रसवपूर्व निदान तकनीक अधिनियम के अधीन अपराधों का अन्वेषण करने की शक्तियों के दायरे से संबंधित तीन प्रश्न उच्चतम न्यायालय को भेजे गए थे।
- ये प्रश्न अधिनियम की धारा 27 (अधिनियम के अंतर्गत घोषित अपराध संज्ञेय, अजमानतीय और अश्मनीय हैं) और धारा 28 (उचित प्राधिकारी, अधिकृत अधिकारी या 15 दिन का पूर्व नोटिस देने वाले व्यक्ति के परिवाद के अलावा संज्ञान का वर्जन) के बीच परस्पर संबंध पर आधारित थे।
- मुख्य विवाद्यक यह था कि क्या धारा 27 के अधीन अपराधों को संज्ञेय घोषित करने से पुलिस को FIR दर्ज करने और उसके अन्वेषण करने की अनुमति स्वतंत्र रूप से मिल जाती है, या क्या धारा 28 की विशेष प्रक्रिया कार्यवाही शुरू करने को अधिनियम के अधीन विहित तंत्र तक ही सीमित रखती है।
- वरिष्ठ अधिवक्ता मुक्ता गुप्ता ने एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड नितिन सलूजा के साथ एमिकस क्यूरी के रूप में न्यायालय की सहायता की।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- केवल संज्ञेय अपराध होने के आधार पर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने पर: न्यायालय ने माना कि अधिनियम की धारा 27 और 28 की भाषा, अधिनियम के अन्य प्रावधानों के साथ-साथ इसके सामाजिक हित और संवेदनशीलता एवं चिकित्सा-तकनीकी विशेषज्ञता को ध्यान में रखते हुए, यह दर्शाती है कि पुलिस को अधिनियम के अंतर्गत अपराधों की अन्वेषणकर्त्ता के रूप में नियुक्त नहीं किया गया है। पुलिस द्वारा दर्ज की गई FIR को अधिनियम में विहित प्रक्रिया के अनुसार उसके तार्किक निष्कर्ष तक नहीं पहुँचाया जा सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह निर्बंधन केवल गर्भाधान पूर्व एवं प्रसवपूर्व निदान तकनीक अधिनियम के अंतर्गत आने वाले अपराधों पर लागू होता है और पुलिस को सामान्य आपराधिक विधि के अंतर्गत स्वतंत्र अपराधों का अन्वेषण और अभियोजन से नहीं रोकता है।
- अधिनियम के अंतर्गत परिवादों का अन्वेषण कौन कर सकता है: न्यायालय ने माना कि अधिनियम की धारा 17(4) के अधीन परिवादों के अन्वेषण का दायित्व समुचित प्राधिकारी पर है। न्यायालय ने नियम 18क(3)(iv) का भी हवाला दिया, जो सांविधिक रूप से प्रभावी है और यह अनिवार्य करता है कि जहाँ तक संभव हो पुलिस की सहायता लेने से बचा जाए। अतः पुलिस अधिनियम के अंतर्गत मुख्य अन्वेषण प्राधिकारी नहीं हो सकता और वह केवल अनुपूरक भूमिका निभा सकता है, वह भी तब जब अधिनियम के अनुसार समुचित प्राधिकारी द्वारा इसकी आवश्यकता हो।
- पुलिस चार्जशीट के आधार पर संज्ञान लेना: न्यायालय ने माना कि धारा 28 संज्ञान लेने के लिये एक पूर्ण सांविधिक तंत्र प्रदान करती है, जो केवल उस उपबंध में विशेष रूप से निर्धारित स्थितियों के अधीन है। परिणामस्वरूप, एक सक्षम मजिस्ट्रेट पुलिस अन्वेषण के बाद दायर आरोपपत्र के आधार पर अधिनियम के अधीन किसी अपराध का संज्ञान नहीं ले सकता।
- मामले के निपटारे पर: न्यायालय ने मामले को विधि के अनुसार निर्णय लेने के लिये इलाहाबाद उच्च न्यायालय को वापस भेज दिया।
गर्भाधान पूर्व एवं प्रसवपूर्व निदान तकनीक अधिनियम, 1994 क्या है?
- यह क्या है: एक संसदीय अधिनियम जिसका उद्देश्य कन्या भ्रूण हत्या पर अंकुश लगाना और प्रसवपूर्व लिंग अवधारण पर प्रतिबंध लगाकर भारत के घटते लिंग अनुपात को रोकना है।
- उद्देश्य: गर्भाधान से पूर्व या पश्चात में लिंग चयन तकनीकों पर प्रतिबंध लगाना और लिंग-चयनात्मक गर्भपात के लिये प्रसवपूर्व निदान तकनीकों के दुरुपयोग को रोकना।
मुख्य उपबंध :
- यह विधि प्रसवपूर्व निदान तकनीकों (जैसे, अल्ट्रासाउंड) के उपयोग को विनियमित करता है, और उन्हें केवल आनुवंशिक असामान्यताओं, चयापचय संबंधी विकारों, गुणसूत्र संबंधी असामान्यताओं, कुछ जन्मजात विकृतियों, हीमोग्लोबिनोपैथी और लिंग-संबंधी विकारों का पता लगाने की अनुमति देता है।
- यह विधेयक किसी भी प्रयोगशाला, केंद्र या क्लिनिक को भ्रूण का लिंग अवधारण करने के लिये अल्ट्रासोनोग्राफी सहित कोई भी परीक्षण करने से रोकता है।
- यह विधि किसी भी माध्यम से (शब्दों, संकेतों या अन्य किसी भी तरीके से) गर्भवती महिला या उसके रिश्तेदारों को भ्रूण के लिंग के बारे में सूचित करने पर रोक लगाता है।
- प्रसवपूर्व/गर्भाधानपूर्व लिंग अवधारण सुविधाओं के लिये किसी भी रूप में (मुद्रित, इलेक्ट्रॉनिक, होर्डिंग, दीवार पेंटिंग, सिग्नल, ध्वनि आदि) विज्ञापन प्रतिबंधित है, जिसके लिये 3 वर्ष तक के कारावास और 10,000 रुपए के जुर्माने का प्रावधान है।
इस अधिनियम के अंतर्गत अपराध:
- अपंजीकृत संस्थानों में प्रसवपूर्व निदान तकनीकों का संचालन करना या उसमें सहायता करना।
- किसी पुरुष या महिला के लिंग का चयन।
- अधिनियम में निर्दिष्ट उद्देश्यों के अलावा अन्य उद्देश्यों के लिये प्रसवपूर्व निदान तकनीकें करना।
- अधिनियम के उल्लंघन में अल्ट्रासाउंड मशीनों या भ्रूण के लिंग का पता लगाने में सक्षम किसी भी उपकरण की बिक्री, वितरण, आपूर्ति या किराए पर देना।