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सांविधानिक विधि

परिसीमन की संघीय दुविधा

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 17-Aug-2026

स्रोत:द हिंदू 

परिचय 

तमिलनाडु विधानसभा ने हाल ही में एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार से लोकसभा सीटों की संख्या को मौजूदा 543 पर ही स्थिर रखने और राज्यवार सीटों के वर्तमान वितरण को बनाए रखने का आग्रह किया है। प्रस्ताव में लोकसभा और राज्यसभा सीटों के बीच मौजूदा 2.2:1 के अनुपात को बनाए रखने की भी वकालत की गई है और 2029 के चुनाव से लोकसभा में महिलाओं के लिये एक तिहाई आरक्षण लागू करने की मांग की गई हैलेकिन इसे किसी भी भावी जनगणना या परिसीमन से नहीं जोड़ा जाना चाहिये 

परिसीमन क्या है? 

  • परिसीमन से तात्पर्य प्रत्येक राज्य में लोकसभा और विधानसभाओं के लिये क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीटों की संख्या और सीमाओं को निर्धारित करने की प्रक्रिया से है। 
  • यह प्रक्रियापरिसीमन आयोगद्वारा संपन्न की जाती हैजिसका गठन संसद के एक अधिनियम के अधीन किया जाता है। 
  • सीटों की संख्या पिछली बार 1971 की जनगणनाके आधार पर निर्धारित की गई थी जब जनसंख्या 54.8 करोड़ थीजिसका अर्थ है कि प्रति निर्वाचन क्षेत्र औसतन 10.1 लाख व्यक्ति थे। 
  • यह संख्या 42वें संशोधन अधिनियम (2000 तक) के बाद से स्थिर रही हैऔर 84वें संशोधन अधिनियम (2026 तक) द्वारा इसे आगे बढ़ाया गया थामुख्य रूप से जनसंख्या नियंत्रण उपायों को प्रोत्साहित करने के लिये जिससे उच्च जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों को अतिरिक्त सीटें न मिलें। 
  • 2023 के 106वें सांविधानिक संशोधनके अधीनसंसद ने लोकसभा और विधान सभाओं में महिलाओं के लिये एक तिहाई सीटों के आरक्षण का प्रावधान किया हैजिसे 2026 के बाद (2027 में अपेक्षित) आयोजित जनगणना के आधार पर परिसीमन के माध्यम से लागू किया जाएगा। 

सांविधानिक आधार: 

  • संविधान के अनुच्छेद 81(2)में उपबंधित किया है कि किसी राज्य की सीटों की संख्या और जनसंख्या के बीच का अनुपातजहाँ तक संभव होसभी राज्यों के लिये समान होगा - जो " एक व्यक्ति–एक मत–एक मूल्य" के सिद्धांत को दर्शाता है।  
  • मूल रूप सेलोकतंत्र का अर्थ है "जनता का शासन," और इस बहुसंख्यक सिद्धांत का उद्देश्य विधायी प्रतिनिधित्व में आनुपातिक रूप से परिवर्तित होना है। 

इसमें सम्मिलित विवाद्यक   

प्रतिनिधित्व असंतुलन: 

  • पिछले पाँच दशकों में जनसंख्या वृद्धि असमान रही हैजिसमें उत्तर प्रदेशबिहारमध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में केरलतमिलनाडुकर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों की तुलना में कहीं अधिक वृद्धि देखी गई है।  
  • मौजूदा सीटों और 2026 की अनुमानित जनसंख्या के बीच का वर्तमान अनुपात " एक व्यक्ति–एक मत–एक मूल्य" सिद्धांत को संतुष्ट नहीं करता है:  
    • केरल में वोटों का मूल्य सबसे अधिक है (1.0, जिसे आधार माना गया है)जबकि उत्तर प्रदेश (0.56) और बिहार (0.53) जैसे राज्यों में वर्तमान वितरण के अधीन वोटों का मूल्य आनुपातिक रूप से कम आंका गया है। 
  • इसके विपरीतयदि वर्तमान जनसंख्या के आधार पर सीटों की संख्या बढ़ाकर 848 कर दी जाए (जैसा कि मिलान वैष्णव और जेमी हिंटसन द्वारा किये गए कार्नेगी एंडोमेंट शोध में बताया गया है)तो दक्षिणी राज्योंछोटे उत्तरी राज्यों और उत्तर पूर्वी राज्यों में सीटों का आनुपातिक अंश घट जाएगा: 
    • उत्तर प्रदेश का अंश 14.7% से बढ़कर 16.9% हो जाएगाऔर बिहार का अंश 7.4% से बढ़कर 9.3% हो जाएगा। 
    • केरल का अंश 3.7% से घटकर 2.4% हो जाएगाऔर तमिलनाडु का अंश 7.2% से घटकर 5.8% हो जाएगा। 
  • इससे संघीय सिद्धांतों के साथ सीधा तनाव उत्पन्न होता हैक्योंकि जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में अधिक प्रभावी राज्यउच्च जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों की तुलना में राजनीतिक महत्त्व खो देंगे। 

केंद्र द्वारा वर्तमान प्रस्ताव: 

  • केंद्र सरकार नेलोकसभा की अधिकतम सीटों की संख्या को मौजूदा 550 से बढ़ाकर 850 करने के लिये अप्रैल 2026 मेंसंविधान का 131वाँ संशोधन विधेयक पेश किया। 
  • गृह मंत्री ने संसद में मौखिक आश्वासन दिया कि प्रत्येक राज्य/केंद्र शासित प्रदेश में सीटों की संख्या आनुपातिक आधार पर 50% बढ़ाई जाएगी। 
  • यह विधेयक लोकसभा में हार गयायद्यपिऐसी उम्मीदें बनी हुई हैं कि सरकार निकट भविष्य में इसे सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में एक समान 50% की वृद्धि के लिये स्पष्ट सांविधिक प्रावधानों के साथ फिर से पेश कर सकती है। 

व्यापक निहितार्थ 

आनुपातिक रूप से 50% की वृद्धि के पक्ष में तर्क: 

  1. इससे लोकसभा में विभिन्न राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधित्व के वर्तमान अनुपात में कोई परिवर्तन नहीं होगा। 
  2. इससे महिलाओं के लिये एक तिहाई आरक्षण का सुचारू रूप से कार्यान्वयन संभव हो सकेगाजिससे लगभग 816 सीटों वाले विस्तारित सदन में महिलाओं के लिये अतिरिक्त 272 सीटें आरक्षित हो जाएंगी।                                        

प्रस्तावित वृद्धि से जुड़ी चुनौतियाँ:                                                                                           

  • लोकसभा-राज्यसभा का असंतुलित अनुपात:राज्यसभा की वर्तमान संख्या 245 हैजिसके परिणामस्वरूप लोकसभा के साथ इसका अनुपात 2.2:1 है। राज्यसभा की सीटों में समानुपातिक परिवर्तन के बिना लोकसभा की सीटों में 50% की वृद्धि होने पर यह अनुपात बढ़कर 3.3:1 हो जाएगाजिससे निचले सदन पर प्रभावी नियंत्रण और संतुलन बनाए रखने में राज्यसभा की भूमिका संभावित रूप से कम हो जाएगी। 
  • सीमित बैठक दिवस:चूँकि लोकसभा वर्ष में केवल लगभग 60 दिन ही बैठती हैइसलिये सदस्यों की संख्या में वृद्धि होने से प्रत्येक सांसद को मुद्दे उठाने के लिये बहुत कम सार्थक समय मिलेगाजिससे सदन का कार्य ठोस विचार-विमर्श के बजाय मात्र संख्यात्मक प्रतिनिधित्व तक सीमित हो जाएगा। 
  • संयुक्त बैठकों में जोखिम:दोनों सदनों के बीच गतिरोध को हल करने के लिये संयुक्त बैठक की सांविधानिक व्यवस्था (स्वतंत्रता के बाद से केवल तीन बार उपयोग की गई) के अधीनलोकसभा की बढ़ी हुई संख्या से ऐसी बैठकों में विधेयकों को पारित कराने का जोखिम बढ़ जाता हैजिससे राज्यसभा के नियंत्रण कार्य को फिर से कमजोर किया जा सकता है। 
  • वित्तीय लागत में वृद्धि:एक बड़ा सदन राजकोष पर लागत बढ़ाएगाजिसमें संसद सदस्यों की स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (MPLADS) के अधीन अतिरिक्त आवंटन भी शामिल है। 

सौहार्दपूर्ण सुलह 

  • मूल तनाव लोकतांत्रिक सिद्धांत (जनसंख्या के आधार पर आनुपातिक प्रतिनिधित्व) और संघीय सिद्धांत (छोटे/कम आबादी वाले राज्यों के राजनीतिक महत्त्व की रक्षा करना) के बीच निहित हैजो वर्तमान परिसीमन ढाँचे के अधीन परस्पर विरोधी प्रतीत होते हैं। 
  • इन सिद्धांतों को दोनों को समान महत्त्व देकर सामंजस्यपूर्ण ढंग से सुलझाया जा सकता है: 
    • लोकसभा में सांसदों की संख्या को वर्तमान 543 सीटों पर स्थिर रखा जा सकता हैजिससे राज्यवार प्रतिनिधित्व में कोई व्यवधान न हो और संघीय सिद्धांत बरकरार रहे। 
    • सदन का विस्तार करने के बजायमौजूदा 543 सीटों के भीतर ही महिलाओं के लिये एक तिहाई आरक्षण लागू किया जा सकता है। 
    • लोकसभा के संघीय संतुलन को बिगाड़े बिना लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की आवश्यकता को अलग से पूरा करने के लियेप्रत्येक राज्य में विधायकों की संख्या को वर्तमान जनसंख्या के अनुरूप बढ़ाया जा सकता है। 

निष्कर्ष 

परिसीमन पर बहस "एक व्यक्ति–एक मत–एक मूल्य" के लोकतांत्रिक सिद्धांत और जनसंख्या वृद्धि की परवाह किये बिना सभी राज्यों के राजनीतिक महत्त्व की रक्षा करने के संघीय सिद्धांत के बीच मूलभूत तनाव को दर्शाती है। केंद्र का लोकसभा सीटों में आनुपातिक 50% की वृद्धि का प्रस्ताव वर्तमान आनुपातिक प्रतिनिधित्व को बनाए रखता हैलेकिन इससे संसद के दोनों सदनों के बीच संतुलन बिगड़ने और लोकसभा के विचार-विमर्श के कार्य में कमी आने का खतरा है। एक सुलहकारी दृष्टिकोण - लोकसभा सीटों को स्थिर रखते हुए विधानसभा सीटों के माध्यम से प्रतिनिधित्व बढ़ाना – सांविधानिक रूप से अधिक संतुलित मार्ग प्रदान कर सकता है।