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सांविधानिक विधि

परीक्षा संबंधी विवादों में न्यायिक पुनर्विलोकन विशेषज्ञ मूल्यांकन का स्थान नहीं ले सकता

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 11-Aug-2026

उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोगअध्यक्ष सहितबनाम सुनील कुमार सिंह और अन्य 

"हमारे विचार मेंउच्च न्यायालय ने अकादमिक क्षेत्र के विशेषज्ञों के निर्णय में हस्तक्षेप करके न्यायिक पुनर्विलोकन न्यायालय की अधिकारिता का उल्लंघन किया है।" 

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ नेउत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और अन्य बनाम सुनील कुमार सिंह और अन्य (2026) के मामले मेंइलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश को अपास्त कर दियाजिसमें उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) द्वारा आयोजित एक परीक्षा में शैक्षणिक विशेषज्ञों के मूल्यांकन में हस्तक्षेप किया गया था। पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय ने "विशेषज्ञों के विशेषज्ञ" के रूप में कार्य करके न्यायिक पुनर्विलोकन की सीमाओं का उल्लंघन किया था। 

इस मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) द्वारा आयोजित परीक्षाजिसमें अभ्यर्थियों ने कुछ प्रश्नों की अस्पष्टता अथवा अशुद्धता के आधार पर उन पर आपत्तियाँ प्रस्तुत कीं 
  • इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विभिन्न शैक्षणिक विषयों में विवादित प्रश्नों की जांच करने के बाद UPPSC को उत्तर पुस्तिकाओं के पुनर्मूल्यांकनकुछ प्रश्नों को हटाने और अन्य प्रश्नों के लिये पूर्ण अंक प्रदान करने के संबंध में निदेश जारी किये 
  • उच्च न्यायालय के निर्देशों से असंतुष्ट होकर, UPPSC ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया और तर्क दिया कि उच्च न्यायालय ने शैक्षणिक और परीक्षा संबंधी मामलों में न्यायिक पुनर्विलोकन की निर्धारित सीमाओं का उल्लंघन किया है। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • शैक्षणिक मामलों में न्यायिक पुनर्विलोकन के दायरे पर:न्यायालय ने माना कि न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति का प्रयोग किसी शैक्षणिक क्षेत्र के विशेषज्ञों के निर्णयों में हस्तक्षेप करने के लिये नहीं किया जा सकता हैऔर उच्च न्यायालय ने विवादित प्रश्नों की परीक्षा इस प्रकार करके अपनी अधिकारिता का उल्लंघन किया है मानो वह स्वयं एक शैक्षणिक विशेषज्ञ हो। 
  • उच्च न्यायालय के दृष्टिकोण पर:न्यायालय ने पाया कि उच्च न्यायालय ने विभिन्न शैक्षणिक विषयों से विवादित प्रश्नों की विस्तृत परीक्षा की थी और प्रभावी रूप से विषय विशेषज्ञों के आकलन के स्थान पर अपना आकलन लागू किया थाजोरण विजय सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (2018) में निर्धारित विधि के विपरीत था। 
  • न्यायिक पुनर्विलोकन के उद्देश्य पर:न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि ऐसे मामलों में न्यायिक पुनर्विलोकन का उद्देश्य निर्णय लेने की प्रक्रिया की वैधता की परीक्षा करना हैन कि शैक्षणिक निर्णयों का गुण-दोष के आधार पर पुनर्मूल्यांकन करना। 
  • अंतिम निर्देश पर:न्यायालय ने पुनर्मूल्यांकनप्रश्नों को हटाने और पूर्ण अंक प्रदान करने संबंधी उच्च न्यायालय के निर्देशों को अपास्त कर दिया और अपील को मंजूर कर लिया। 

परीक्षा संबंधी मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप को नियंत्रित करने वाले सिद्धांत क्या हैं? 

न्यायालय ने रण विजय सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2018) के मामलेमें परीक्षाओं में न्यायिक हस्तक्षेप के संबंध मेंनिर्धारित निम्नलिखित सिद्धांतों की पुनः पुष्टि की : 

  • यदि किसी परीक्षा को नियंत्रित करने वाली संविधिनियम या विनियम उत्तर पुस्तिका के पुनर्मूल्यांकन या परीक्षा को एक अधिकार के रूप में अनुमति देता हैतो परीक्षा प्राधिकारी इसकी अनुमति दे सकता है। 
  • यदि संविधिनियम या विनियम स्पष्ट रूप से पुनर्मूल्यांकन या परीक्षा की अनुमति नहीं देता है (इसे प्रतिबंधित करने के विपरीत)तो न्यायालय पुनर्मूल्यांकन की अनुमति केवल तभी दे सकते हैं जब कोई महत्त्वपूर्ण त्रुटि स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होबिना किसी अनुमानात्मक तर्क प्रक्रिया का सहारा लियेऔर केवल दुर्लभ या असाधारण मामलों में। 
  • न्यायालयों को स्वयं उत्तर पुस्तिकाओं का पुनर्मूल्यांकन या परीक्षा नहीं करनी चाहियेक्योंकि उनके पास आवश्यक विशेषज्ञता का अभाव हैऔर अकादमिक मामलों को शिक्षाविदों पर ही छोड़ देना सबसे अच्छा है। 
  • न्यायालयों को परीक्षा प्राधिकरण द्वारा दिये गए मुख्य उत्तरों की सत्यता की उपधारणा करके चलना होगा और उसी आधार पर आगे बढ़ना होगा। 
  • यदि कोई संदेह उत्पन्न होता हैतो इसका लाभ अभ्यर्थी के बजाय परीक्षा प्राधिकरण को मिलना चाहिये 

न्यायिक पुनर्विलोकन क्या है? 

अर्थ: 

  • किसी लोक निकाय की निर्णय लेने की प्रक्रिया की वैधता कीपरीक्षा करने वाली न्यायालय कार्यवाहीन कि स्वयं निर्णय के गुण-दोष की। 
  • यह दो कार्य करता है: सरकारी कार्रवाई को वैधता प्रदान करना और कार्यपालिका/विधायिका के अतिक्रमण से संविधान की रक्षा करना। 
  • इसे भारतीय न्यायपालिका की व्याख्यात्मक और पर्यवेक्षक भूमिका के रूप में भी जाना जाता है। 

प्रकार: 

  • विधायी कार्यों का पुनर्विलोकन यह सुनिश्चित करता है कि विधायिका द्वारा पारित विधान संविधान के अनुरूप हों। 
  • प्रशासनिक कार्रवाइयों का पुनर्विलोकन – प्रशासनिक एजेंसियों पर सांविधानिक अनुशासन लागू करती है। 
  • न्यायिक निर्णयों का पुनर्विलोकन – न्यायालयों को अपने पूर्व निर्णयों को सुधारने या उन पर पुनर्विचार करने की अनुमति देती है। 

दायरा:  
किसी विधायी अधिनियम या कार्यकारी आदेश को उच्चतम न्यायालय/उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है यदि वह: 

  • भाग के अंतर्गत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है; 
  • अधिनियमित करने वाले प्राधिकारी की क्षमता से बाहर हैया 
  • यह सांविधानिक प्रावधानों के विरुद्ध है। 

परिसीमाएँ: 

  • यह सरकारी कामकाज को बाधित करता है और सांविधानिक सीमाओं से परे मौजूदा विधि को दरकिनार कर सकता है। 
  • भारत में कार्योंका पृथक्करण होता है, शक्तियोंका कठोर पृथक्करण नहीं । 
  • न्यायिक निर्णय भविष्य के मामलों के लिये बाध्यकारी पूर्व निर्णय बन जाते हैं। 
  • निर्णयों पर व्यक्तिगत विचारों का प्रभाव पड़ने का खतराबार-बार न्यायिक हस्तक्षेप से शासन में जनता का विश्वास कम हो सकता है। 

सांविधानिक आधार: 
विधियों को अमान्य घोषित करने के लिये न्यायालयों को कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं दिया गया हैलेकिन न्यायिक पुनर्विलोकन निम्नलिखित द्वारा समर्थित है: 

  • अनुच्छेद 13 – मौलिक अधिकारों के साथ असंगत विधियों को शून्य घोषित करता है। 
  • अनुच्छेद 32 और 226 – उच्चतम न्यायालय/उच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों के गारंटर के रूप में सशक्त बनाते हैं। 
  • अनुच्छेद 131-136 - न्यायनिर्णय/अपील अधिकारिताजिसमें सांविधानिक निर्वचन शामिल है जो सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी है। 
  • अनुच्छेद 137 – उच्चतम न्यायालय की अपने स्वयं के निर्णयों/आदेशों की पुनर्विलोकन करने की शक्ति (आपराधिक आदेशों का पुनर्विलोकन केवल रिकॉर्ड में स्पष्ट त्रुटियों के लिये किया जा सकता है)। 
  • अनुच्छेद 245, 246(3), 251, 254, 372(1) – विधायी क्षमताकेंद्र-राज्य विधि संघर्ष और पूर्व-संविधान विधियों की निरंतरता को नियंत्रित करते हैंये सभी न्यायिक जांच के अधीन हैं।