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सांविधानिक विधि

उभयलिंगी (ट्रांसजेंडर) संशोधन 2026 और निहित अधिकारों का प्रश्न

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 04-Aug-2026

स्रोत:द हिंदू 

परिचय 

उच्चतम न्यायालय ने उभयलिंगी व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम में 2026 में किये गए संशोधन को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई शुरू कर दी है। इस संशोधन से ट्रांसजेंडर पहचान पत्र प्राप्त करने की प्रक्रिया में बदलाव आया है और स्व-मूल्यांकन की पूर्व प्रणाली को समाप्त कर दिया गया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांतन्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मौखिक रूप से संकेत दिया कि असंशोधित विधि के अधीन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को पहले से प्राप्त अधिकारों को भावी संशोधन द्वारा प्रभावित नहीं किया जा सकता है। यद्यपिपीठ ने इस स्तर पर कोई औपचारिक अंतरिम आदेश पारित करने से इंकार कर दिया। 

उच्चतम न्यायालय ने क्या अवलोकन किया? 

  • पीठ ने मौखिक रूप से कहा कि 2026 का संशोधन भविष्य में लागू होगा और यह उन अधिकारों को निरस्त या रद्द नहीं करता है जो पहले की व्यवस्था के अधीन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को पहले ही प्राप्त हो चुके थे। 
  • न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि यदि विधायिका का आशय संशोधन के माध्यम से पहले से प्रदत्त अधिकारों को रद्द करना होतातो वह संशोधन को भूतलक्षी या निरसन प्रभाव देतीजो उसने नहीं किया। 
  • उन्होंने आगे कहा कि यदि ट्रांसजेंडर कार्ड कपटपूर्वक प्राप्त किया गया पाया जाता हैतो उसे रद्द करने के लिये संबंधित व्यक्ति को पहले से सूचना देना आवश्यक होगान कि स्वचालित रूप से वापस लेना। 

इस संशोधन को चुनौती क्यों दी गई? 

  • याचिकाकर्त्ताओं में से एक की ओर से पेश हुईं वरिष्ठ अधिवक्ता जयना कोठारी ने उन व्यक्तियों के लिये यथास्थिति बनाए रखने का आदेश मांगाजिनके पास पहले से ही ट्रांसजेंडर कार्ड हैंऔर बताया कि नए आवेदनों के लिये राष्ट्रीय पोर्टल वर्तमान में काम नहीं कर रहा है। 
  • वरिष्ठ अधिवक्ता अरुंधति काटजू ने तर्क दिया कि यह संशोधन उन व्यक्तियों के लिये अनिश्चितता उत्पन्न करता है जिन्होंने पहले से ही अपनी मान्यता प्राप्त स्थिति के आधार पर पासपोर्ट और आधार कार्ड जैसे पहचान दस्तावेजों को अपडेट कर लिया हैजिससे अंतरराष्ट्रीय यात्रा करते समय वे असमंजस में पड़ सकते हैं। 
  • याचिकाकर्त्ताओं ने यह भी कहा कि संशोधन लागू होने के बाद से डॉक्टर मरीजों के लिये हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी जारी रखने में हिचकिचा रहे हैंऔर कई उच्च न्यायालयों ने पहले ही व्यक्तिगत मामलों में अंतरिम सुरक्षा प्रदान कर दी है। 

सरकार ने क्या तर्क दिया?      

  • सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्व-मूल्यांकन तंत्र को हटाने के संशोधन की प्रतिरक्षा करते हुए उत्तराधिकार विधि से जुड़े विवादों जैसी व्यावहारिक कठिनाइयों का हवाला दियाजहाँ किसी व्यक्ति का विधिक लिंग अनिश्चित होता है। 
  • उन्होंने याचिका की तात्कालिकता का विरोध करते हुए तर्क दिया कि यह मामला आवश्यक अधिकारों के समान तत्काल आवश्यकता से संबंधित नहीं हैऔर न्यायालय से आग्रह किया कि वह मुद्दों की विस्तार से परीक्षा किये बिना केवल मौखिक दलीलों के आधार पर कोई आदेश जारी न करे। 

न्यायालय ने क्या निदेश दिया? 

  • पीठ ने इस स्तर पर कोई सामान्य या व्यापक आदेश पारित करने से इंकार कर दियायह कहते हुए कि कठिनाई के व्यक्तिगत मामलों को विशिष्ट आवेदनों के माध्यम से उसके समक्ष लाया जा सकता हैऔर अनुतोष तथ्यों के आधार परमामले-दर-मामले के आधार पर प्रदान किया जाएगा 
  • यूनियन की ओर से जवाब देने के लिये सॉलिसिटर जनरल को समय दिया गया था। 
  • इस मामले की अगली सुनवाई 17 अगस्त, 2026 को होगी। 
  • इससे पहलेन्यायालय ने मई 2026 में केंद्र को नोटिस जारी किया था और विभिन्न उच्च न्यायालयों के समक्ष लंबित संबंधित याचिकाओं को अपने पास स्थानांतरित करने के केंद्र के अनुरोध परउच्च न्यायालय की कार्यवाही पर रोक भी लगा दी थी। 

निष्कर्ष 

उच्चतम न्यायालय की मौखिक टिप्पणियों से संकेत मिलता है कि उभयलिंगी व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम के अधीन पहले से प्रदत्त अधिकारों में किसी भी प्रकार की कटौती के लिये 2026 के संशोधन के माध्यम से स्वतः वापसी के बजाय भावीनोटिस-आधारित कार्रवाई की आवश्यकता होगी। यद्यपि न्यायालय ने व्यापक अंतरिम आदेश देने से परहेज किया हैलेकिन संशोधन की भावी प्रकृति पर उसकी टिप्पणियों ने 17 अगस्त को निर्धारित मुख्य सुनवाई के लिये आधार तैयार किया हैजहाँ संशोधन की वैधता और प्रभाव पर केंद्र सरकार की औपचारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है।