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सिविल कानून

स्थायी लोक अदालत को सेवा संबंधी मामलों पर कोई अधिकारिता नहीं है

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 15-Sep-2026

राजस्थान राज्य बनाम भंवर लाल जैन 

"1987 के अधिनियम की धारा 22-सी के अधीन 'विवाद के किसी भी पक्षकार' शब्दों की व्याख्या उस अधिकारिता के संदर्भ में की जानी चाहिये जिसके लिये स्थायी लोक अदालत की स्थापना की गई है।" 

न्यायमूर्ति अनूप कुमार धंद 

राजस्थान उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति अनूप कुमार ढांड ने राजस्थान राज्य बनाम भंवर लाल जैन (2026) के मामले में स्थायी लोक अदालत (PLA), मेड़ता, नागौर द्वारा पारित एक पंचाट को अपास्त कर दिया, यह मानते हुए कि स्थायी लोक अदालत के पास सेवा लाभों के अनुदान से संबंधित विवाद का निर्णय करने की अधिकारिता नहीं है, क्योंकि ऐसा विवाद विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 22क (ख) के अधीन "लोक उपयोगिता सेवाओं" के अर्थ में नहीं आता है। 

राजस्थान राज्य बनाम भंवर लाल जैन (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • प्रत्यर्थी को 1978 में अस्थायी आधार पर सहायक के रूप में नियुक्त किया गया था, और 1980 में उसे अर्ध-स्थायी कर्मचारी घोषित कर दिया गया था। 
  • यद्यपि, सभी सेवा लाभों के प्रयोजन के लिये, उनकी सेवाओं की गणना केवल सितंबर 1981 से की गई थी। 
  • इससे व्यथित होकर प्रत्यर्थी ने स्थायी लोक अदालत, मेड़ता, नागौर में अपनी नियुक्ति की प्रारंभिक तिथि से सेवा लाभ प्राप्त करने के लिये संपर्क किया।  
  • स्थायी लोक अदालत ने आवेदन स्वीकार कर लिया और प्रत्यर्थी के पक्ष में निर्णय सुनाते हुए लोक स्वास्थ्य इंजीनियरिंग विभाग को 1978 से सेवा लाभ प्रदान करने का निर्देश दिया।  
  • याचिकाकर्त्ता विभाग ने राजस्थान उच्च न्यायालय के समक्ष आवेदन की वैधता को चुनौती दी, यह तर्क देते हुए कि चूँकि यह मुद्दा सेवा लाभों के अनुदान से संबंधित है, इसलिये इस पर स्थायी लोक अदालत द्वारा निर्णय नहीं लिया जा सकता था। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?  

  • स्थायी लोक अदालत के सीमित अधिकारिता पर: 
    न्यायालय ने टिप्पणी की कि स्थायी लोक अदालत की स्थापना का उद्देश्य एक या एक से अधिक लोक उपयोगिता सेवाओं पर सीमित अधिकारिता का प्रयोग करना है, अन्यथा नहीं। 
  • धारा 22क (ख) के अधीन "सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं" के दायरे पर: 
    न्यायालय ने पाया कि लोक उपयोगिता सेवाओं की श्रेणियों को अधिनियम के अधीन विशेष रूप से सूचीबद्ध किया गया है, जिसमें केंद्र या राज्य सरकार को किसी अन्य सेवा को शामिल करने के लिये परिभाषा का विस्तार करने की शक्ति दी गई है, जो जानबूझकर सीमित अधिकारिता को इंगित करता है। 
  • धारा 22ग के अधीन "विवाद के किसी भी पक्षकार" की व्याख्या पर: 
    न्यायालय ने माना कि इस वाक्यांश को उस अधिकारिता के संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिये जिसके लिये स्थायी लोक अदालत की स्थापना की गई है, और इसे लोक उपयोगिता सेवा विवादों से परे स्थायी लोक अदालत के अधिकार का विस्तार करने के लिये नहीं पढ़ा जा सकता है। 
  • स्थायी लोक अदालत की अधिकारिता से बाहर आने वाले सेवा लाभ विवादों पर: 
    न्यायालय ने माना कि चूँकि मामला प्रत्यर्थी को सेवा लाभ प्रदान करने से संबंधित था, इसलिये यह धारा 22क (ख) के अधीन परिभाषित "लोक उपयोगिता सेवाओं" के दायरे में नहीं आता है, और इसलिये स्थायी लोक अदालत ने ऐसी शक्ति का प्रयोग किया है जो उसे प्रदत्त नहीं है।  
  • उपरोक्त को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय ने स्थायी लोक अदालत द्वारा पारित पंचाट को रद्द कर दिया और प्रत्यर्थी को याचिकाकर्त्ता-विभाग के समक्ष अभ्यावेदन दाखिल करने की स्वतंत्रता दी, जिसे मामले की सुनवाई करने और सहानुभूतिपूर्वक और शीघ्रता से, अधिमानतः दो महीने के भीतर निर्णय लेने का निदेश दिया गया। 

स्थायी लोक अदालतें क्या हैं? 

लोक अदालतों के बारे में: 

परिचय 

  • लोक अदालत शब्द का अर्थ जनता की अदालत (People’s Court) है। 
  • यह गांधीवादी सिद्धांतों पर आधारित है। 
  • उच्चतम न्यायालय के अनुसार, यह प्राचीन भारत में प्रचलित विवाद-निपटान प्रणाली का एक पुरातन रूप है। 
  • यह वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) प्रणाली के घटकों में से एक है। 
  • यह आम जनता को अनौपचारिक, सस्ता एवं त्वरित न्याय प्रदान करती है। 

प्रथम लोक अदालत 

  • पहली लोक अदालत शिविर का आयोजन 1982 में गुजरात में एक स्वैच्छिक एवं सुलहकारी संस्था के रूप में किया गया था, जिसे उस समय कोई वैधानिक आधार प्राप्त नहीं था। 

सांविधिक मान्यता 

  • इसे विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अंतर्गत सांविधिक दर्जा प्रदान किया गया। 
  • उक्त अधिनियम लोक अदालतों के गठन एवं कार्यप्रणाली से संबंधित प्रावधान करता है। 

संगठन 

  • राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) अन्य विधिक सेवा संस्थाओं के साथ मिलकर लोक अदालतों के आयोजन एवं संचालन से संबंधित कार्य करता है। 
  • NALSA का गठन विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अंतर्गत किया गया था, जो 9 नवंबर 1995 को प्रभावी हुआ। 

संरचना 

  • सामान्यतः लोक अदालत में अध्यक्ष के रूप में एक न्यायिक अधिकारी तथा सदस्य के रूप में एक अधिवक्ता और एक सामाजिक कार्यकर्ता होते हैं। 

अधिकारिता 

  • लोक अदालत को निम्नलिखित मामलों के संबंध में विवाद के पक्षकारों के मध्य समझौता या निपटारा निर्धारित करने तथा कराने की अधिकारिता होगी: 
  • किसी न्यायालय के समक्ष लंबित कोई वाद। 
  • ऐसा कोई विषय, जो किसी न्यायालय की अधिकारिता के अंतर्गत आता हो, किंतु उस न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत न किया गया हो। 
  • न्यायालय के समक्ष लंबित किसी मामले को लोक अदालत में निपटारे के लिये संदर्भित किया जा सकता है, यदि पक्षकार लोक अदालत में विवाद का निपटारा करने के लिये सहमत हों। 

कार्यवाही 

  • लोक अदालत के समक्ष की जाने वाली सभी कार्यवाहियों को भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (IPC) के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही माना जाएगा तथा प्रत्येक लोक अदालत को सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के प्रयोजनार्थ सिविल न्यायालय माना जाएगा। 

पंचाट  

  • लोक अदालत द्वारा दिया गया अधिनिर्णय पक्षकारों पर बाध्यकारी होता है तथा उसे सिविल न्यायालय की डिक्री का दर्जा प्राप्त होता है। यह अपील योग्य नहीं होता, जिसके परिणामस्वरूप विवादों के अंतिम निपटारे में अनावश्यक विलंब नहीं होता। 

लाभ 

  • कोई न्यायालय शुल्क देय नहीं होता और यदि न्यायालय शुल्क का पहले ही भुगतान किया जा चुका है, तो लोक अदालत में विवाद का निपटारा होने पर उक्त राशि वापस कर दी जाती है। 
  • कार्यवाही में प्रक्रियात्मक लचीलापन होता है तथा विवादों का शीघ्र निपटारा किया जाता है। 

स्थायी लोक अदालतें: 

बारे में: 

विधि सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 में 2002 में संशोधन किया गया जिससे परिवहन, डाक, तार आदि जैसी लोक उपयोगिता सेवाओं से संबंधित मामलों से निपटने के लिये स्थायी लोक अदालतों की स्थापना का प्रावधान किया जा सके। 

आवश्यक सुविधाएँ:  

  • इन्हें विधि सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 22-ख के अधीन स्थायी निकायों के रूप में स्थापित किया गया है । 
  • इसमें एक अध्यक्ष होगा जो जिला न्यायाधीश या अपर जिला न्यायाधीश हो या रह चुका हो या जिला न्यायाधीश से उच्चतर पद पर रहा हो, और दो अन्य व्यक्ति होंगे जिन्हें लोक उपयोगिता सेवाओं में पर्याप्त अनुभव हो। 
  • किसी ऐसे अपराध से संबंधित विषय के संबंध में, जो किसी विधि के अधीन शमनीय नहीं है, उसे कोई अधिकारिता प्राप्त नहीं स्थायी लोक अदालतों की अधिकारिता ₹1 करोड़ तक है। 
  • स्थायी लोक अदालत का निर्णय अंतिम और पक्षकारों पर बाध्यकारी होगा। 
  • किसी विवाद को न्यायालय में लाने से पहले, विवाद के किसी भी पक्षकार द्वारा विवाद के निपटारे के लिये स्थायी लोक अदालत में आवेदन किया जा सकता है। स्थायी लोक अदालत में आवेदन करने के बाद, उस आवेदन के किसी भी पक्षकार को उसी विवाद में किसी अन्य न्यायालय की अधिकारिता का सहारा लेने का अधिकार नहीं होगा ।