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सिविल कानून

अलग रह रहे पति/पत्नी की जिज्ञासा पर निजता का अधिकार सर्वोपरि

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 07-Sep-2026

विजेंद्र कुमार बनाम उत्तराखंड राज्य और अन्य 

"हमें अभिलेख में ऐसी कोई सामग्री नहीं मिली है जो किसी लोकहित की संलिप्तता को इंगित करती होजो निजी पक्ष के निजता के अधिकार से अधिक महत्त्वपूर्ण हो।" 

मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय 

उत्तराखंड उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ नेविजेंद्र कुमार बनाम उत्तराखंड राज्य और अन्य (2026) के मामलेमें अपीलकर्त्ता की अलग हुई पत्नी की सरकारी सेवा के बारे में सूचना के अधिकार (RTI) सूचना से इंकार को चुनौती देने वाली विशेष अपील को खारिज कर दियायह मानते हुए कि सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(ञ) और 11 के अधीन निजता के अधिकार से अधिक लोकहित दिखाने के लिये कोई सामग्री विद्यमान नहीं थी। 

विजेंद्र कुमार बनाम उत्तराखंड राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता ने सूचना के अधिकार अधिनियम के अधीन अपनी अलग रह रही पत्नी की सरकारी सेवा के संबंध में जानकारी मांगी थीजो एक सरकारी जूनियर हाई स्कूल में सहायक शिक्षिका के रूप में कार्यरत थी। 
  • सूचना के अधिकार आवेदन दाखिल किये जाने के समय अपीलकर्त्ता और प्रत्यर्थी पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद कुटुंब न्यायालय में लंबित थे। 
  • प्रत्यर्थी पत्नी ने प्रकटीकरण का विरोध करते हुए आरोप लगाया कि आवेदन गलत हेतु से किया गया था और अपीलकर्त्ता ने पहले भी विभिन्न अधिकारियों के समक्ष उसके विरुद्ध कई परिवाद दर्ज करवाए थेजिससे उसे गंभीर मानसिक उत्पीड़न हुआ था। 
  • उनकी आपत्ति को ध्यान में रखते हुएलोक सूचना अधिकारी ने सूचना का अधिकार आवेदन को खारिज कर दियाजिसके बाद अपीलकर्त्ता की प्रथम अपील सांविधिक समय सीमा के भीतर अनिर्णीत रहीजिसके कारण मुख्य सूचना आयुक्त के समक्ष द्वितीय अपील दायर की गई। 
  • मुख्य सूचना आयुक्त ने अप्रैल, 2026 को द्वितीय अपील खारिज कर दी और इस आदेश के विरुद्ध अपीलकर्त्ता की बाद की रिट याचिका को भी एकल न्यायाधीश ने 20 मई, 2026 को खारिज कर दिया। 
  • एकल न्यायाधीश ने सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(ञ) और 11 तथा पक्षकारों के बीच तनावपूर्ण संबंधों पर विश्वास करते हुए यह माना कि अधिकारियों द्वारा सूचना का प्रकटन करने से इंकार करने में हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। 
  • खंडपीठ के समक्षअपीलकर्त्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि कई सहायक शिक्षकों की कथित रूप से हेरफेर की गई नियुक्ति की लंबित लोकहित याचिका और चल रही विशेष जांच टीम की जांच से पता चलता है कि प्रकटीकरण लोकहित में थाऔर यह कि प्रत्यर्थी -पत्नी की स्वयं की नियुक्ति भी इसी प्रकार हेरफेर के माध्यम से प्राप्त की गई थी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • सहायक सामग्री के अभाव पर:खंडपीठ ने कहा कि अपीलकर्त्ता द्वारा संदर्भित लोकहित याचिका अभी भी लंबित हैऔर याचिका के साथ ऐसा कोई सबूत संलग्न नहीं किया गया है जिससे प्रथम दृष्टया भी यह साबित हो सके कि प्रत्यर्थी की नियुक्ति किसी भी अनुचित तरीके से प्राप्त की गई थी। 
  • प्रत्यर्थी की आपत्ति और उत्पीड़न के आरोप पर:न्यायालय ने प्रत्यर्थी -पत्नी द्वारा प्रकटीकरण पर की गई कड़ी आपत्ति और उसके इस आरोप पर ध्यान दिया कि अपीलकर्त्ता ने अतीत में उसे उत्पीड़न का शिकार बनाने के उद्देश्य से उसके विरुद्ध परिवाद दर्ज कराया था 
  • निजता के विरुद्ध लोकहित को संतुलित करने पर:पीठ ने माना कि यथास्थिति के अनुसारअभिलेखों में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं था जो किसी ऐसे लोकहित की संलिप्तता को इंगित करता हो जो प्रत्यर्थी के निजता के अधिकार से अधिक महत्त्वपूर्ण होऔर तदनुसार अधिनियम के अंतर्गत अधिकारियों के आदेशों या एकल न्यायाधीश के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं पाया।
  • परिणाम के संबंध में:विशेष अपील खारिज कर दी गईऔर इस मामले में लंबित सभी आवेदनों का भी निपटारा कर दिया गयाजिससे CIC और एकल न्यायाधीश के प्रकटीकरण से इंकार करने के आदेश बरकरार रहे। 

सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(ञ) और 11 क्या हैं? 

अधिनियम के बारे में: 

  • अधिनियमित: 2005, भारत की संसद द्वारा 
  • उद्देश्य:नागरिकों को लोक अधिकारियों के पास मौजूद जानकारी तक स्वतंत्र रूप से पहुँच प्रदान करना।     
  • उद्देश्य:सरकारी संस्थानों के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देना। 
  • प्रयोज्यता:यह सरकार के सभी स्तरों - केंद्रराज्य और स्थानीय निकायों - पर लागू होता है। 
  • प्रदत्त अधिकार:नागरिक बिना किसी कारण बताए जानकारी का अनुरोध कर सकते हैं। 
  • समय सीमा:जानकारी सामान्यतः अनुरोध प्राप्त होने के 30 दिनों के भीतर प्रदान की जानी चाहिये (यदि यह जीवन या स्वतंत्रता से संबंधित है तो 48 घंटे के भीतर)। 
  • प्रथम सूचना के अधिकार आवेदन:पुणे में शाहिद रजा बर्नी द्वारा दायर किया गया। 
  • प्रमुख छूटें (धारा 8):राष्ट्रीय सुरक्षासंप्रभुतारणनीतिक/वैज्ञानिक/आर्थिक हितों या व्यक्तिगत निजता को प्रभावित करने वाली जानकारी को छूट दी गई हैजब तक कि लोकहित प्रकटीकरण को उचित न ठहराए। 
  • अधिभावी प्रभाव (धारा 22):सूचना के अधिकार अधिनियमआधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, 1923 और किसी भी अन्य असंगत विधि पर प्रभावी होगा। 
  • कार्यान्वयन निकाय:केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) और राज्य सूचना आयोग (SIC) अपीलीय प्राधिकरणों के रूप में कार्य करते हैं। 
  • संशोधन:सूचना अधिकार (RTI) (संशोधन) अधिनियम, 2019 ने केंद्र सरकार को सूचना आयुक्तों की अवधिवेतन और सेवा शर्तों को निर्धारित करने का अधिकार दिया।  

सूचना अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(): 

मूल अधिनियम का पाठ: 

सूचना के प्रकटीकरण से छूट.—(1)इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भीकिसी नागरिक को सूचना देने का कोई दायित्व नहीं होगा,— 

(j) ऐसी सूचना जो व्यक्तिगत सूचना से संबंधित हो और जिसका प्रकटीकरण किसी सार्वजनिक गतिविधि या हित से संबंधित न होया जिससे व्यक्ति की निजता का अनुचित उल्लंघन होजब तक कि केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी या अपीलीय प्राधिकारीजैसा भी मामला होसंतुष्ट न हो कि व्यापक लोकहित ऐसी सूचना के प्रकटीकरण को उचित ठहराता है: बशर्ते कि जो सूचना संसद या राज्य विधानमंडल को देने से इंकार नहीं किया जा सकता हैवह किसी भी व्यक्ति को देने से इंकार नहीं किया जाएगा। 

प्रमुख विशेषताएँ:   

  • व्यक्तिगत जानकारी से छूट:सार्वजनिक गतिविधि या हित से कोई संबंध न रखने वाली जानकारी को अनिवार्य प्रकटीकरण से छूट दी गई हैजिससे विशुद्ध रूप से निजी मामलों को सूचना के अधिकार की जांच से बचाया जा सके।  
  • निजता की सुरक्षा:ऐसा प्रकटीकरण जिससे किसी व्यक्ति की निजता का अनुचित उल्लंघन होउसे छूट दी गई हैक्योंकि निजता को एक ऐसे मूल्य के रूप में मान्यता दी गई है जिसे अधिनियम स्वयं संरक्षित करना चाहता है। 
  • व्यापक जनहित को प्राथमिकता देना:यह छूट पूर्ण नहीं है – लोक सूचना अधिकारी या अपीलीय प्राधिकारी अभी भी प्रकटीकरण का निदेश दे सकते हैं यदि वे संतुष्ट हैं कि व्यापक लोकहित इसे उचित ठहराता हैजिसके लिये प्रकटीकरण के पक्ष में उपधारणा के बजाय एक सकारात्मक निष्कर्ष की आवश्यकता होती है। 
  • संसदीय विशेषाधिकार का परंतुक:संसद या राज्य विधानमंडल से जो जानकारी छिपाई नहीं जा सकतीउसे किसी भी नागरिक को देने से इंकार नहीं किया जा सकतायह सुनिश्चित करते हुए कि सूचना के अधिकार में छूट से पारदर्शिता का स्तर विधानमंडल के प्रति अपेक्षित स्तर से कम न हो जाए। 

सूचना अधिकार अधिनियम की धारा 11: 

मूल अधिनियम का पाठ: 

  • पर-व्यक्तिसूचना.—(1) जहाँयथास्थितिकिसी केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी काइस अधिनियम के अधीन किये गए अनुरोध पर कोई ऐसी सूचना या अभिलेख या उसके किसी भाग को प्रकट करने का आशय हैजो किसी पर व्यक्ति से संबंधित है या उसके द्वारा इसका प्रदाय किया गया है और उस पर व्यक्ति द्वारा उसे गोपनीय माना गया हैवहाँयथास्थितिकेंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी अनुरोध प्राप्त होने से पाँच दिन के भीतर ऐसे पर व्यक्ति को अनुरोध की और इस तथ्य की लिखित रूप में सूचना देगा कियथास्थितिकेंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी का उक्त सूचना या अभिलेख या उसके किसी भाग को प्रकट करने का आशय हैऔर इस बारे में कि सूचना प्रकट की जानी चाहिये या नहींलिखित में या मौखिक रूप से निवेदन करने के लिये पर व्यक्ति को आमंत्रित करेगा तथा सूचना के प्रकटन के बारे में कोई विनिश्वय करते समय पर व्यक्ति के ऐसे निवेदन को ध्यान में रखा जाएगा 

प्रमुख विशेषताएँ: 

  • पर-व्यक्ति को अनिवार्य सूचना:जहाँ अनुरोधित जानकारी किसी पर-व्यक्ति से संबंधित है या उसके द्वारा प्रदान की गई है और उसे गोपनीय माना गया हैवहाँ PIO को अनुरोध प्राप्त होने के पाँच दिनों के भीतर उस पर-व्यक्ति को लिखित सूचना जारी करनी होगी।  
  • प्रतिनिधित्व का अधिकार:पर-व्यक्ति को यह बताने का अधिकार है कि क्या जानकारी का प्रकटीकरण किया जाना चाहियेऔर इस संबंध में लिखित या मौखिक रूप से अपनी राय प्रस्तुत करने का अधिकार हैऔर निर्णय लेने से पहले इस राय पर विचार किया जाना चाहिये 
  • PIO द्वारा बरकरार रखा गया निर्णयात्मक विवेक:पर-व्यक्ति की आपत्ति एक अनिवार्य विचार है लेकिन वीटो नहीं है - PIO या अपीलीय प्राधिकरण अंततः धारा 8(1)(ञ) और संबंधित प्रावधानों के अधीन लोकहित परीक्षण के विरुद्ध आपत्ति का वजन करके प्रकटीकरण का निर्णय लेता है। 
  • उद्देश्य:यह उपबंध प्रकटीकरण प्रक्रिया में प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों को शामिल करके सूचना के अधिकार अधिनियम के पारदर्शिता उद्देश्यों के विरुद्ध किसी पर-व्यक्ति के गोपनीयता और निजता हितों को संतुलित करता है।