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पारिवारिक कानून
शेष विवाह अधिनियम के अधीन विवाह संपन्न कराने के लिये विवाह अधिकारी अविवाहित स्थिति प्रमाण पत्र पर बल नहीं दे सकता
«01-Sep-2026
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राकेश कल्लमपादथ बनाम केरल राज्य और अन्य "तीसरे प्रत्यर्थी को निदेश दिया जाएगा कि वह नोटिस बोर्ड पर प्रकाशित प्रस्तावित विवाह की सूचना के आधार पर कार्रवाई करे और याचिकाकर्त्ता को आवेदन के अनुसार विवाह संपन्न करने की अनुमति दे।" न्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन |
केरल उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन ने राकेश कल्लमपडथ बनाम केरल राज्य और अन्य (2026) के मामले में एक रिट याचिका का निपटारा करते हुए उप-पंजीयक/विवाह अधिकारी को याचिकाकर्त्ता के नेपाली नागरिक के साथ विवाह के संपन्न होने की अनुमति देने का निदेश दिया, यह मानते हुए कि समाप्त हो चुका "अविवाहित स्थिति प्रमाण पत्र" विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के अधीन इंकार का वैध आधार नहीं हो सकता।
राकेश कल्लमपडथ बनाम केरल राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता ने एक नेपाली नागरिक महिला से विवाह करने के प्रस्तावित विवाह की सूचना प्रस्तुत की, जिसमें नेपाल दूतावास द्वारा जारी किया गया "अविवाहित स्थिति प्रमाण पत्र" भी संलग्न किया गया था।
- तत्पश्चात विवाह अधिकारी ने इस आधार पर विवाह संपन्न कराने से इंकार करने का आदेश पारित किया कि अविवाहित स्थिति प्रमाण पत्र की वैधता समाप्त हो गई थी।
- इससे व्यथित होकर याचिकाकर्त्ता ने विवाह अधिकारी के इंकार को चुनौती देते हुए केरल उच्च न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- अविवाहित स्थिति प्रमाण पत्र की आवश्यकता पर: न्यायालय ने याचिकाकर्त्ता के प्रस्तुतीकरण पर विश्वास किया, जो दो पूर्व निर्णयों (W.P.(C) No. 15665 of 2026 and W.P.(C) No. 249 of 2019) द्वारा समर्थित था, जिसमें यह माना गया था कि विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के अधीन विवाह को रजिस्ट्रीकृत करने के लिये "अविवाहित स्थिति प्रमाण पत्र" पर बल नहीं दिया जा सकता है।
- राज्य की स्थिति पर: न्यायालय ने कहा कि राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले सरकारी वकील ने स्वीकार किया कि अधिनियम के अधीन विवाह संपन्न कराने के लिये अविवाहित स्थिति प्रमाण पत्र की आवश्यकता वाला कोई सांविधिक आदेश मौजूद नहीं है।
- दिये गए अनुतोष के संबंध में: न्यायालय ने उप-पंजीयक/विवाह अधिकारी को नोटिस बोर्ड पर पहले से प्रकाशित विवाह संबंधी सूचना के आधार पर कार्रवाई करने और याचिकाकर्त्ता को आवेदन के अनुसार विवाह संपन्न करने की अनुमति देने का निदेश दिया।
- निष्कर्ष: न्यायालय ने रिट याचिका का निपटारा करते हुए विवाह अधिकारी को निदेश दिया कि वह वैध अविवाहित स्थिति प्रमाण पत्र पर बल दिये बिना विवाह संपन्न कराने की अनुमति दे।
विशेष विवाह अधिनियम, 1954 क्या है?
पृष्ठभूमि एवं उद्देश्य:
- विशेष विवाह अधिनियम, 1954 विभिन्न धर्मों या जातियों से संबंधित व्यक्तियों के विवाह के लिय एक विधिक ढाँचा प्रदान करता है, जो धर्म के बजाय राज्य द्वारा स्वीकृत सिविल विवाह को नियंत्रित करता है।
- यह विवाह के प्रति एक धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण को दर्शाता है, जो अंतर-धार्मिक और अंतर-जातीय जोड़ों को किसी भी पक्ष द्वारा दूसरे के धर्म में परिवर्तित हुए बिना या अपनी व्यक्तिगत धार्मिक पहचान का त्याग किये बिना विवाह करने में सक्षम बनाता है - जो व्यक्तिगत विधियों से एक महत्त्वपूर्ण अंतर है।
विवाह की प्रयोज्यता और मान्यता:
- यह अधिनियम भारत भर में हिंदुओं, मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों, जैनियों और बौद्धों सहित सभी धर्मों के व्यक्तियों पर लागू होता है, और धार्मिक पृष्ठभूमि की परवाह किये बिना सिविल विवाह के लिये एक समान ढाँचा प्रदान करता है।
- इसमें विवाह के रजिस्ट्रीकरण का प्रावधान है, जिससे विधिक मान्यता प्राप्त होती है और साथ ही विरासत के अधिकार, उत्तराधिकार के अधिकार और सामाजिक सुरक्षा संरक्षण जैसे लाभ भी मिलते हैं।
- यह अधिनियम बहुविवाह को प्रतिबंधित करता है, और विवाह के समय यदि किसी भी पक्ष का कोई जीवित पति/पत्नी हो तो विवाह को शून्य घोषित करता है, और साथ ही उस स्थिति में भी शून्य घोषित करता है जब कोई भी पक्ष चित्त विकृति के कारण वैध सहमति देने में असमर्थ हो।
धारा 5 और 7 के अंतर्गत नोटिस की आवश्यकता:
- धारा 5 के अनुसार, विवाह करने के इच्छुक पक्षकारों को जिले के विवाह अधिकारी को विवाह संबंधी लिखित सूचना देनी होगी, जिसमें से कम से कम एक पक्ष को सूचना देने से ठीक पहले कम से कम 30 दिनों तक उस जिले में निवास करना आवश्यक होगा।
- धारा 7 किसी भी व्यक्ति को नोटिस के प्रकाशन की तारीख से 30 दिनों के भीतर विवाह पर आपत्ति जताने की अनुमति देती है - यह उपबंध कपटपूर्ण या अवैध विवाहों को रोकने के उद्देश्य से बनाया गया है, तथापि यह सहमति से विवाह करने वाले दंपति के दुरुपयोग और उत्पीड़न का भी एक स्रोत रहा है।
- अधिनियम में विवाह संपन्न कराने के लिये "अविवाहित स्थिति प्रमाण पत्र" प्रस्तुत करने को सांविधिक रूप से अनिवार्य नहीं किया गया है, और विवाह अधिकारी स्पष्ट सांविधिक समर्थन के अभाव में ऐसी आवश्यकता को लागू नहीं कर सकते हैं - यही वह विवाद्यक है जिसे वर्तमान मामले में संबोधित किया गया है।
आयु संबंधी आवश्यकता:
- विशेष विवाह अधिनियम के अधीन विवाह के लिये न्यूनतम आयु पुरुषों के लिये 21 वर्ष और महिलाओं के लिये 18 वर्ष है, और वैध विवाह के लिये ये आवश्यकताएं अनिवार्य हैं।
उत्तराधिकार अधिकारों पर प्रभाव:
- विशेष विवाह अधिनियम के अधीन विवाह करने वाले व्यक्ति को व्यक्तिगत विधि के अधीन विरासत के अधिकारों के प्रयोजनों के लिये अपने परिवार से अलग माना जाता है, एक ऐसा परिणाम जिसने कुछ दंपति को अधिनियम के अधीन विवाह करने का विकल्प चुनने से हतोत्साहित किया है।
अधिनियम से जुड़े प्रमुख विवाद्यक:
- धारा 7 के अधीन आपत्ति दर्ज कराने के लिये दी गई 30 दिन की समय सीमा का अक्सर प्रयोग दंपतियों को परेशान करने और परिवार की इच्छा के विरुद्ध विवाह में देरी या बाधा डालने के लिये किया जाता है।
- नोटिसों का अनिवार्य प्रकाशन निजता संबंधी चिंताओं को जन्म देता है, जिससे दंपतियों की व्यक्तिगत जानकारी और विवाह योजनाओं का अवांछित रूप से निरीक्षण किया जा सकता है।
- विशेष विवाह अधिनियम के अधीन विवाह करने वाले अंतरजातीय और अंतरधार्मिक दंपतियों को सामाजिक कलंक, विभेद और चरम मामलों में उत्पीड़न या हिंसा का सामना करना पड़ता है।