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सांविधानिक विधि

अनुच्छेद 131 के अंतर्गत सांविधिक प्राधिकरणों के लिये कोई आरंभिक अधिकारिता नहीं है

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 31-Aug-2026

लखनऊ विकास प्राधिकरण बनाम भारत संघ और अन्य (2026) 

"अनुच्छेद 131 में 'राज्योंशब्द का तात्पर्य संविधान की प्रथम अनुसूची में सूचीबद्ध संघ के घटक राज्यों से हैजो अनुच्छेद 12 में परिभाषित 'राज्यसे भिन्न है।" 

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू 

उच्चतम न्यायालय  

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ नेलखनऊ विकास प्राधिकरण बनाम भारत संघ और अन्य (2026) के मामलेमें इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश को अपास्त कर दियाजिसमें लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) द्वारा दायर एक लंबे समय से लंबित रिट याचिका को खारिज कर दिया गया था और इसके बजाय पक्षकारों को अनुच्छेद 131 लागू करने की स्वतंत्रता दी गई थीयह मानते हुए कि एक सांविधिक प्राधिकरण उस उपबंध के तहअधीन त कार्यवाही नहीं कर सकता है। 

लखनऊ विकास प्राधिकरण बनाम भारत संघ और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) ने भारत सरकारकेंद्रीय कमान के GOC-in-C और लखनऊ छावनी उप-क्षेत्र के स्टेशन कमांडर के विरुद्ध इलाहाबाद उच्च न्यायालयलखनऊ पीठ के समक्ष एक रिट याचिका दायर की थी।  
  • यह विवाद उस जमीन से संबंधित था जिस पर लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) ने एक कॉलोनी विकसित की थी और लाभार्थियों को भूखंड और फ्लैट आवंटित किये थे।  
  • लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) के अनुसारकेंद्र सरकार और रक्षा प्रतिष्ठानों के अधिकारी आवंटियों के भौतिक कब्जे में हस्तक्षेप कर रहे थे और दावा कर रहे थे कि जमीन उनकी है।  
  • संबंधित अधिकारियों के बीच विवाद को सुलझाने के प्रयास विफल होने के बादउच्च न्यायालय ने 19 सितंबर, 2023 के आदेश द्वारा लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) की रिट याचिका को खारिज कर दियायह मानते हुए कि विवाद का निर्णय रिट कार्यवाही में नहीं किया जा सकता हैऔर पक्षकारों को अनुच्छेद 131 के अधीन कार्यवाही शुरू करने की स्वतंत्रता प्रदान की।           
  • इससे व्यथित होकर लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) ने अपील में उच्चतम न्यायालय का रुख किया।  

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • विवाद के संबंध में उच्च न्यायालय के दृष्टिकोण पर: 
    न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय ने विवाद की प्रकृति को मौलिक रूप से गलत समझा हैक्योंकि रिट याचिका स्वयं लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) द्वारा दायर की गई थीन कि उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा।        
  • अनुच्छेद 12 और अनुच्छेद 131 के अधीन लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) की स्थिति पर:  
    न्यायालय ने कहा कि लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन और विकास अधिनियम, 1973 के अधीन गठित एक सांविधिक निकाय हैऔर यद्यपि यह एक निगमित निकाय है जो अनुच्छेद 12 के अधीन "राज्य" की परिभाषा के अंतर्गत आ सकता हैलेकिन यह इसे अनुच्छेद 131 के प्रयोजनों के लिये "राज्य" नहीं बनाता है। 
  • अनुच्छेद 131 में "राज्य" शब्द के दायरे पर: 
    न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 131 उच्चतम न्यायालय को केवल भारत सरकार और एक या अधिक राज्यों के बीच या दो या अधिक राज्यों के बीच विवादों में ही आरंभिक अधिकारिता प्रदान करता हैऔर यह कि "राज्य" शब्द का तात्पर्य प्रथम अनुसूची में निर्दिष्ट संघ के घटक राज्यों से हैन कि अनुच्छेद 12 के अधीन "राज्य" की व्यापक परिभाषा में शामिल प्रत्येक प्राधिकरण या संस्था से। 
  • लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) द्वारा अनुच्छेद 131 का सहारा लेने की वैधता पर:  
    न्यायालय ने माना कि चूँकि अनुच्छेद 131 के खंड (क), (ख) और (ग) के अधीन अधिकारिता का प्रयोग केवल प्रथम अनुसूची में निर्दिष्ट राज्यों द्वारा ही किया जा सकता हैइसलिये अनुच्छेद 12 के अधीन प्राधिकरण या साधन के रूप में लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) के लिये अपने आरंभिक अधिकारिता में न्यायालय से संपर्क करना उचित नहीं था। 
  • उच्च न्यायालय की त्रुटि और विलंब पर: 
    न्यायालय ने उच्च न्यायालय के दृष्टिकोण को "घोर त्रुटि" बतायायह देखते हुए कि रिट याचिका लगभग ढाई दशकों से लंबित थीऔर इस आधार पर याचिका खारिज करने की आलोचना की कि विवाद संघ और राज्य के बीच का था। 
  • न्यायालय ने रिट याचिका को विधि के अनुसार नए सिरे से निर्णय लेने के लिये इलाहाबाद उच्च न्यायालय को वापस भेज दिया और याचिका दायर किये जाने के बाद से काफी समय बीत जाने के मद्देनजरउच्च न्यायालय से मामले का शीघ्रता से निपटारा करने का अनुरोध किया। 

भारत के संविधान का अनुच्छेद 131 क्या है? 

पृष्ठभूमि एवं उद्देश्य: 

अनुच्छेद 131 में उच्चतम न्यायालय की आरंभिक अधिकारिता से संबंधित उपबंध बताए गए हैं: 

  • संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुएकिसी भी विवाद में अन्य न्यायालयों को छोड़कर उच्चतम न्यायालय को ही आरंभिक अधिकारिता प्राप्त होगी 
    • भारत सरकार और एक या एक से अधिक राज्यों के बीचया 
    • भारत सरकार और किसी एक या एक से अधिक राज्यों के बीचएक पक्ष में और दूसरे पक्ष में एक या एक से अधिक अन्य राज्यों के बीचया 
    • दो या दो से अधिक राज्यों के बीच, 

यदि विवाद में कोई ऐसा प्रश्न (विधि का या तथ्य का) शामिल हो जिस पर किसी विधिक अधिकार का अस्तित्व या विस्तार निर्भर करता हो। 

  • परंतु: उक्त अधिकारिता किसी संधिकरारप्रसंविदावचनबद्धतासनद या अन्य वैसी ही अन्य लिखत से उत्पन्न विवाद पर लागू नहीं होगाजो संविधान के प्रारंभ होने से पहले किया गया हो या निष्पादित किया गया हो और ऐसे प्रारंभ होने के पश्चात भी लागू रहता होया जिसमें यह उपबंध हो कि उक्त अधिकारिता ऐसे विवाद पर लागू नहीं होगी 

अनुच्छेद 131 में "राज्य" शब्द की व्याख्या न्यायालयों द्वारा लगातार संघ के उन घटक राज्यों तक ही सीमित मानी गई है जिनका नाम संविधान की प्रथम अनुसूची में दिया गया हैऔर यह सांविधिक निकायोंनिगमों या अन्य संस्थाओं तक विस्तारित नहीं होता है जो भाग के मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के प्रयोजनों के लिये अनुच्छेद 12 में दी गई व्यापक परिभाषा के अधीन ही "राज्य" के रूप में अर्हता प्राप्त करते हैं। 

विधिक मामले: 

  • साउथ इंडिया कॉर्पोरेशन (पी.) लिमिटेड बनाम सचिवराजस्व बोर्डत्रिवेंद्रम और अन्य (1963): 
    • यह मामला अनुच्छेद 372 (विद्यमान विधियों के निरंतर लागू रहने और उनके अनुकूलन) के संदर्भ में सामने आया। 
    • न्यायालय ने कहा कि ऐसे प्रावधानों की उचित निर्वचन किया जाना चाहिये जो संविधान निर्माताओं के आशय को प्रतिबिंबित करे। 
  • भारत संघ और अन्य बनाम तुलसीराम पटेल (1985): 
    • यह मामला अनुच्छेद 309 (संघ या राज्य की सेवा करने वाले व्यक्तियों की भर्ती और सेवा की शर्तें) से संबंधित थाजिसमें यह उपबंध है कि एक सक्षम प्राधिकारी भर्ती और सेवा की शर्तों को विनियमित करने वाले नियम बना सकता हैऔर ऐसे नियम वैध होने के लिये "इस संविधान के उपबंधों के अधीन" होने चाहिये 
  • राजस्थान राज्य और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य (1977): 
    • उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अनुच्छेद 131 किसी विधिक अधिकार के अस्तित्व या विस्तार के आधार पर विवादों को सुलझाने के लिये एक मंच प्रदान करता है।