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आपराधिक कानून

दोषसिद्धि के लिये अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि डकैती ही प्राथमिक आशय था

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 31-Aug-2026

कृष्णा पाल और अन्य बनाम राज्य 

"अभियोजन पक्ष की कहानी से यह स्पष्ट होता है कि प्रथम सूचनादाता की मुलाकात और महावीर तथा उसके साथियों की उपस्थिति अचानक हुई थी। इसलिये अभियोजन पक्ष के अनुसारअभियुक्त का आशय हत्या सहित डकैती का नहीं कहा जा सकता।" 

न्यायमूर्ति समित गोपाल 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति समित गोपाल की पीठ नेकृष्णा पाल और अन्य बनाम राज्य (2026)में एक आपराधिक अपील को मंजूर करते हुए 1981 के एक मामले में जीवित अभियुक्त को दोषमुक्त कर दियायह मानते हुए कि अभियोजन पक्ष कथित डकैती और हत्या के बीच आवश्यक संबंध स्थापित करने में असफल रहा था जैसा कि धारा 396 भारतीय दण्ड संहिता (धारा 310 भारतीय न्याय संहिता) के अधीन दोषसिद्धि के लिये आवश्यक है। 

कृष्णा पाल और अन्य बनाम राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह मामला 30 दिसंबर, 1981 की एक घटना से जुड़ा हैजब अतर सिंह की चेहका गाँव के सामने एक पुलिया के पास हत्या कर दी गई थी। 
  • अभियोजन पक्ष के अनुसारमृतक अतार सिंह अपने पुत्रभाई और अन्य लोगों के साथ बस से उतरने के बाद यात्रा कर रहे थेतभी उनका सामना अभियुक्त महावीर और लगभग 12 सशस्त्र व्यक्तियों से हुआजिनके साथ महावीर की कथित तौर पर पहले से दुश्मनी थी। 
  • आरोप है कि महावीर ने अतर सिंह को चुनौती दी और तुरंत उस पर गोली चला दीअतर सिंह नेजिसके पास SBBL की लाइसेंसी बंदूक थीकथित तौर पर जवाबी फायरिंग कीजिससे महावीर के समूह के दो लोग घायल हो गए।  
  • आरोप है कि महावीर की ओर से और गोलीबारी हुईजिसके परिणामस्वरूप अतार सिंह को गोली लगने से चोटें आईंवह सड़क किनारे गिर गए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई। 
  • अभियोजन पक्ष ने आगे आरोप लगाया कि अभियुक्त चंद्रपाल ने गोलीबारी के बाद अतर सिंह की बंदूक और कारतूस बेल्ट छीन ली थी। 
  • FIR में शुरू में छह नामजद अभियुक्तों और 12 अज्ञात सशस्त्र व्यक्तियों के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता की धारा 147, 148, 149, 302 और 404 लगाई गई थीयद्यपिविचरण न्यायालय ने अभियुक्तों को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 396 के अधीन दोषसिद्ध ठहराया और उन्हें 10 वर्ष के कठोर कारावास का दण्ड दिया।  
  • अपील लंबित रहने के दौरानकृष्ण पालराम लालमुंशी सिंह और चंद्रपाल की मृत्यु हो गई और उनके विरुद्ध अपीलें समाप्त हो गईंकेवल सत्तू के संबंध में अपील ही जीवित रहीजिसकी दोषसिद्धि की उच्च न्यायालय द्वारा परीक्षा की गई। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • भारतीय दण्ड संहिता की धारा 396 के तत्त्व: 
    न्यायालय ने परीक्षा की कि क्या अभियोजन साक्ष्य धारा 396 भारतीय दण्ड संहिता के तत्त्वों को स्थापित करता हैजो उस स्थिति में लागू होती है जब पाँच या दो से अधिक व्यक्ति संयुक्त रूप से डकैती करते हुए डकैती के दौरान हत्या करते हैंऔर धारा 391 भारतीय दण्ड संहिता का संदर्भ दियाजिसके अधीन पाँच या दो से अधिक व्यक्ति संयुक्त रूप से डकैती करते हैं या डकैती करने का प्रयत्न करते हैं तो वह डकैती का गठन करते है। 
  • डकैती करने के पूर्व आशय के अभाव पर: 
    न्यायालय ने पाया कि अभियोजन पक्ष के स्वयं के बयान से यह साबित नहीं होता कि अभियुक्त डकैती करने के आशय से घटनास्थल पर गया थाक्योंकि दोनों पक्ष अचानक मिले थे और महावीर ने पूर्व-स्थापित शत्रुता के कारण अतर सिंह को चुनौती दी थीऔर इस अचानक मुठभेड़ के परिणामस्वरूप गोलीबारी और मृत्यु हुई तथा बंदूक और कारतूस बेल्ट की लूट उसके बाद ही हुई। 
  • डकैती और हत्या के बीच संबंध के अभाव पर: 
    न्यायालय ने माना कि अभियोजन पक्ष की कहानी भारतीय दण्ड संहिता की धारा 396 के अधीन दोषसिद्धि के अनुरूप नहीं थीक्योंकि इस उपबंध में पाँच या दो से अधिक व्यक्तियों द्वारा संयुक्त रूप से डकैती को पहले कृत्य के रूप में और फिर उसी डकैती के दौरान हत्या को अंजाम देने की परिकल्पना की गई हैजबकि वर्तमान मामले में ऐसा कोई क्रम और डकैती करने तथा हत्या के बीच कोई संबंध स्थापित नहीं किया गया था। 
  • डकैत गिरोह के साक्ष्य के अभाव में: 
    न्यायालय ने पाया कि अतार सिंह और महावीर के बीच व्यक्तिगत शत्रुता के कारण दोनों पक्ष अचानक मिले थेऔर यह दिखाने के लिये कोई साक्ष्य अभिलेख पर नहीं लाया गया था कि महावीर डकैतों के एक गिरोह का नेतृत्व करता था जिसमें जीवित अपीलकर्त्ता भी शामिल था। 
  • पुष्टि करने वाली परिस्थितियों पर: 
    न्यायालय ने यह भी सुसंगत पाया कि कई व्यक्तियों द्वारा कथित गोलीबारी के होते हुए भीसूचनाकर्त्ता की ओर से कोई अन्य व्यक्ति घायल नहीं हुआ थाऔर जीवित अपीलकर्त्ता सत्तू के कब्जे से या किसी भी पहचान ज्ञापन के माध्यम से कोई भी आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं की गई थी। 
  • न्यायालय ने तदनुसार अपील मंजूर कर लीएटा के अतिरिक्त जिला एवं सेशन न्यायाधीश (विशेष न्यायालय) द्वारा दिनांक नवंबर, 1982 को पारित निर्णय को अपास्त कर दिया और जीवित अपीलकर्त्ता को आरोपों से दोषमुक्त कर दिया। 

भारतीय न्याय संहिता की धारा 310 क्या है? 

भारतीय न्याय संहिता की धारा 310— डकैती: 

  • उपधारा (1) — डकैती की परिभाषा: 
    जबकि पाँच या अधिक व्यक्ति संयुक्त होकर लूट करते हैं या करने का प्रयत्न करते हैं या जहाँ कि वे व्यक्तिजो संयुक्त होकर लूट करते हैं या करने का प्रयत्न करते हैं और वे व्यक्ति जो उपस्थित हैं और ऐसे लूट के किये जाने या ऐसे प्रयत्न में मदद करते हैंकुल मिलाकर पाँच या अधिक हैंतब प्रत्येक व्यक्ति जो इस प्रकार लूट करता हैया उसका प्रयत्न करता है या उसमें मदद करता हैकहा जाता है कि वह 'डकैती करता है 
  • उपधारा (2) - डकैती के लिये दण्ड: 
    जो कोई डकैती करेगावह आजीवन कारावास सेया कठिन कारावास सेजिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगीदण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा 
  • उपधारा (3) - हत्या सहित डकैती: 
    यदि ऐसे पाँच या अधिक व्यक्तियों में सेजो संयुक्त होकर डकैती कर रहे होंकोई एक व्यक्ति इस प्रकार डकैती करने में हत्या कर देगातो उन व्यक्तियों में से प्रत्येक व्यक्ति मृत्यु सेया आजीवन कारावास सेया कठोर कारावास सेजिसकी अवधि दस वर्ष से कम नहीं होगीदण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा 
  • उपधारा (4) - डकैती करने की तैयारी: 
    जो कोई डकैती करने के लिये कोई तैयारी करेगावह कठिन कारावास सेजिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगीदण्डित किया जाएगाऔर जुर्माने का भी दायी होगा 
  • उपधारा (5) - डकैती के प्रयोजन से सभा: 
    जो कोई डकैती करने के प्रयोजन से एकत्रित पाँच या अधिक व्यक्तियों में से एक होगावह कठिन कारावास सेजिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगीदण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा 
  • उपधारा (6) - डकैतों की टोली से संबंधित: 
    जो कोई ऐसे व्यक्तियों की टोली का होगा जोअभ्यासतः डकैती करने के प्रयोजन से सहयुक्त हों वह आजीवन कारावास सेया कठिन कारावास सेजिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगीदण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा