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सांविधानिक विधि

अनुच्छेद 25 के अधीन धार्मिक जुलूस के लिये किसी विशेष मार्ग को चुनने का कोई अधिकार नहीं है

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 27-Aug-2026

दीपक पुत्र देवीदास नेचवानी बनाम महाराष्ट्र राज्य (2026) 

"भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के अधीन प्रदत्त धर्म का पालन करने का अधिकार निश्चित रूप से विधि और व्यवस्थालोक व्यवस्था और जनसंख्या के अन्य वर्गों की आवश्यकताओं के व्यापक हित के अधीन है।" 

बॉम्बे उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति अनिल एस. किलोर और न्यायमूर्ति रजनीश आर. व्यास की खंडपीठ नेदीपक एस./ओ​​देवीदास नेचवानी बनाम महाराष्ट्र राज्य (2026) के मामलेमें पुलिस द्वारा एक विशिष्ट मार्ग पर कावड़ यात्रा की अनुमति देने से इंकार करने को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका को खारिज कर दियायह मानते हुए कि अनुच्छेद 25 किसी विशेष तरीके से या किसी विशेष मार्ग पर धर्म का पालन करने का अधिकार प्रदान नहीं करता हैऔर ऐसा अभ्यास विधि और व्यवस्था संबंधी विचारों के अधीन रहता है। 

दीपक पुत्र देवीदास नेचवानी बनाम महाराष्ट्र राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ता ने कावड़ यात्रा के लिये अनुमति मांगी थीजो लगभग 3.5 किलोमीटर की एक शोभायात्रा होती हैजिसके दौरान महादेव घाट से लिया गया पवित्र जल कांवड़ में ले जाकर जलाभिषेक किया जाना था। 
  • अगस्त, 2026 के आदेश द्वारापुलिस उपायुक्त ने याचिकाकर्त्ता द्वारा प्रस्तावित मार्ग पर जुलूस निकालने की अनुमति देने से इंकार कर दिया। 
  • याचिकाकर्त्ता ने इस आदेश को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि इसे बिना किसी पूर्व सूचना या सुनवाई के पारित किया गया थाऔर यह भी कहा कि प्रत्येक धार्मिक समूह को किसी भी सड़क से धार्मिक जुलूस निकालने का मौलिक अधिकार हैऔर अन्य धार्मिक समूहों से संबंधित पूजा स्थलों की उपस्थिति अनुमति देने से इंकार करने का आधार नहीं हो सकती है। 
  • राज्य ने यह तर्क दिया कि जुलूस की अनुमति पूरी तरह से अस्वीकार नहीं की गई थीकेवल याचिकाकर्त्ता द्वारा मांगे गए विशिष्ट मार्ग की अनुमति नहीं दी गई थीऔर इसके बजाय एक वैकल्पिक मार्ग का सुझाव दिया गया था। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • अनुच्छेद 25 के अधीन अधिकार की प्रकृति पर: 
    न्यायालय ने माना कि अपने धर्म का पालन करने का अधिकार विधि और व्यवस्थालोक व्यवस्था और आबादी के अन्य वर्गों की आवश्यकताओं के व्यापक हित के अधीन हैजहाँ इस अधिकार के किसी विशेष तरीके से प्रयोग से ये प्रतिकूल रूप से प्रभावित होते हैंऔर स्पष्ट किया कि धर्म का पालन करने के अधिकार का प्रयोगकिसी विशेष तरीके से धर्म का पालन करने के अधिकार से भिन्न है। 
  • अनुमति से कथित इंकार के संबंध में: 
    न्यायालय ने इस तर्क को गलत पाया कि अनुमति देने से इंकार कर दिया गया थाक्योंकि याचिकाकर्त्ता को वास्तव में जुलूस निकालने की अनुमति दी गई थीलेकिन उसके द्वारा प्रस्तावित मार्ग पर नहींअपितु पुलिस प्रशासन द्वारा सुझाए गए वैकल्पिक मार्ग पर। 
  • वैकल्पिक मार्ग के औचित्य पर: 
    न्यायालय ने पुलिस द्वारा दिये गए कारणों से सहमति व्यक्त कीजिसमें उसी मार्ग पर पहले हुई विधि-व्यवस्था की घटनाएं भी शामिल थींऔर यह माना कि पुलिस द्वारा वैकल्पिक मार्ग सुझाने में कोई त्रुटि नहीं थी। 
  • संबंधित मंदिर की निजी प्रकृति के संबंध में: 
    न्यायालय ने पाया कि कावड़ यात्रा का हिस्सा बनने वाला मंदिर निजी संपत्ति हैजो किसी न्यास या सरकार की नहीं हैऔर पुलिस को इसके स्वामी से परिवाद प्राप्त हुए थे। न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्त्ता किसी निजी व्यक्ति को निजी मंदिर की संपत्ति पर क्रियाकलापों में भाग लेने के लिये बाध्य नहीं कर सकता। 
  • किसी विशेष मार्ग के अधिकार के अभाव पर: 
    न्यायालय ने माना कि जहाँ अधिकारीभौतिक और भौगोलिक स्थिति तथा अन्य समुदायों के विचारों का आकलन करने के बादयह निर्णय लेते हैं कि किसी विशेष प्रस्तावित मार्ग की अनुमति नहीं दी जा सकती हैवहाँ याचिकाकर्त्ता को उस मार्ग पर जोर देने का कोई अंतर्निहित अधिकार नहीं है। 
  • तदनुसारन्यायालय ने याचिकाकर्त्ता के प्रस्तावित मार्ग को अस्वीकार करने और वैकल्पिक मार्ग सुझाने में पुलिस द्वारा किसी भी प्रकार की अवैधता नहीं पाईरिट अधिकारिता में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया और याचिका खारिज कर दी। 

भारत के संविधान का अनुच्छेद 25 क्या है? 

पृष्ठभूमि एवं उद्देश्य: 

  • अनुच्छेद 25 सभी व्यक्तियों को अंत: करण की स्वतंत्रता और धर्म को स्वतंत्र रूप से माननेउसका आचरण करने और उसका प्रचार करने का अधिकार प्रदान करता है। 
  • यह अधिकार निरपेक्ष नहीं है और इसे स्पष्ट रूप से लोक व्यवस्थानैतिकतास्वास्थ्य और संविधान के भाग के अन्य प्रावधानों के अधीन बनाया गया है। 

मुख्य बातें: 

  • अंत: करण की स्वतंत्रता: प्रत्येक व्यक्ति को अपनी अंतरात्मा के अनुसार धार्मिक या गैर-धार्मिक विश्वास रखने की स्वतंत्रता है।  
  • विश्वास को माननेउसका आचरण करने और उसका प्रचार करने का अधिकार: यह पूजाअनुष्ठानों और रीति-रिवाजों के माध्यम से विश्वास की बाहरी अभिव्यक्ति तक विस्तारित हैलेकिन ऐसी अभिव्यक्ति के किसी विशेष तरीके या ढंग तक नहीं। 
  • लोक व्यवस्था के अधीन: राज्य इस अधिकार के प्रयोग के तरीके को विनियमित या प्रतिबंधित कर सकता हैजिसमें जुलूस और उनके मार्ग शामिल हैंजहाँ विधि और व्यवस्था या लोक व्यवस्था को बनाए रखने के लिये आवश्यक हो। 
  • धर्म का पालन करने के तरीके का कोई पूर्ण अधिकार नहीं: धर्म का पालन करने का अधिकार किसी विशिष्ट तरीके सेजैसे किसी विशिष्ट मार्ग पर या किसी विशिष्ट निजी स्थान परऐसा करने के असीमित अधिकार में तब्दील नहीं होता हैविशेषत: जहाँ ऐसा आचरण दूसरों के अधिकारों या हितों से टकराता हो।