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सिविल कानून
वरिष्ठ नागरिक अधिकरण माता-पिता की संपत्ति से संतानों की बेदखली का आदेश पारित कर सकता है
« »19-Aug-2026
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रवि कांत गुप्ता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य "एक सभ्य समाज की पहचान अक्सर इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों को कितनी गरिमा, सम्मान और सुरक्षा प्रदान करता है।" न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ ने रवि कांत गुप्ता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को अपास्त कर दिया और यह अभिनिर्धारित किया कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के अंतर्गत अधिकरणों के पास वरिष्ठ नागरिक के भरण-पोषण और संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिये बेदखली का आदेश देने की शक्ति है, जिससे अपीलकर्त्ता के पुत्र और बहू के विरुद्ध पारित बेदखली आदेश को बहाल किया गया।
रवि कांत गुप्ता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अपीलकर्त्ता रवि कांत गुप्ता, लखनऊ के विकास नगर में स्थित एक स्व-अर्जित आवासीय मकान के स्वामी हैं।
- आरोप है कि अपीलकर्त्ता की 81 वर्षीय माता को आवासीय परिसर छोड़ने के लिये मजबूर किया गया और उन्हें एक वृद्धाश्रम में रहने के लिये मजबूर किया गया।
- अपीलकर्त्ता ने 05.06.2022 को जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के अधीन अपने पुत्र को बेदखल करने की मांग की।
- उप-मंडल मजिस्ट्रेट ने दिनांक 15.11.2022 के आदेश द्वारा पाया कि संपत्ति अपीलकर्त्ता की स्व-अर्जित संपत्ति थी और यह अभिलिखित किया कि पुत्र ने दादी को घर में रहने की अनुमति नहीं दी थी और उपद्रव किया था। तदनुसार, उप-मंडल मजिस्ट्रेट ने पुत्र को बेदखल करने का आदेश दिया।
- जिला मजिस्ट्रेट ने दिनांक 09.08.2023 के आदेश द्वारा उप-मंडल मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा और पुत्र और उसकी पत्नी को परिसर का कब्जा अपीलकर्त्ता को सौंपने का निदेश दिया।
- पुत्र और उसकी पत्नी ने दोनों आदेशों को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी।
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक पूर्व निर्णय पर विश्वास करते हुए यह माना कि अधिनियम अधिकारियों को बेदखली का आदेश पारित करने का अधिकार नहीं देता है, और तदनुसार उप-मंडल मजिस्ट्रेट और जिला मजिस्ट्रेट के आदेशों को रद्द कर दिया।
- इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- उच्च न्यायालय की त्रुटि पर: उच्चतम न्यायालय ने माना कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अधिकरण के बेदखली आदेश में हस्तक्षेप करके त्रुटि की, क्योंकि यह स्थापित विधि है कि अधिनियम के अधीन अधिकरण वरिष्ठ नागरिक के कल्याण और संरक्षण के लिये बेदखली का आदेश देने के लिये सशक्त हैं।
- सांविधिक योजना पर: न्यायालय ने पाया कि अधिनियम की धारा 7 के अंतर्गत अधिकरणों का गठन किया गया है और उन्हें धारा 8 के अंतर्गत सिविल न्यायालयों की शक्तियों का प्रयोग करते हुए संक्षिप्त प्रक्रिया के अधीन जांच करने का अधिकार प्राप्त है। अधिनियम की धारा 27 स्पष्ट रूप से सिविल न्यायालयों की आशिकारित को प्रतिबंधित करती है। न्यायालय ने कहा कि जहाँ कोई संविधि अधिकारिता प्रदान करती है, वहाँ वह निहित रूप से उन सभी कार्यों को करने या उन साधनों का उपयोग करने की शक्ति भी प्रदान करता है जो उस अधिकारिता को प्रभावी बनाने के लिये अनिवार्य रूप से आवश्यक हैं।
- सांविधानिक आधार पर: न्यायालय ने माना कि वृद्धजनों को मिलने वाली गरिमा, सम्मान और सुरक्षा एक सभ्य समाज की पहचान है, और वरिष्ठ नागरिक मात्र आश्रित नहीं अपितु ज्ञान और अनुभव के भंडार हैं। न्यायालय ने पाया कि संविधान का अनुच्छेद 21, जैसा कि न्यायालय द्वारा व्याख्यायित किया गया है, अनुच्छेद 41 के साथ मिलकर एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की परिकल्पना करता है जो कमजोर वर्ग की रक्षा करती है और प्रत्येक व्यक्ति को जीवन भर गरिमापूर्ण जीवन जीने में सक्षम बनाती है। इस अधिनियम को इस सांविधानिक आदेश की सांविधिक अभिव्यक्ति माना गया, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बढ़ती आयु उपेक्षा, असुरक्षा या अपमान का पर्याय न बन जाए, और वरिष्ठ नागरिकों को शीघ्र अनुतोष प्रदान करना है।
- पूर्व निर्णय के संदर्भ में : एस. वनिता बनाम उपायुक्त, बेंगलुरु शहरी जिला एवं अन्य (2021) के मामले का हवाला दिया गया, जिसमें तीन न्यायाधीशों की पीठ ने अधिनियम और घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 के अंतर्गत उत्पन्न दावों पर विचार करते हुए यह माना कि वरिष्ठ नागरिक या संरक्षक के भरण-पोषण और संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिये जहाँ आवश्यक और उचित हो, वहाँ अधिकरण बेदखली का आदेश दे सकता है, और ऐसी बेदखली भरण-पोषण एवं संरक्षण के अधिकार के प्रवर्तन का एक हिस्सा होगी। यह दृष्टिकोण समतोला देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (2025) और कमलाकांत मिश्रा बनाम अतिरिक्त कलेक्टर एवं अन्य (2025) के मामलों में भी दोहराया गया है।
- अनुतोष प्राप्त होने पर: न्यायालय ने अपील मंजूर कर ली, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को अपास्त कर दिया और अपीलकर्त्ता के पुत्र और उसकी पत्नी को बेदखल करने के अधिकरण के आदेश की पुष्टि की।
माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 क्या है?
विधिक ढाँचा:
- भारत में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण के लिये अधिक प्रभावी उपबंध प्रदान करने के लिये माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 को अधिनियमित किया गया था।
- इस अधिनियम के अनुसार, "वरिष्ठ नागरिक" वह व्यक्ति है जो भारत का नागरिक है और जिसकी आयु 60 वर्ष या उससे अधिक हो चुकी है।
- यह अधिनियम यह सुनिश्चित करना चाहता है कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक बेसहारा या उपेक्षित न रह जाएं, इसके लिये बालकों और नातेदारों पर भरण-पोषण का सांविधिक दायित्व डाला गया है, साथ ही सामान्य सिविल मुकदमेबाजी का सहारा लेने की आवश्यकता के बजाय प्रवर्तन के लिये एक त्वरित, अधिकरण-आधारित तंत्र प्रदान किया गया है।
मुख्य उपबंध :
- भरण-पोषण दायित्व (धारा 4-18) – बालकों पर अपने माता-पिता का भरण-पोषण करने का विधिक दायित्व है, जिससे वे सामान्य जीवन जी सकें। संतानहीन वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति के मालिक या उत्तराधिकारी संबंधी भी इसी प्रकार उस वरिष्ठ नागरिक का भरण-पोषण करने के लिये बाध्य हैं।
- अधिकरणों की स्थापना (धारा 7) – राज्य सरकारों को प्रत्येक उप-मंडल के लिये भरण-पोषण अधिकरण स्थापित करने की आवश्यकता है, जो वरिष्ठ नागरिकों और माता-पिता द्वारा या उनकी ओर से दायर भरण-पोषण के दावों पर निर्णय लेने और निर्णय करने के लिये सशक्त होंगे।
- संक्षिप्त प्रक्रिया (धारा 8) – अधिकरण जांच के लिये संक्षिप्त प्रक्रिया का पालन करता है और सिविल न्यायालय की शक्तियों का प्रयोग करता है, जिसमें साक्षियों को समन और दस्तावेजों का उत्पादन शामिल है।
- संपत्ति अंतरण (धारा 23) – जहाँ किसी वरिष्ठ नागरिक ने दान या अन्य किसी प्रकार से संपत्ति अंतरित की है, इस शर्त के अधीन कि अंतरीति मूल सुविधाएं और भौतिक आवश्यकताएं प्रदान करेगा, और अंतरीति ऐसा करने में विफल रहता है, तो अंतरण को कपट, प्रपीड़नया असम्यक् असर द्वारा किया गया माना जाएगा और अंतरणकर्त्ता के विकल्प पर इसे शून्य घोषित किया जा सकता है।
- वृद्धाश्रम (धारा 19) – राज्य सरकारों को प्रत्येक जिले में जरूरतमंद वरिष्ठ नागरिकों के लिये कम से कम एक वृद्धाश्रम स्थापित करना या उसकी स्थापना में सहायता करना अनिवार्य है।
- चिकित्सा सहायता (धारा 20) - राज्य सरकारों पर वरिष्ठ नागरिकों के लिये चिकित्सा देखरेख का प्रावधान सुनिश्चित करने का कर्त्तव्य डालती है, जिसमें मौजूदा अस्पतालों में बिस्तर, अलग कतारें और आयु से संबंधित बीमारियों के लिये विशेष उपचार शामिल हैं।
- जीवन और संपत्ति की सुरक्षा (धारा 21-23) - अधिनियम के प्रावधानों के प्रचार और जागरूकता के लिए उपाय प्रदान करता है, और वरिष्ठ नागरिकों को संपत्ति के परित्याग और बेदखली से बचाता है।
- सिविल न्यायालयों पर प्रतिबंध (धारा 27) - अधिनियम के अधीन अधिकरण को सशक्त किये गए किसी भी मामले के संबंध में सिविल न्यायालयों की अधिकारिता को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित करता है, जिससे भरण-पोषण अधिकारों के प्रवर्तन के लिये एक स्व-निहित संहिता के रूप में अधिनियम की योजना को सुदृढ़ किया जा सके।