9 मार्च से शुरू हो रहे हमारे ऑल-इन-वन ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स के साथ अपनी ज्यूडिशियरी की तैयारी को मजबूत बनाएं | यह कोर्स अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों माध्यमों में उपलब्ध है।   |   आज ही हमारे ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स में एडमिशन लें और अपनी तैयारी को और बेहतर बनाएँ | हिंदी माध्यम बैच: 9 मार्च, सुबह 8 बजे   |   आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   ज्यूडिशियरी की तैयारी अब हिंदी माध्यम में! दृष्टि ज्यूडिशियरी का नया बैच 22 जून 2026 से शुरू | आज ही एडमिशन लें | ऑनलाइन व ऑफलाइन दोनों मोड में उपलब्ध |   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से







होम / करेंट अफेयर्स

सिविल कानून

धारा 9: असाधारण मामलों में असफल पक्ष द्वारा आवेदन पोषणीय है

    «    »
 12-Aug-2026

नेशनल प्रोजेक्ट्स कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम इश्वको (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड 

"न्यायालय दुर्लभ और बाध्यकारी मामलों मेंअपूरणीय क्षति को रोकने और धारा 34 के अधीन चुनौती की वैधता को बनाए रखने के लिये असफल पक्ष को धारा का सहारा लेने की अनुमति दे सकती है।" 

न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति आलोक आराधे 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ नेनेशनल प्रोजेक्ट्स कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम इश्वको (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि पंचाट धारक द्वारा बैंक प्रत्याभूति के माध्यम से अनुचित संवर्धन को रोकने के लियेजबकि पंचाट चुनौती के अधीन हैमाध्यस्थम्और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा के अधीन अंतरिम अनुतोष पंचाट देनदार के आवेदन पर धारा 34 के अधीन चुनौती की प्रभावकारिता को संरक्षित करने के लिये दिया जा सकता है। 

  • न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस निर्णय में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दियाजिसमें प्रत्यर्थी -पंचाट देनदार के धारा के अधीन दायर उस आवेदन को स्वीकार कर लिया गया थाजिसमें अपीलकर्त्ता-पंचाट धारक द्वारा धारा 34 के आवेदन के लंबित रहने के दौरान लगभग 3.5 करोड़ रुपए की बैंक प्रत्याभूति से कथित अनुचित लाभ के विरुद्ध अंतरिम अनुतोष की मांग की गई थी। 

नेशनल प्रोजेक्ट्स कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम इश्वको (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • वर्ष 2002 में नेशनल प्रोजेक्ट्स कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन लिमिटेड और इश्वको (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये गए थेजिसके अधीन प्रत्यर्थी को बैंक प्रत्याभूति के बदले 3.5 करोड़ रुपए का अग्रिम राशि जुटाने का काम सौंपा गया था। 
  • 2005 मेंउच्च न्यायालय ने धारा के अधीन दायर एक आवेदन का निपटारा इस समझ के साथ किया कि अपीलकर्त्ता बैंक प्रत्याभूति का उपयोग तब तक नहीं करेगा जब तक कि वे सक्रिय रखी जाती हैंऔर प्रत्याभूति का प्रयोग केवल तभी किया जा सकता है जब माध्यस्थम्अपीलकर्त्ता को राशि वसूल करने का हकदार पाए। 
  • प्रत्यर्थी प्रत्याभूति को बरकरार रखने में विफल रहाजिसके कारण अपीलकर्त्ता ने सितंबर 2017 में उनका सहारा लिया। 
  • मध्यस्थ ने दिसंबर, 2017 को पंचाट देते समय प्रत्यर्थी के दावों को खारिज कर दिया और इस बात से अनभिज्ञ रहा कि बैंक प्रत्याभूति पहले ही भुनाई जा चुकी थी। 
  • प्रत्यर्थी ने धारा 34 के अधीन पंचाट को चुनौती दी और इसके लंबित रहने के दौरानराशि की वापसी की मांग करते हुए एक नया धारा आवेदन दायर किया। 
  • एकल न्यायाधीश ने आवेदन मंजूर कर लिया और अपीलकर्त्ता को रजिस्ट्री में 3.5 करोड़ रुपए जमा करने का निदेश दियाएक ऐसा आदेश जिसे खंडपीठ ने बरकरार रखाजिसके कारण पंचाट धारक ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • पंचाट के बाद धारा के अधीन दायर आवेदनों की स्वीकार्यता पर:न्यायालय ने कहा कि पूर्व निर्णयों से यह मान्यता मिलती है कि पंचाट के बाद धारा के अधीन दायर आवेदन स्वीकार्य हैलेकिन साथ ही यह चेतावनी भी दी कि अंतरिम अनुतोष प्रदान करने की सीमा तब अधिक होती है जब आवेदन किसी पंचाट देनदार द्वारा दायर किया जाता है। 
  • उपचार की असाधारण प्रकृति पर:न्यायालय ने माना कि न्यायालय दुर्लभ और बाध्यकारी मामलों मेंअपूरणीय पूर्वाग्रह को रोकने और धारा 34 के अधीन चुनौती की प्रभावकारिता को बनाए रखने के लिये असफल पक्ष को धारा का आह्वान करने की अनुमति दे सकता है। 
  • अनुचित संवर्धन के संबंध में:न्यायालय ने माना कि धारा 34 के आवेदन के निपटारे तक अपीलकर्ता को धन रखने की अनुमति देने से अपीलकर्ता को अनुचित रूप से लाभ होगाऔर उच्च न्यायालय द्वारा ऐसा अवलोकन करना उचित था। 
  • धारा के अधीन अनुतोष के लिये निर्धारित मापदंडों की पूर्ति पर:न्यायालय ने माना कि प्रत्यर्थी ने अनुतोष के लिये एक दुर्लभ और बाध्यकारी मामला प्रस्तुत किया हैक्योंकि उसने धारा के अधीन अनुतोष प्राप्त करने के लिये आवश्यक मापदंडों को पूरा किया है - अर्थात्प्रथम दृष्टया मामला और सुविधा का संतुलन - क्योंकि धारा 34 के आवेदन के लंबित रहने के दौरान अपीलकर्त्ता द्वारा धन को अपने पास रखना अपीलकर्त्ता को अनुचित रूप से समृद्ध करेगा। 
  • अनुतोष प्राप्त होने पर:न्यायालय ने अपील खारिज कर दी और अपीलकर्त्ता को बैंक प्रत्याभूति राशि उच्च न्यायालय की रजिस्ट्री को सौंपने का निदेश दियासाथ ही अपीलकर्त्ता को दिल्ली उच्च न्यायालय की रजिस्ट्री में 3.5 करोड़ रुपए जमा करने के लिये चार सप्ताह का समय दियाजिसे धारा 34 के आवेदन के निपटारे तक स्वतः नवीनीकरण के आधार पर सावधि जमा में रखा जाएगा।

माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा क्या है? 

  • धारा न्यायालयों को माध्यस्थम् कार्यवाही से पूर्वउसके दौरान या उसके पश्चातलेकिन माध्यस्थम् पंचाट के प्रवर्तन से पहले, सुरक्षा के अंतरिम उपचार प्रदान करने का अधिकार देती है ।  
  • माध्यस्थम् करार का कोई भी पक्ष माध्यस्थम् प्रक्रिया के दौरान विभिन्न सुरक्षात्मक उपायों के लिये अंतरिम अनुतोष की मांग करते हुएन्यायालय से संपर्क कर सकता है। 
  • इस प्रावधान के अंतर्गत माध्यस्थम् कार्यवाही के प्रयोजनों के लियेन्यायालय अवयस्कों या विकृत चित्त व्यक्तियों के लिये संरक्षक नियुक्त कर सकता है । 
  • न्यायालयों को माध्यस्थम् करार की विषय-वस्तु से संबंधितवस्तुओं को संरक्षित करनेअंतरिम अभिरक्षा प्रदान करने या उनकी बिक्री का आदेश देने का अधिकार है । 
  • यह उपबंध न्यायालयों को अंतिम निर्णय के प्रभावी प्रवर्तन को सुनिश्चित करने के लिये माध्यस्थम् मेंविवादित राशि को सुरक्षित करने की अनुमति देता है ।  
  • न्यायालय माध्यस्थम् विवाद से संबंधितकिसी भी संपत्ति को अभिरक्षा में रखनेसंरक्षित करने या निरीक्षण करने का आदेश दे सकते हैं और आवश्यक अवलोकन या प्रयोगों के लिये परिसर में प्रवेश को अधिकृत कर सकते हैं। 
  • इस धारा के अधीन न्यायालयों द्वारा अंतरिम व्यादेश और रिसीवर की नियुक्ति कीजा सकती है जिससे माध्यस्थम् के दौरान यथास्थिति बनाए रखी जा सके। 
  • एक बार माध्यस्थम् अधिकरण का गठन हो जाने के बादन्यायालय धारा के अधीन आवेदनों पर विचार नहीं कर सकते, जब तक कि ऐसी परिस्थितियाँ मौजूद न हों जो धारा 17 के उपचारों (अधिकरण के अंतरिम उपायों) को अप्रभावी बना दें। 
  • यदि माध्यस्थम् प्रारंभ होने से पहले अंतरिम उपचार प्रदान किये जाते हैंतो माध्यस्थम् की कार्यवाहीन्यायालय के आदेश के 90 दिनों के भीतर या न्यायालय द्वारा निर्धारित विस्तारित समय सीमा के भीतर शुरू होनी चाहिये