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आपराधिक कानून

प्रारंभ से ही बेईमानी के आशय के बिना विवाह के वचन का भंग छल नहीं है

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 10-Aug-2026

एल. बनाम उड़ीसा राज्य 

"केवल किसी वचन का भंगइस बात के सबूत के बिना कि वचन मिथ्या था और प्रारंभ से ही बेईमानी से किया गया थाअपने आप में छल का अपराध नहीं होगा।" 

न्यायमूर्ति सिबो शंकर मिश्रा 

स्रोत: ओडिशा उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उड़ीसा उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सिबो शंकर मिश्रा की पीठ नेएल. बनाम उड़ीसा राज्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया किभारतीय दण्ड संहिता की धारा 417 (भारतीय न्याय संहिता की धारा 318(2)) के अधीन छल के लिये दोषसिद्धिविवाह के वचन पर तब तक कायम नहीं रह सकती जब तक कि अभियोजन पक्ष यह साबित न कर दे कि वचन मिथ्या था और प्रारंभ से ही बेईमानी से किया गया थाऔर अभियुक्त का इसे पूरा करने का कोई आशय नहीं था। 

  • न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 417 के अधीन अपीलकर्त्ता की दोषसिद्धि को अपास्त कर दियायह मानते हुए कि विवाह के वचन को पूरा करने में मात्र पश्चातवर्ती विफलता अपने आप में छल के समान नहीं है। 

एल. बनाम उड़ीसा राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता और पीड़िता के बीच संबंध थेऔर आरोप है कि अपीलकर्त्ता ने विवाह का आश्वासन देकर पीड़िता के साथ लैंगिक संबंध बनाए। 
  • जब ग्रामीणों को इस रिश्ते के बारे में पता चलातो अपीलकर्त्ता गाँव छोड़कर चला गया। इसके बादपीड़िता के माता-पिता ने उसका विवाह किसी और से तय कर दी। 
  • विवाह की तय तारीख परअपीलकर्त्ता ने कथित तौर पर दूल्हे के परिवार से संपर्क किया और पीड़िता के साथ अपने रिश्ते का प्रकटन कियाजिसके बाद दूल्हे के परिवार ने विवाह रद्द कर दिया 
  • जब पीड़िता ने अभियुक्त से विवाह का प्रस्ताव रखातो उसने इंकार कर दिया। इसके बाद उसके विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 (बलात्संग) और धारा 417 (छल) के अधीन प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई। 
  • विचारण न्यायालय ने माना कि अपीलकर्त्ता और पीड़िता एक-दूसरे से प्रेम करते थे और पीड़िता ने लैंगिक संबंध के परिणामों की जानकारी होते हुए भी सहमति दी थीतदनुसारन्यायालय ने उसे धारा 376 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन दोषमुक्त कर दिया। यद्यपिउसे धारा 417 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन छल का दोषी ठहराया गयाइस आधार पर कि उसने विवाह का आश्वासन देने के बावजूद पीड़िता से शादी करने से इंकार कर दिया था। 
  • अपीलकर्त्ता ने उड़ीसा उच्च न्यायालय में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 417 के अधीन दोषसिद्धि को चुनौती दी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • विवाह के वचन पर आधारित छल के तत्त्वों पर:न्यायालय ने माना कि केवल वचन का भंगइस बात के सबूत के बिना कि वचन मिथ्या था और बेईमानी से किया गया थाअपने आप में छल नहीं है। अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि वचन प्रारंभ से ही मिथ्या था और अभियुक्त का वचन करते समय उसे पूरा करने का कोई आशय नहीं था। 
  • प्रमोद सूर्यभान पवार बनाम महाराष्ट्र राज्य (2019) के मामले पर आधारित निर्णय मेंन्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के उस निर्णय का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि विवाह के वचन से उत्पन्न तथ्य के बोध के कारण दूषित सहमति तभी स्थापित की जा सकती है जब वचन मिथ्या होदुर्भावना से किया गया हो और वचन करते समय उसे निभाने का कोई आशय न हो। न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐसे मिथ्या वचन का महिला के लैंगिक संबंध बनाने के निर्णय से सीधा और तत्काल संबंध होना चाहिये। गुवाहाटी उच्च न्यायालय नेगुलुक कथार बनाम असम राज्य (2025) के मामले में इस स्थिति को दोहराया। 
  • विचारण न्यायालय के स्वयं के निष्कर्षों पर:न्यायालय ने पाया कि विचारण न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 के अधीन अपीलकर्त्ता को दोषमुक्त करते हुए स्वयं यह पाया था कि पीड़िता ने सहमति दी थी और अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि उसकी सहमति विवाह के आश्वासन से प्रेरित थी। न्यायालय ने माना कि यह निष्कर्ष भारतीय दण्ड संहिता की धारा 417 के अधीन लगाए गए आरोप से भी सीधे तौर पर संबंधित है। 
  • अपीलकर्त्ता के आचरण के संबंध में:न्यायालय ने पाया कि इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं है कि अपीलकर्त्ता ने रिश्ते की शुरुआत में विवाह का मिथ्या वचन किया था और उसे निभाने का उसका कोई आशय नहीं था। न्यायालय ने यह भी कहा कि वर के परिवार से अपीलकर्त्ता का संपर्क करना पीड़िता से विवाह करने के उसके निरंतर आशय को दर्शाता है। 
  • साक्ष्यों पर चयनात्मक निर्भरता के संबंध में:न्यायालय ने माना कि यद्यपि बलात्संग और छल अलग-अलग तत्त्वों वाले अपराध हैंफिर भी साक्ष्यों के एक ही समूह पर चयनात्मक रूप से विश्वास करके अभियुक्त को बलात्संग के आरोप से इस आधार पर दोषमुक्त नहीं किया जा सकता कि संबंध सहमति से थाजबकि साथ ही उसे छल के आरोप में केवल इसलिये दोषी ठहराया जा सकता है क्योंकि बाद में संबंध टूट गयाबिना शुरुआत में बेईमानी के आशय को स्वतंत्र रूप से स्थापित किये 
  • तदनुसारभारतीय दण्ड संहिता की धारा 417 के अधीन अपीलकर्त्ता की दोषसिद्धि को अपास्त कर दिया गया। 

भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत छल क्या है? 

भारतीय न्याय संहिता की धारा 318 (छल): 

  • उपधारा (1) – परिभाषा:छल तब होता है जब कोई व्यक्ति कपटपूर्वक या बेईमानी से किसी दूसरे व्यक्ति को प्रवंचित करता हैउसे संपत्ति सौंपनेसंपत्ति को अपने पास रखने की सम्मति देनेया ऐसा कोई कार्य करने/न करने के लिये उत्प्रेरित करता है जिससे शारीरिकमानसिकख्याति या संपत्ति को अपहानि होने की संभावना हो। तथ्यों को बेईमानी से छिपाना भी प्रवंचना के समान है। 
  • उपधारा (2) – साधारण दण्ड: 3 वर्ष तक कारावासया जुर्मानाया दोनों। 
  • उपधारा (3) – न्यासभंग:जहाँ अपराधी पीड़ित के हितों की रक्षा के लिये विधिक कर्त्तव्य या संविदात्मक दायित्व के अधीन थावहाँ वर्धित दण्ड - 5 वर्ष तक कारावासया जुर्मानाया दोनों। 
  • उपधारा (4) – संपत्ति संबंधी छल:जहाँ छल संपत्ति की सुपुर्दगी को उत्प्रेरित करता हैया मूल्यवान प्रतिभूति या दस्तावेजों को बनाने/बदलने/नष्ट करने के लिये उत्प्रेरित करता है — वर्ष तक कारावासऔर जुर्माना।  

भारतीय दण्ड संहिताभारतीय न्याय संहिता तुलनात्मक तालिका: 

उपबंध  

भारतीय दण्ड संहिता 

भारतीय न्याय संहिता 

छल की परिभाषा 

धारा 415 

धारा 318(1) 

प्रतिरूपण द्वारा छल की परिभाषा 

धारा 416 

धारा 319(1) 

छल के लिये दण्ड  

धारा 417 

धारा 318(2) 

इस ज्ञान के साथ छल करना कि उस व्यक्ति को सदोष हानि हो सकती है जिसका हित संरक्षित रखने के लिये अपराधी आबद्ध है  

धारा 418 

धारा 318(3) 

प्रतिरूपण द्वारा छल के लिये दण्ड  

धारा 419 

धारा 319(2) 

छल करना और संपत्ति परिदत्त करने के लिये बेईमानी से उत्प्रेरित करना 

धारा 420  

धारा 318(4)