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आपराधिक कानून
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 335
« »01-Aug-2026
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महेंद्र सिंह बनाम छत्तीसगढ़ राज्य "धारा 299 के अधीन विधिवत् आदेश के अभाव में अभिलिखित परिसाक्ष्य, फरार अभियुक्त के विरुद्ध बाध्यकारी नहीं हो सकता" - न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति जेबी परदीवाला |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने महेंद्र सिंह बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2026) के मामले में हत्या के दोषसिद्धि को इस आधार पर अपास्त कर दिया कि सह-अभियुक्त के विरुद्ध पहले के विचारण में अभिलिखित परिसाक्ष्य का प्रयोग फरार अभियुक्त के पश्चातवर्ती विचारण में उसके विरुद्ध नहीं किया जा सकता, जब तक कि धारा 299 दण्ड प्रक्रिया संहिता/धारा 335 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन एक आदेश पारित न किया गया हो जो दो अधिकारिता संबंधी तथ्यों को स्थापित करता हो - कि अभियुक्त फरार था, और उसे तुरंत गिरफ्तार करने की कोई संभावना नहीं थी।
महेंद्र सिंह बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- 1999 में दो अभियुक्तों पर हत्या का आरोप लगाया गया था। आरोप है कि अपीलकर्त्ता पीड़ित की छाती पर बैठ गया और उसका गला घोंट दिया, जबकि सह-अभियुक्त ने राहगीरों को उकसाया और धमकाया।
- उस समय अपीलकर्त्ता फरार हो गया, जबकि सह-अभियुक्त पर विचारण चला और उसे दोषमुक्त कर दिया गया।
- घटना के 18 वर्ष से अधिक समय बाद, 2017 में अपीलकर्त्ता को गिरफ्तार किया गया था।
- जब तक अपीलकर्त्ता के विचारण प्रारंभ हुआ, तब तक मुख्य चश्मदीद गवाह (PW-1) की मृत्यु हो चुकी थी।
- विचारण न्यायालय और उच्च न्यायालय ने सह-अभियुक्त के विरुद्ध पहले हुए विचारण में अभिलिखित PW-1 के परिसाक्ष्य पर विश्वास किया और उसी आधार पर अपीलकर्त्ता को दोषसिद्ध ठहराया।
- 1999 में हुए विचारण के दौरान धारा 299 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन कोई आदेश पारित नहीं किया गया था जिसमें यह पाया गया हो कि अपीलकर्त्ता फरार था और उसे गिरफ्तार नहीं किया जा सकता था।
- इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 299 के अधीन औपचारिक आदेश की आवश्यकता पर: न्यायालय ने माना कि अभियुक्त के भाग जाने और उसकी तत्काल गिरफ्तारी की असंभवता को विचारण न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिये और उसे संतोषजनक रूप से सिद्ध किया जाना चाहिये। केवल तभी जब दोनों अधिकारिता संबंधी तथ्यों के सबूत अभिलिखित करते हुए आदेश पारित किया जाता है, तो उस समय अभिलिखित किये गए साक्षी के परिसाक्ष्य पर बाद में तब विश्वास किया जा सकता है जब उस साक्षी को पेश नहीं किया जा सकता है।
- वर्तमान मामले में ऐसे आदेश के अभाव में: न्यायालय ने पाया कि वर्ष 1999 में न तो मामले के समर्पण के प्रक्रम पर और न ही विचारण के प्रारंभ के समय दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 299 के अधीन कोई आदेश पारित किया गया था, जिसके द्वारा यह अभिलिखित किया गया हो कि अपीलकर्त्ता फरार है तथा उसकी गिरफ्तारी की तत्काल कोई संभावना नहीं है। अतः धारा 299 के प्रयोग हेतु आवश्यक अधिकारिता संबंधी तथ्यों का विधिवत् निर्धारण नहीं किया गया था।
- इस लोप के प्रभाव पर: चूँकि सह-अभियुक्त के विरुद्ध पहले के विचारण में ऐसा कोई आदेश मौजूद नहीं था, इसलिये न्यायालय ने माना कि अपीलकर्त्ता के विरुद्ध अभियोजन पक्ष का मामला विफल रहा, और उसकी दोषसिद्धि को अपास्त करते हुए उसे आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।
- कादर खान मामले में विरोधाभासी दृष्टिकोण पर: न्यायालय ने पश्चिम बंगाल राज्य बनाम कादर खान (2026) के मामले में एक समवर्ती पीठ (न्यायमूर्ति संजय करोल) द्वारा कुछ समय पहले दिये गए विपरीत दृष्टिकोण पर ध्यान दिया। कादर खान के निर्णय में यह अभिनिर्धारित किया गया था कि दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 299 में ऐसा कोई वैधानिक उपबंध नहीं है, जिसके अनुसार साक्षी का कथन अभिलिखित किये जाने से पूर्व न्यायालय द्वारा यह अभिलिखित करते हुए औपचारिक आदेश पारित करना अनिवार्य हो कि धारा के प्रयोग हेतु आवश्यक दोनों अधिकारिता संबंधी तथ्य विद्यमान हैं। निर्णायक प्रश्न यह है कि साक्ष्य अभिलिखित किये जाने की तिथि पर वे तथ्य वस्तुतः विद्यमान एवं स्थापित थे या नहीं। कादर खान ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 299 सामान्यतः तभी लागू की जाती है जब कोई साक्षी अनुपलब्ध हो - मृत हो, कथन देने में असमर्थ हो, पता न चल पा रहा हो, या अनुचित विलंब या खर्च के बिना पेश न किया जा सके - क्योंकि जीवित, उपलब्ध साक्षी से पश्चातवर्ती विचारण में दोबारा पूछताछ की जा सकती है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 335 क्या है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 335 – अभियुक्त की अनुपस्थिति में साक्ष्य का अभिलेख:
- उपधारा (1): यदि यह साबित कर दिया जाता है कि अभियुक्त व्यक्ति फरार हो गया है और उसके तुरंत गिरफ्तार किये जाने की कोई संभावना नहीं है तो उस अपराध के लिये, जिसका परिवाद किया गया है, उस व्यक्ति का विचारण करने के लिये या विचारण के लिये सुपुर्द करने के लिये सक्षम न्यायालय अभियोजन की ओर से प्रस्तुत किये गए साक्षियों की (यदि कोई हो), उसकी अनुपस्थिति में परीक्षा कर सकेगा और उनका अभिसाक्ष्य अभिलिखित कर सकेगा।
- ऐसा कोई अभिसाक्ष्य उस व्यक्ति के गिरफ्तार होने पर, उस अपराध की जांच या विचारण में, जिसका उस पर आरोप है, उसके विरुद्ध साक्ष्य में दिया जा सकेगा यदि अभिसाक्षी मर गया है, या साक्ष्य देने के लिये असमर्थ है, या मिल नहीं सकता है या उसकी उपस्थिति इतने विलंब, व्यय या असुविधा के बिना, जितनी कि मामले की परिस्थितियों में अनुचित होगी, नहीं कराई जा सकती है।
- उपधारा (2): यदि यह प्रतीत होता है कि मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय कोई अपराध किसी अज्ञात व्यक्ति या किन्हीं अज्ञात व्यक्तियों द्वारा किया गया है तो उच्च न्यायालय या सेशन न्यायाधीश निदेश दे सकेगा कि कोई प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट जांच करे और किन्हीं साक्षियों की जो अपराध के बारे में साक्ष्य दे सकते हों, परीक्षा करे।
- इस प्रकार लिया गया कोई अभिसाक्ष्य, किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध जिस पर अपराध का तत्पश्चात् अभियोग लगाया जाता है, साक्ष्य में दिया जा सकेगा यदि अभिसाक्षी मर जाता है या साक्ष्य देने के लिये असमर्थ हो जाता है या भारत की सीमाओं से परे है।