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आपराधिक कानून

सड़क पर दो व्यक्तियों के बीच ऊँची आवाज़ में चिल्लाने मात्र से संज्ञेय अपराध गठित नहीं होता

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 11-Sep-2026

लखन लालचंद धामवानी बनाम महाराष्ट्र राज्य 

"प्रथम दृष्टयाआरोपों को सरसरी तौर पर पढ़ने सेमेरी स्पष्ट राय है कि कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता है और इसलिये इस न्यायालय का हस्तक्षेप आवश्यक है।" 

न्यायमूर्ति मिलिंद एन. जाधव 

बॉम्बे उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति मिलिंद एन. जाधव की पीठ नेलखन लालचंद धामवानी बनाम महाराष्ट्र राज्य (2026)में महाराष्ट्र निषेध अधिनियम, 1949 की धारा 85(1) के अधीन दर्ज FIR को रद्द कर दियायह मानते हुए कि सार्वजनिक सड़क पर दो व्यक्तियों के बीच जोर से चिल्लानाबिना किसी और बात केसंज्ञेय अपराध नहीं दर्शाता है।  

लखन लालचंद धामवानी बनाम महाराष्ट्र राज्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • पिंपरी पुलिस थाने में आवेदकों के विरुद्ध महाराष्ट्र निषेध अधिनियम, 1949 की धारा 85(1) के अधीन FIR दर्ज की गई।  
  • FIR और आरोपपत्र में आरोप यह था कि शराब के नशे में धुत होकरयाचिकाकर्त्ता सार्वजनिक सड़क पर एक-दूसरे पर जोर-जोर से चिल्ला रहे थेजिसके परिणामस्वरूप लोकशांति भंग हुई और आम जनता को असुविधा हुई। 
  • याचिकाकर्त्ताओं ने FIR को रद्द करने की मांग करते हुए बॉम्बे उच्च न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • पर-व्यक्ति को हुई असुविधा के अभाव पर:न्यायालय ने कहा कि अभियोजन पक्ष का यह मामला नहीं था कि आवेदकों ने किसी पर-व्यक्ति पर चिल्लाया हो या लोक शांति भंग की हो और यह माना कि आरोपों को सरसरी तौर पर पढ़ने से कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता है। 
  • महाराष्ट्र निषेध अधिनियम की धारा 85 के दायरे पर:न्यायालय ने टिप्पणी की कि शराब का सेवन अपने आप में धारा 85 के अधीन अपराध नहीं हो सकता हैऔर अनुचित और अव्यवस्थित व्यवहार को प्रत्येक मामले के तथ्यों से ही निर्धारित किया जाना चाहियेयहाँजोर से चिल्लाने के आरोप के अलावाअश्लीलतादुराचार या नैतिक रूप से आपत्तिजनक होने का कोई आरोप नहीं था। 
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के अधीन उच्च न्यायालय की शक्ति पर:न्यायालय ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528 के अधीन अपनी शक्ति का उल्लेख करते हुए कहा कि उच्च न्यायालय इस प्रावधान का प्रयोग उन मामलों में हस्तक्षेप करने के लिये करते हैं जहाँ मामले दुर्भावनापूर्ण आशयों से या अभियुक्त को परेशान करने के लिये दायर किये गए होंजिससे प्रक्रियात्मक उत्पीड़न से बचा जा सके। 
  • सहमति से मुकदमे रद्द करने के मामलों में लागत अधिरोपित करने के संबंध में:न्यायालय ने पाया कि सहमति से मुकदमे रद्द करने के मामलों में लागत अधिरोपित करना उचित है क्योंकि इससे लोक संसाधनों की बर्बादी होती हैबहुमूल्य न्यायिक समय की खपत होती है और अनावश्यक मुकदमों के विरुद्ध निवारण की आवश्यकता होती है। न्यायालय ने टिप्पणी की कि ऐसे मामलों को विचारण के लिये आगे बढ़ने देने से विधिक व्यवस्था बाधित होगी और लंबित मामलों की संख्या में वृद्धि होगी। 
  • आवेदन को मंजूर करते हुएबॉम्बे उच्च न्यायालय ने FIR को अपास्त कर दिया और आवेदकों को 10,000 रुपए का हर्जाना देने का निदेश दिया। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 क्या है? 

संबंधित पुराना उपबंधदण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 482 

मूल अधिनियम का पाठ: 

उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों का संरक्षण —इस संहिता की कोई बात उच्च न्यायालय की उन अंतर्निहित शक्तियों को परिसीमित या प्रभावित करने वाली नहीं समझी जाएगीजिनके अधीन वह इस संहिता के अधीन किए गए किसी आदेश को प्रभावी करने के लिए आवश्यक ऐसे आदेश कर सकता हैया किसी न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोक सकता हैअथवा अन्यथा न्याय के उद्देश्यों को सुरक्षित कर सकता है।  

संज्ञेय अपराध क्या है? 

परिभाषा: 

  • संज्ञेय अपराध ऐसा गंभीर अपराध हैजिसमें पुलिस अधिकारी बिना वारण्ट के अभियुक्त को गिरफ्तार कर सकता है तथा पूर्व न्यायालय अनुमति के बिना अन्वेषण प्रारंभ कर सकता है।  

सांविधिक परिभाषा — धारा 2(), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता: 

  • संज्ञेय अपराध” से ऐसा अपराध अभिप्रेत हैजिसके लिये तथा “संज्ञेय मामला” से ऐसा मामला अभिप्रेत हैजिसमें कोई पुलिस अधिकारी प्रथम अनुसूची के अनुसार या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन बिना वारण्ट के गिरफ्तार कर सकता है 

प्रमुख विशेषताएँ 

  • वारण्ट की आवश्यकता नहीं:पुलिस उचित संदेह के आधार पर किसी संदिग्ध को सीधे गिरफ्तार कर सकती है 
  • न्यायालय की अनुमति आवश्यक नहीं: पुलिस अधिकारी मामले की तत्काल जाँच प्रारंभ कर सकते हैं।  
  • FIR दर्ज करना अनिवार्य:ऐसे अपराधों के संबंध में सूचना प्राप्त होने पर पुलिस को प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करनी होती है 

सामान्य उदाहरण: 

  • हत्या 
  • बलात्संग  
  • व्यपहरण  
  • दहेज मृत्यु