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राज्य के विरुद्ध विवाह-विच्छेद की अपील पोषणीय नहीं: दिल्ली उच्च न्यायालय

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 08-Sep-2026

पूनम बनाम दिल्ली राज्य (NCT) 

"केवल इस आधार पर कि पक्षकार लगभग डेढ़ वर्ष तक संगम विहार में रहेमाननीय कुटुंब न्यायालय को क्षेत्रीय अधिकारिता प्रदान नहीं की जा सकतीजबकि यह स्वीकार किया जाता है कि पक्षकार इसके बाद गुरुग्राम चले गए और अंततः वहाँ एक साथ रहने लगे।" 

न्यायमूर्ति विवेक चौधरी और न्यायमूर्ति रेनू भटनागर 

दिल्ली उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति विवेक चौधरी और न्यायमूर्ति रेनू भटनागर की खंडपीठ नेपूनम बनाम दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी (2026) के मामले में, एक पत्नी द्वारा दायर अपील को खारिज कर दियाजिसमें उसने कुटुंब न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें क्षेत्रीय अधिकारिता के अभाव में उसकी तलाक याचिका वापस कर दी गई थी। खंडपीठ ने यह माना कि अपील राज्य के विरुद्ध पोषणीय नहीं थी और यह गुण-दोष के आधार पर भी विफल रही। 

पूनम बनाम दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता पत्नी ने कुटुंब न्यायालय अधिनियम, 1984 की धारा 19 के अधीन कुटुंब न्यायालय के उस आदेश के विरुद्ध अपील दायर की थीजिसमें सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 7 नियम 10 के अधीन उसकी विवाह विच्छेद याचिका को उचित न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने के लिये वापस कर दिया गया था। 
  • कुटुंब न्यायालय ने यह माना था कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) की धारा 19 के अधीन उसके पास पत्नी की क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद की मांग वाली याचिका पर क्षेत्रीय अधिकारिता का अभाव है। 
  • दोनों पक्षकारों ने 18 जनवरी, 2019 को गुरुग्राम में विवाह किया था और उसके बाद लगभग डेढ़ से दो वर्ष तक पति के वैवाहिक घर संगम विहारदिल्ली में एक साथ रहे थे। 
  • पति को गुरुग्राम में नौकरी मिलने के बाददोनों पक्षकार वहाँ किराए के मकान में रहने लगे और चार वर्ष से अधिक समय तक साथ-साथ रहते रहे। 
  • पत्नी ने आरोप लगाया कि विवाह के दौरान उसे क्रूरता का शिकार होना पड़ाविशेषत: उसके पति के शराब के अत्यधिक सेवन के कारणऔर विवाह-विच्छेद की याचिका दायर करने से लगभग दो सप्ताह पहले उसे वैवाहिक घर से निकाल दिया गया थाजिसके बाद वह अपने माता-पिता के घर के पास पृथक् रहने लगी। 
  • कुटुंब न्यायालय ने पाया कि यद्यपि पक्षकार पहले संगम विहार में एक साथ रहते थेउनका अंतिम साझा निवास गुरुग्राम में थाऔर यह माना कि पूर्व दिल्ली निवास हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 19(iii) के अधीन अधिकारिता प्रदान करने के लिये अपर्याप्त थी 
  • पत्नी ने पति को पक्षकार बनाए बिनादिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के विरुद्ध यह अपील दायर की है। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • राज्य के विरुद्ध अपील की स्वीकार्यता पर: 
    • न्यायालय ने कहा कि वह यह नहीं समझ पा रहा है कि पत्नी और पति के बीच विवाह-विच्छेद की कार्यवाही में पारित आदेश को चुनौती देने वाली अपील दिल्ली राज्य के विरुद्ध कैसे दायर की जा सकती हैविशेषत: तब जब पति को अपील में पक्षकार के रूप में शामिल नहीं किया गया था। 
  • हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 19(iii) के संबंध में पत्नी की दलील पर: 
    • न्यायालय ने पत्नी की इस दलील पर ध्यान दिया कि लगभग डेढ़ से दो वर्ष तक संगम विहार में पक्षकारों का निवास दिल्ली में कुटुंब न्यायालय को अधिकारिता  प्रदान करने के लिये पर्याप्त थाऔर धारा 19(iii) के लिये संयुक्त निवास को समय के हिसाब से अंतिम होना आवश्यक नहीं था। 
  • हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 19(iii) के दायरे पर: 
    • इस दलील को खारिज करते हुएन्यायालय ने माना कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 19(iii) विशेष रूप से उस न्यायालय को अधिकारिता प्रदान करती है जिसकी क्षेत्रीय सीमाओं के भीतर "विवाह के पक्षकार अंतिम बार एक साथ रहे थे"जिससे उस उपबंध के प्रयोजन के लिये संयुक्त निवास का अंतिम स्थान निर्णायक हो जाता है। 
  • तथ्यों पर उपबंध के लागू होने के संबंध में: 
    • न्यायालय ने माना कि संगम विहार में पक्षकारों के पूर्व निवास पर विश्वास करने से कुटुंब न्यायालय को क्षेत्रीय अधिकारिता प्राप्त नहीं हो सकतीजबकि पक्षकारों ने यह स्वीकार किया था कि वे बाद में गुरुग्राम चले गए थे और अंतिम बार चार वर्ष से अधिक समय तक वहाँ एक साथ रहे थे। 
  • अंतिम परिणाम पर:  
    • पीठ ने अपील को पोषणीय होने और गुण-दोष दोनों आधारों पर खारिज कर दिया। 

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 19 क्या है? 

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 19 उन न्यायालयों का उल्लेख करती है जिनमें अधिनियम के अंतर्गत याचिका प्रस्तुत की जानी है। इसमें उपबंधित किया गया है कि प्रत्येक याचिका उस जिला न्यायालय में प्रस्तुत की जाएगी जिसकी साधारण आरंभिक सिविल अधिकारिता की स्थानीय सीमा के भीतर स्थित है। 

  • विवाह का अनुष्ठान हुआ थाया  
  • याचिका प्रस्तुत किये जाने के समय प्रत्यर्थी निवास करता हैया 
  • विवाह के पक्षकार अंतिम बार एक साथ रहे थेया 
  • यदि याचिकाकर्त्ता पत्नी हैतो याचिका प्रस्तुत करने की तिथि पर वह कहाँ निवास कर रही हैया 
  • याचिकाकर्त्ता याचिका के प्रस्तुत करने के समय निवास कर रहा हैउस दशा मेंजब प्रत्यर्थी उस समय पर ऐसे राज्यक्षेत्र के बाहर निवास करता है जिस पर इस अधिनियम का विस्तार है या उसके जीवित होने के बारे में सात वर्ष या उससे अधिक की कालावधि तक उन्होंने कुछ नहीं सुना हैजिन्होंने उसके बारे मेंयदि वह जीवित होता तोस्वभावतः सुना होता