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आपराधिक कानून
जहाँ विधि में ऐसा उपबंध नहीं है, वहाँ दंडादेश के अतिरिक्त जुर्माना अधिरोपित नहीं किया जा सकता
«02-Sep-2026
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लक्ष्मी नारायण बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, अपर मुख्य सचिव/प्रधान सचिव, गृह, लखनऊ "न्यायालय केवल वही दंडादेश दे सकता है जो संविधि द्वारा विहित है और जहाँ संविधि किसी विशेष अपराध के लिये जुर्माना अधिरोपित करने का उपबंध नहीं करती है, वहाँ न्यायालय उसमें विहित दंडादेश के अतिरिक्त जुर्माना अधिरोपित नहीं कर सकता है।" न्यायमूर्ति ज़फ़ीर अहमद |
इलाहाबाद उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति ज़फीर अहमद ने लक्ष्मी नारायण बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, अपर मुख्य सचिव/प्रधान सचिव गृह, लखनऊ (2026) के मामले में, लंबित अपील में जमानत याचिका पर विचार करते हुए, विचारण न्यायालय द्वारा धारा 304-ख भारतीय दण्ड संहिता (भारतीय न्याय संहिता की धारा 80) के अधीन जुर्माना अधिरोपित करने में में एक "स्पष्ट त्रुटि" को उजागर किया और कहा कि यह उपबंध दंडादेश के अतिरिक्त कोई जुर्माना विहित नहीं करता है।
लक्ष्मी नारायण बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, अपर मुख्य सचिव/प्रधान सचिव, गृह, लखनऊ (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अपीलकर्त्ता लक्ष्मी नारायण को लखनऊ के 2000 के दहेज मृत्यु मामले के संबंध में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498क और 304-ख तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 के अधीन दोषी ठहराया गया था।
- भारतीय दण्ड संहिता की धारा 304-ख के अधीन अपराध के लिये विचारण न्यायालय ने उन्हें 10 वर्ष के कठोर कारावास का दण्ड दिया और 20,000 रुपए का जुर्माना लगाया।
- विचारण न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498क के अधीन 6,000 रुपए के जुर्माने के साथ 3 वर्ष का कठोर कारावास और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 4 के अधीन 2,000 रुपए के जुर्माने के साथ एक वर्ष का कठोर कारावास भी अधिरोपित किया।
- अपीलकर्त्ता ने 2025 में उच्च न्यायालय के समक्ष अपनी दोषसिद्धि को चुनौती दी और लंबित अपील में जमानत याचिका दायर की।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- भारतीय दण्ड संहिता की धारा 304-ख के अधीन अधिरोपित किये गए जुर्माने पर:
न्यायालय ने आश्चर्य व्यक्त किया कि विचारण न्यायाधीश ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 304-ख के अधीन अभियुक्त पर जुर्माना अधिरोपित किया था, और स्पष्ट किया कि विधायिका ने इस उपबंध के अधीन दंडनीय अपराध के लिये किसी भी प्रकार का जुर्माना अधिरोपित करने का प्रावधान नहीं किया है। - दंडादेश देने की शक्ति की सीमाओं पर:
न्यायालय ने माना कि कोई न्यायालय केवल वही दंडादेश दे सकता है जो संविधि द्वारा विहित है, और जहाँ संविधि किसी विशेष अपराध के लिये जुर्माना अधिरोपित करने का प्रावधान नहीं करती है, वहाँ न्यायालय उसमें विहित दंडादेश के अतिरिक्त जुर्माना अधिरोपित नहीं कर सकता है। - विचारण न्यायाधीश के आचरण पर:
न्यायालय ने चिंता व्यक्त की कि यह त्रुटि अपर जिला और सेशन न्यायाधीश रैंक के न्यायिक अधिकारी द्वारा की गई थी, और इसे "दुर्भाग्यपूर्ण" बताया कि ऐसी स्पष्ट त्रुटि हुई है। न्यायालय ने यह भी कहा कि धारा 304-ख भारतीय दण्ड संहिता के प्रावधानों पर विधिवत विचार किये बिना दंडादेश दिया गया था। वरिष्ठ रजिस्ट्रार को निर्देश दिया गया कि वे आदेश की एक प्रति जिला न्यायाधीश के माध्यम से संबंधित विचारण न्यायाधीश को भविष्य के मार्गदर्शन के लिये भेजें। - जमानत मंजूर करने के संबंध में:
जमानत आवेदन के गुण-दोष पर विचार करते हुए, न्यायालय ने पाया कि अपीलकर्त्ता विचारण के दौरान जमानत पर रहा था और उसने उस स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं किया था, और तदनुसार उसे जमानत पर छोड़ने का निदेश दिया। - न्यायालय ने अभियुक्त को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498क और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 के अधीन अधिरोपित किया गया 8,000 रुपए के जुर्माने को छोड़ने के चार सप्ताह के भीतर जमा करने का निदेश दिया, जबकि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 304-ख के अधीन अधिरोपित किये गए जुर्माने को स्थगित कर दिया गया। अपीलकर्त्ता को अनावश्यक स्थगन की मांग किये बिना अपील के शीघ्र निपटारे में सहयोग करने और छोड़ने के बाद किसी भी आपराधिक क्रियाकलाप में शामिल न होने का भी निदेश दिया गया।
भारतीय न्याय संहिता की धारा 80 क्या है?
भारतीय न्याय संहिता की धारा 80— दहेज मृत्यु :
- अध्याय: अध्याय 5 (मानव शरीर को प्रभावित करने वाले अपराध)
- यह निम्नलिखित स्थितियों में लागू होता है:
- किसी महिला की मृत्यु जलने, शारीरिक क्षति या सामान्य परिस्थितियों के विपरीत किसी अन्य कारण से होती है।
- विवाह के सात वर्ष के भीतर ही उसकी मृत्यु हो जाती है।
- यह दर्शाया गया है कि अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले, उसे उसके पति या उसके किसी नातेदार द्वारा क्रूरता या उत्पीड़न का शिकार बनाया गया था।
- इस प्रकार की क्रूरता/उत्पीड़न दहेज की मांग के लिये या उससे संबंधित थी।
- विधिक प्रभाव: इस प्रकार की मृत्यु को "दहेज मृत्यु" कहा जाता है, और पति/नातेदार को उसकी मृत्यु का कारण माना जाता है।
- दहेज की परिभाषा: दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 की धारा 2 के अंतर्गत दिये गए अर्थ के समान।
- दण्ड : कम से कम 7 वर्ष का कारावास, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है ।
- कोई जुर्माना विहित नहीं है — न्यायालय दंडादेश के अतिरिक्त जुर्माना अधिरोपित नहीं कर सकता।
- वर्गीकरण:
- उपलब्ध किया हुआ
- अजमानतीय
- सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय