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सिविल कानून

उप-पंजीयक किसी दस्तावेज़ की वैधता या गुण-दोष की परीक्षा नहीं कर सकता; उसकी शक्तियां रजिस्ट्रीकरण अधिनियम की धारा 34(3) तक ही सीमित हैं

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 02-Sep-2026

मुजफ्फर हुसैन राथर बनाम जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश और अन्य 

"प्रत्यर्थी संख्या रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 के प्रावधानों के अधीन विशुद्ध रूप से मंत्रिस्तरीय कर्त्तव्यों का निर्वहन करता है और साननविधिक ढाँचे के अधीन उसके पास कोई न्यायिक या सलाहकार शक्ति नहीं है।" 

न्यायमूर्ति रजनेश ओसवाल 

जम्मू और कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति रजनेश ओसवाल नेमुजफ्फर हुसैन राथर बनाम जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश और अन्य (2026) के मामले में सामान्य मुख्तारनामा (General Power of Attorney) के निरसन से संबंधित विलेख के रजिस्ट्रीकरण की मांग करने वाली याचिका को मंजूर करते हुए यह अभिनिर्धारित किया कि उप-पंजीयक की शक्तियां एवं अधिकार-क्षेत्र रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 की धारा 34(3) द्वारा स्पष्ट रूप से परिसीमित हैं। न्यायालय ने निरसन दस्तावेज के रजिस्ट्रीकरण का निदेश सात दिनों के भीतर दिये जाने का आदेश पारित किया।  

मुजफ्फर हुसैन राथर बनाम जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्तामुजफ्फर हुसैन राथर ने 2009 में निष्पादित एक सामान्य पावर ऑफ अटॉर्नी को रद्द करने वाले विलेख के रजिस्ट्रीकरण के लिये उप-पंजीयक से संपर्क किया था। 
  • सब-रजिस्ट्रार ने न तो निरस्तीकरण विलेख को रजिस्ट्रीकृत किया और न ही रजिस्ट्रीकरण से इंकार करने का कोई तर्कसंगत आदेश पारित कियाअपितु याचिकाकर्त्ता को सिविल न्यायालय में जाने की सलाह दी। 
  • सब-रजिस्ट्रार ने रजिस्ट्रीकरण चेकलिस्ट से "दस्तावेज़ को रद्द करना" से संबंधित प्रविष्टि को हटाने के सरकारी आदेश पर विश्वास किया और तर्क दिया कि NGDRS पोर्टल में पावर ऑफ अटॉर्नी को रद्द करने के रजिस्ट्रीकरण के लिये कोई अलग श्रेणी नहीं है। 
  • दस्तावेज़ के लंबित रहने से व्यथित होकर याचिकाकर्त्ता ने उच्च न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • धारा 34(3) के अधीन उप-पंजीयक की शक्तियों के दायरे पर:  
    न्यायालय ने माना कि रजिस्ट्रीकरण अधिकारी को केवल यह जांच करनी होती है कि क्या दस्तावेज उसी व्यक्ति द्वारा निष्पादित किया गया है जिसके द्वारा इसे निष्पादित किया गया प्रतीत होता हैऔर अपने समक्ष उपस्थित व्यक्ति की पहचान औरजहाँ लागू होप्रतिनिधिअसाइन या एजेंट के अधिकार की पुष्टि करनी होती है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि जम्मू और कश्मीर रजिस्ट्रीकरण (दस्तावेजों के रजिस्ट्रीकरण के लिये पहचान सत्यापन) नियम, 2023 धारा 34 को लागू करते हैंवे उप-पंजीयक को रजिस्ट्रीकरण के लिये प्रस्तुत दस्तावेज की वैधताऔचित्य या गुण-दोष की जांच करने या उस पर निर्णय लेने का अधिकार नहीं देते हैं। 
  • न्यायिक अधिकारिता के अभाव पर: 
    के. गोपी बनाम उप-पंजीयक मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास करते हुएन्यायालय ने माना कि रजिस्ट्रीकरण अधिकारी का निष्पादक के स्वामित्व से कोई संबंध नहीं है और न ही उसके पास यह निर्धारित करने की न्यायिक शक्ति है कि निष्पादक के पास स्वामित्व है या नहींएक बार प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं को पूरा कर लिया जाए और निष्पादन स्वीकार कर लिया जाएतो दस्तावेज़ का रजिस्ट्रीकरण आवश्यक है।  
  • चेकलिस्ट प्रविष्टि को हटाने के संबंध में: 
    न्यायालय ने रजिस्ट्रीकरण चेकलिस्ट से "दस्तावेज़ रद्द करना" प्रविष्टि को हटाने के सरकारी आदेश पर उप-पंजीयक के विश्वास को खारिज कर दियायह देखते हुए कि आदेश का उद्देश्य उप-पंजीयकों को टुकड़ों में आपत्तियां उठाने और अतिरिक्त दस्तावेजों की मांग करने से रोकना और नागरिक-केंद्रित रजिस्ट्रीकरण प्रणाली को बढ़ावा देना था। इस हटाने को पावर ऑफ अटॉर्नी के निरस्तीकरण को रजिस्ट्रीकृत करने के सांविधिक अधिकार को छीनने के रूप में नहीं माना जासकता ।  
  • उप-पंजीयक के कर्त्तव्य की प्रकृति पर:  
    न्यायालय ने माना कि रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 के अंतर्गत उप-पंजीयक का कर्त्तव्य विशुद्ध रूप से प्रशासनिक होता है और सांविधिक ढाँचे के अंतर्गत उसे कोई न्यायिक या सलाहकारी शक्ति प्राप्त नहीं होती। याचिकाकर्त्ता को पावर ऑफ अटॉर्नी रद्द करने के लिये सिविल उपचारों का सहारा लेने की सलाह देना उप-पंजीयक के सांविधिक अधिकार क्षेत्र से बाहर कार्य करना थाऔर निरस्तीकरण विलेख को लंबित रखना "लोक सेवा के विपरीत" तथा "अनुचितनागरिक-बाधित करने वाले दृष्टिकोण" को दर्शाता है। 
  • पावर ऑफ अटॉर्नी की अखण्डनीयता पर: 
    एम.एस. अनंतमूर्ति बनाम जे. मंजुला मामले पर विश्वास करते हुएन्यायालय ने माना कि केवल पावर ऑफ अटॉर्नी को "अखण्डनीय" रूप में वर्णित करने से यह विधिक रूप से अखण्डनीय नहीं हो जाती हैऔर एक एजेंसी तभी अखण्डनीय होती है जब अटॉर्नी धारक का विषय वस्तु में स्वतंत्र हित हो। 
  • पूर्व सिविल वाद की आवश्यकता पर: 
    न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि याचिकाकर्त्ता को दस्तावेज को रद्द करने के लिये पहले सिविल वाद दायर करना होगायह मानते हुए कि सामान्य पावर ऑफ अटॉर्नी की वास्तविक वैधता और इसके निरस्तीकरण को रजिस्ट्रीकृत करने का प्रशासनिक कार्य अलग-अलग मामले हैंऔर NGDRS पोर्टल पर एक विशिष्ट निरस्तीकरण श्रेणी की अनुपस्थिति स्वयं रजिस्ट्रीकरण में देरी या इंकार को उचित नहीं ठहरा सकती है। 
  • न्यायालय ने याचिका मंजूर कर ली और उप-पंजीयक को आदेश प्राप्त होने के सात दिनों के भीतर निरस्तीकरण दस्तावेज को रजिस्ट्रीकृत करने का निदेश दियाबशर्ते कि कोई अन्य विधिक बाधा न हो। 

रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 की धारा 34 क्या है? 

धारा 34 रजिस्ट्रीकरण अधिकारी द्वारा रजिस्ट्रीकरण से पहले की जाने वाली जांच को नियंत्रित करती है।  

मुख्य उपबंध: 

  • धारा 34(1): कोई भी दस्तावेज रजिस्ट्रीकृत नहीं किया जाएगा जब तक कि उसे निष्पादित करने वाले व्यक्तिया उनके प्रतिनिधिनियुक्त व्यक्तिया विधिवत अधिकृत एजेंटनिर्धारित समय के भीतर रजिस्ट्रीकरण अधिकारी के समक्ष उपस्थित न हों। 
  • धारा 34(3): रजिस्ट्रीकरण अधिकारी यह जांच करेगा कि क्या दस्तावेज उन व्यक्तियों द्वारा निष्पादित किया गया था जिनके द्वारा इसे निष्पादित किया गया प्रतीत होता हैउसके समक्ष उपस्थित व्यक्तियों की पहचान के बारे में स्वयं को संतुष्ट करेगाऔर जहाँ कोई व्यक्ति प्रतिनिधिअसाइन या एजेंट के रूप में उपस्थित होता हैतो ऐसे व्यक्ति के उपस्थित होने के अधिकार के बारे में स्वयं को संतुष्ट करेगा।  
  • यह उपबंध रजिस्ट्रीकरण अधिकारी की भूमिका को निष्पादन और पहचान संबंधी मंत्रिस्तरीय जांच तक सीमित करता हैऔर दस्तावेज़ के स्वामित्ववैधता या औचित्य के निर्णय तक विस्तारित नहीं होता है।