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सिविल कानून
निवर्तमान भागीदार के अंश का मूल्यांकन, विघटन की तिथि पर नहीं अपितु मूल्यांकन की तिथि पर किया जाना चाहिये
« »10-Sep-2026
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सुमित्रा रेड्डी और अन्य बनाम के. रंगनाधा रेड्डी और अन्य "इस तिथि का उल्लेख करने का महत्त्व केवल लाभ और हानि का निर्धारण करने तक ही सीमित है और इसका भागीदारों के परिसंपत्तियों के शेष भाग में मूल्य प्राप्त करने के अधिकार से कोई संबंध नहीं है।" न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली |
उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने वी. सुमित्रा रेड्डी और अन्य बनाम के. रंगनाधा रेड्डी और अन्य (2026) में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णय की पुष्टि की और यह माना कि भंग भागीदारी फर्म की अचल संपत्ति में निवर्तमान भागीदार के अंश का मूल्यांकन वास्तविक मूल्यांकन या विक्रय की तारीख पर किया जाना चाहिये, न कि विघटन की तारीख पर।
वी. सुमित्रा रेड्डी और अन्य बनाम के. रंगनाधा रेड्डी और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह विवाद हैदराबाद में 3.27 एकड़ जमीन की स्वामी मेसर्स विराज कंस्ट्रक्शंस नामक एक भागीदारी फर्म के विघटन से उत्पन्न हुआ।
- भागीदारों में से एक ने स्वेच्छा से भागीदारी को भंग करने की मांग की, और फर्म 18 अक्टूबर, 1983 से प्रभावी रूप से भंग हो गई।
- न्यायालय के समक्ष प्रश्न यह था कि फर्म की अचल संपत्ति में निवर्तमान भागीदार के अंश का मूल्यांकन 18 अक्टूबर, 1983 (विघटन की तिथि) को किया जाना था, या उस मूल्य पर किया जाना था जो संपत्ति के वास्तव में मूल्यांकन या विक्रय के समय प्रचलित था।
- यह भी सामने आया कि शेष भागीदारों में से कुछ ने भंग की गई फर्म की संपत्तियों को बरकरार रखते हुए और उनका उपयोग करते हुए एक नई भागीदारी बनाकर व्यवसाय को जारी रखा था।
- आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने निवर्तमान भागीदार के अंश का मूल्यांकन वास्तविक मूल्यांकन की तिथि के अनुसार करने के पक्ष में निर्णय सुनाया, और अपीलकर्त्ताओं के इस तर्क के विरुद्ध निर्णय सुनाया कि नवगठित फर्म द्वारा शेष परिसंपत्तियों का उपयोग बिना निपटान के किया जा सकता है।
- इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ताओं ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- लाभ और हानि का निर्धारण करने के लिये सुसंगत तिथि के संबंध में:
न्यायमूर्ति भुयान द्वारा लिखित एक निर्णय में न्यायालय ने यह माना कि यद्यपि भागीदारी व्यवसाय के लाभ या हानि का निर्धारण विघटन की तिथि के अनुसार किया जाना चाहिये, यह तिथि केवल लाभ और हानि का निर्धारण करने के लिये सुसंगत है, और परिसंपत्तियों के शेष भाग में भागीदार के अंश के मूल्य पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। - निवर्तमान भागीदार के अंश के मूल्यांकन पर:
न्यायालय ने माना कि भागीदारी की परिसंपत्तियों के शेष भाग में अपना अंश प्राप्त करने का निवर्तमान भागीदार का अधिकार विघटन की तिथि पर स्थिर नहीं होता है, और भागीदार परिसंपत्तियों के वास्तविक मूल्यांकन की तिथि पर उनके मूल्य के आधार पर अपना अंश निर्धारित करवाने का हकदार है। - विघटन पर परिसमापन की आवश्यकता के संबंध में:
न्यायालय ने टिप्पणी की कि एक भागीदारी फर्म के विघटन के लिये सामान्यतः उसकी परिसंपत्तियों का परिसमापन आवश्यक होता है, जब तक कि एक या अधिक भागीदार अन्य भागीदारों की सहमति से परिसमापन के बदले उनके अंशों का बाजार मूल्य चुकाने के लिये आगे न आएं। - पुनर्गठित भागीदारी के अधिकारों पर:
न्यायालय ने यह माना कि पुनर्गठित फर्म को भंग की गई फर्म की परिसंपत्तियों का उपयोग करने का कोई अधिकार नहीं है, जब तक कि भंग की गई फर्म के सभी भागीदार हिसाब-किताब निपटाने और निवर्तमान भागीदार को उसका अंश देने के लिये एक करार पर न पहुँच जाएँ; ऐसे करार के अभाव में, परिसंपत्तियों का परिसमापन किया जाना चाहिये और प्राप्त मूल्य को भागीदारों के बीच उनके अंशों के अनुपात में वितरित किया जाना चाहिये। - नई भागीदारी द्वारा परिसंपत्तियों को अपने पास रखने के संबंध में:
न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि नवगठित भागीदारी अपने भागीदारों के अधिकारों का निपटारा किये बिना पूर्ववर्ती फर्म की परिसंपत्तियों को अपने पास रख सकती है और उनका उपयोग कर सकती है। न्यायालय ने यह माना कि विचाराधीन भूमि पूर्ववर्ती भागीदारी, मेसर्स विराज कंस्ट्रक्शंस की ही थी और नई भागीदारी इसे भंग की गई फर्म से खरीदकर ही अपने पास रख सकती थी। - समझौते के बिना भूमि को अपने पास रखने की वैधता पर:
न्यायालय ने माना कि चूँकि नई भागीदारी ने पूर्ववर्ती फर्म से भूमि नहीं खरीदी थी, इसलिये भूमि को अपने पास रखना अवैध था। - उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, अपील खारिज कर दी गई।
भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 के अंतर्गत विघटन और खातों के निपटान को नियंत्रित करने वाली विधि क्या है?
भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 भागीदारों के अधिकारों और दायित्वों को नियंत्रित करता है, जिसमें फर्म के विघटन की स्थिति में भी शामिल है:
- फर्म का विघटन (धारा 39): किसी फर्म के सभी भागीदारों के बीच भागीदारी का विघटन "फर्म का विघटन" कहलाता है।
- करार द्वारा विघटन (धारा 40): सभी भागीदारों की सहमति से या भागीदारों के बीच संविदा के अनुसार किसी फर्म का विघटन किया जा सकता है।
- इच्छा से विघटन (धारा 43): जहाँ भागीदारी इच्छा से हो, वहाँ कोई भी भागीदार अन्य सभी भागीदारों को फर्म को भंग करने के अपने आशय की लिखित सूचना देकर फर्म को भंग कर सकता है; फर्म सूचना में उल्लिखित तिथि से भंग हो जाती है, या यदि कोई तिथि उल्लिखित नहीं है, तो सूचना के संसूचना की तिथि से भंग हो जाती है।
- लेखा-निपटान (धारा 48): फर्म के विघटन के बाद लेखा-निपटान करते समय, हानि का भुगतान पहले लाभ में से, फिर पूंजी में से, और अंत में भागीदारों द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाएगा; फर्म की परिसंपत्तियों, जिनमें पूंजी की कमी को पूरा करने के लिये भागीदारों द्वारा योगदान की गई कोई भी राशि शामिल है, का उपयोग पहले पर-व्यक्ति को ऋण चुकाने में, फिर प्रत्येक भागीदार को आनुपापातिक रूप से अग्रिम भुगतान करने में, और अंत में पूंजी चुकाने में किया जाएगा, और यदि कोई शेष राशि बचती है, तो उसे भागीदारों के बीच लाभ में उनके अंश के अनुपात में विभाजित किया जाएगा।
- निवर्तमान भागीदार का लाभ में हिस्सेदारी का अधिकार (धारा 37): जहाँ किसी भागीदार की मृत्यु हो जाती है या वह अन्यथा भागीदार नहीं रहता और जीवित अथवा निरंतर व्यवसाय करने वाले भागीदार लेखा का अंतिम निपटारा किए बिना व्यवसाय को जारी रखते हैं, वहाँ निवर्तमान भागीदार अपने विकल्प पर, अपनी संपत्ति में हिस्से के उपयोग से अर्जित लाभ में अपने हिस्से का अथवा अपने अंश की राशि पर 6 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से ब्याज का हकदार होगा।