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सिविल कानून

अंतरिम प्रक्रम में अंतिम अनुतोष प्रदान करने पर वर्जन पूर्णतः लागू नहीं होता

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 09-Sep-2026

डॉ. आमोद कुमार सचान बनाम ऋचा मिश्रा और अन्य 

"यह कहना कि अंतिम अनुतोष के समान अंतरिम अनुतोष बिल्कुल भी नहीं दी जा सकताविधि की गलत व्याख्या होगी।" 

न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह नेडॉ. अमोद कुमार सचान बनाम ऋचा मिश्रा और अन्य (2026) के मामलेमें एक अपर जिला न्यायाधीश के उस आदेश को अपास्त कर दियाजिसमें अंतरिम प्रक्रम में अंतिम अनुतोष प्रदान करने के आधार पर अस्थायी व्यादेश को रद्द कर दिया गया थायह मानते हुए कि विधि में ऐसा कोई पूर्ण वर्जन मौजूद नहीं है और यह प्रश्न प्रत्येक मामले के तथ्यों पर निर्भर करता है। 

डॉ. अमोद कुमार सचान बनाम ऋचा मिश्रा और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अमोद कुमार सचान ने सिविल जज (सीनियर डिवीजन)लखनऊ के समक्ष नियमित वाद संख्या 455/2026 दायर कियाजिसमें हिंद चैरिटेबल ट्रस्ट के संबंध में घोषणा और व्यादेश की मांग की गईऔर यह अभिवचन किया गया कि वह हमेशा से इसके अध्यक्ष रहे हैं। 
  • उन्होंने आरोप लगाया कि जब वे दिल्ली में थेतब कुछ न्यासियों ने ट्रस्ट के प्रशासनिक कार्यालयों के ताले तोड़ दिये और अभिलेखों को हटा दियाऔर 03.02.2026 को हुई एक बैठक के कार्यवृत्त को उन्हें अध्यक्ष पद से हटाने और प्रबंधन को प्रत्यर्थी संख्या को अंतरित करने के लिये गढ़ा गया था। 
  • उन्होंने आगे आरोप लगाया कि 16.01.2026 की मनगढ़ंत कार्यवृत्त रिपोर्ट के माध्यम सेन्यासियों के पहले से स्वीकृत इस्तीफे रद्द कर दिये गए और एक नए संस्थापक न्यासी को नियुक्त किया गया। 
  • उन्होंने यह घोषणा करने की मांग की कि कार्यवाही के दोनों कार्यवृत्त प्रारंभ से ही शून्य हैंऔर अंतरिम अनुतोष के लिये आदेश 39 नियम और सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन आवेदन किया। 
  • दिनांक 02.04.2026 के आदेश द्वाराविचारण न्यायालय ने न्याय विलेख के अधीन नए चुनाव होने तक प्रतिवादियों को अध्यक्ष के रूप में उनके कामकाज में हस्तक्षेप करने से रोक दिया। 
  • अपर जिला न्यायाधीश ने 08.07.2026 को आदेश 43 नियम 1(सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन दायर दो अपीलों को स्वीकार करते हुए यह माना कि विचारण न्यायालय ने अंतरिम प्रक्रम में अंतिम अनुतोष प्रदान कर दिया थाकि अपील न्यायालय का स्वयं का निर्विवाद अंतरिम आदेश पूर्व- न्याय के रूप में लागू होता हैकि विसंगतियां न्यास विलेख के अधीन एक "आकस्मिक लोपथाऔर वादी ने साफ नीयत से न्यायालय का रुख नहीं किया था। 
  • वादी ने संविधान के अनुच्छेद 227 के अधीन इलाहाबाद उच्च न्यायालय में इस आदेश को चुनौती दी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

अंतरिम प्रक्रम में अंतिम अनुतोष प्रदान करने पर वर्जन के संबंध में: 

  • न्यायालय ने माना कि यह कहना विधि की गलत व्याख्या होगी कि अंतिम अनुतोष के समान अंतरिम अनुतोष कभी नहीं दिया जा सकताऔर अपील न्यायालय व्यादेश को तभी रद्द कर सकता था जब उसने अभिलेख पर मौजूद तथ्यों और सामग्री पर विचार किया होता और विचारण न्यायालय के निष्कर्षों पर विचार किया होता। 

प्रथम अपील न्यायालय की शक्तियों पर: 

  • न्यायालय ने यह माना कि व्यादेश आदेश के विरुद्ध अपील की सुनवाई करने वाला प्रथम अपील न्यायालययद्यपि विचारण न्यायालय के समान शक्तियों का प्रयोग करता हैविचारण न्यायालय के निष्कर्षों पर विचार किये बिना और यह प्रदर्शित किये बिना कि वे गलत क्यों हैंअपना स्वयं का दृष्टिकोण प्रतिस्थापित नहीं कर सकता है। 
  • इसमें कहा गया कि अपील न्यायालय प्रथम दृष्टया मामलेसुविधा के संतुलन और अपूरणीय क्षति के आधार पर आदेश की जांच करने के लिये बाध्य हैजबकि एक संक्षिप्त विचारण से बचना चाहिये 

विचारण न्यायालय के निष्कर्षों पर: 

  • न्यायालय ने कहा कि विचारण न्यायालय ने व्यादेश देने के लिये तीनों आवश्यक तत्त्वों पर निष्कर्ष अभिलिखित किये थेजिनमें फरवरी, 2026 की बैठक के कार्यवृत्त में विसंगतियां शामिल थींजो बैठक की प्रामाणिकता पर संदेह उत्पन्न करती हैंदोनों बैठकों के लिये किसी भी एजेंडा का अभाव और बिना कारण बताओ नोटिस या जांच के प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) के आधार पर वादी को हटाना शामिल है। 

अपील न्यायालय द्वारा अपने ही अंतरिम आदेश पर निर्भरता के संबंध में: 

  • न्यायालय ने माना कि अपील न्यायालय का तर्क दोनों तरह से लागू होता हैक्योंकि उसी तर्क के आधार पर, 10.04.2026 को विचारण न्यायालय के आदेश पर रोक लगाने वाला उसका अपना अंतरिम आदेश भी अंतरिम प्रक्रम में अंतिम अनुतोष प्रदान करने के समान होगा। 
  • इसमें चेतावनी दी गई कि तथ्यों से अलगअमूर्त रूप से विधिक प्रस्तावों को लागू करने से "विधि को बनाए रखने के नाम पर न्याय का मजाक" उड़ाने का जोखिम होता है। 

अंतरिम अवलोकनों की अनिश्चित प्रकृति पर: 

  • न्यायालय ने माना कि किसी याचिका या अपील पर विचार करते समय की गई टिप्पणियां पूरी तरह से अस्थायी होती हैंमामले के गुण-दोष को प्रभावित नहीं करती हैंऔर अंतिम सुनवाई में न्यायालय को बाध्य नहीं करती हैंऔर अपील न्यायालय का विपरीत दृष्टिकोण विधिक प्रस्तावों के बारे में उसकी समझ को खराब ढंग से दर्शाता है। 

'अनजाने में हुए लोप’ के आधार पर: 

  • न्यायालय ने माना कि अपील न्यायालय ने न्यास विलेख के पाठ से "अनजाने में हुए लोपके अभिवचन को अनुचित रूप से उठाया थाजबकि किसी भी प्रतिवादी ने उस खंड पर विश्वास करने का अभिवचन नहीं किया थाऔर ऐसे अभिवचन विचारण के दौरान स्थापित किये जाने चाहियेन कि अंतरिम प्रक्रम में पूर्व-निर्णयित किया जाना चाहिये 

स्वच्छ हस्त सिद्धांत (Clean Hands) पर आपत्ति के संबंध में: 

  • न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अपीलीय न्यायालय को कथित रूप से छिपाए गए तथ्यों और वादी के व्यादेश प्राप्त करने के अधिकार के मध्य संबंध (Nexus) के संबंध में स्पष्ट निष्कर्ष अभिलिखित करना चाहिये था। ऐसा करने में विफल रहने परअपील न्यायालय तथ्यों के प्रकटीकरण न किये जाने को व्यादेश को उन्मोचित करने के आधार के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता था 

अनुच्छेद 227 के दायरे पर: 

  • न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 227 उसे साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन करने या अपने स्वयं के निष्कर्षों को प्रतिस्थापित करने की अनुमति नहीं देता हैऔर तदनुसार अपील न्यायालय के आदेश को अपास्त करते हुएदोनों अपीलों को नए सिरे से निर्णय के लिये बहाल कर दिया। 

नई सुनवाई लंबित रहने तक अंतरिम निर्देशों पर: 

  • यह देखते हुए कि विवाद से ट्रस्ट द्वारा संचालित अस्पतालों और एक मेडिकल कॉलेज के कामकाज पर प्रभाव पड़ रहा थान्यायालय ने निदेश दिया कि ट्रस्ट के बैंक खातों का संचालन याचिकाकर्त्ता और एक अन्य संस्थापक न्यासी (प्रत्यर्थी संख्या नहीं) द्वारा संयुक्त रूप से किया जाएऔर निकासी केवल वेतनसांविधिक देय राशि और इसी प्रकार के संदायों तक सीमित होजिनमें से प्रत्येक को अपील न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाए। 

सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश 39 (अस्थायी व्यादेश) क्या है? 

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 का आदेश 39 सिविल न्यायालयों को अंतिम निर्णय लंबित रहने तक वाद की विषयवस्तु को संरक्षित रखने के लिये अस्थायी व्यादेश जारी करने का अधिकार देता है। इस प्रकार का अनुतोष प्रदान करने वाले न्यायालयों को तीन निर्धारित तत्त्वों से संतुष्ट होना चाहिये: 

  • प्रथम दृष्टया मामला - एक गंभीर प्रश्न जिस पर विचार किया जाना हैन कि गुण-दोष पर कोई निर्णायक निष्कर्ष। 
  • सुविधा का संतुलन — व्यादेश को अस्वीकार करने से उसे प्रदान करने की तुलना में अधिक कठिनाई उत्पन्न होगी। 
  • अपूरणीय क्षति — इंकार के कारण हुई वह हानि जिसकी क्षतिपूर्ति प्रतिकर के रूप में पर्याप्त रूप से नहीं की जा सकती। 

आदेश 39 के अधीन दिये गए आदेश के विरुद्ध अपीलआदेश 43 नियम 1(सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत की जाती है। यद्यपि अपील न्यायालय विचारण न्यायालय के समान शक्तियों का प्रयोग करता हैउसे विचारण न्यायालय के तर्क पर विचार करना चाहिये और उसे चुनौती देनी चाहियेन कि बिना किसी आधार के अपना स्वयं का दृष्टिकोण थोपना चाहिये