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आपराधिक कानून
उच्चतम न्यायालय ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 की व्याख्या की
« »11-Sep-2026
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कुणाल रमेशभाई कल्याणी बनाम गुजरात राज्य एवं अन्य "प्रवंचनापूर्ण साधनों से या किसी महिला से विवाह का वचन करके, उसे पूरा करने के किसी आशय के बिना' शब्द का प्रयोग उस वचन की कठोरता को दर्शाता है जिसे कभी पूरा न करने के आशय से दिया गया हो, जो कि वह प्रवंचनापूर्ण आचरण है जिसके लिये दण्ड मांगा जा रहा है।" न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन |
उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कुणाल रमेशभाई कल्याणी बनाम गुजरात राज्य और अन्य (2026) के मामले में धारा 69 भारतीय न्याय संहिता के अधीन दर्ज FIR को रद्द कर दिया, और गुजरात उच्च न्यायालय के उस आदेश को निरस्त कर दिया जिसमें दीपक गुलाटी बनाम हरियाणा राज्य के मामले का हवाला देते हुए FIR को रद्द करने से इंकार कर दिया गया था, तथा भारतीय दण्ड संहिता के अधीन पहले के व्यवहार से अलग, कपटपूर्ण साधनों द्वारा लैंगिक संबंध के अपराध के दायरे को स्पष्ट किया।
कुणाल रमेशभाई कल्याणी बनाम गुजरात राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता और परिवादकर्त्ता की मुलाकात एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हुई, उनके बीच दोस्ती पनपी जो प्रेम संबंध में बदल गई, और याचिकाकर्त्ता ने अपनी पहली ही मुलाकात में परिवादकर्त्ता से विवाह करने की इच्छा व्यक्त की।
- परिवादकर्त्ता ने फरवरी 2024 में लैंगिक संबंध बनाने की अनुमति दी, और बाद में दोनों अप्रैल 2024 में दो दिनों के लिये एक होटल में साथ रहे।
- याचिकाकर्त्ता ने बाद में अपनी माता की असहमति का हवाला देते हुए विवाह करने के अपने वचन से मुकर गया, जिसके बाद उसके विरुद्ध सयाजीगंज पुलिस थाने, वडोदरा शहर, गुजरात में धारा 69 भारतीय न्याय संहिता के अधीन FIR संख्या 11196030250292 दिनांक 20.05.2025 दर्ज की गई।
- याचिकाकर्त्ता की FIR रद्द करने की याचिका को गुजरात उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया, जिसने दीपक गुलाटी बनाम हरियाणा राज्य मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास किया।
- इससे व्यथित होकर याचिकाकर्त्ता ने विशेष अनुमति याचिका के माध्यम से उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- दीपक गुलाटी मामले पर उच्च न्यायालय की निर्भरता के संबंध में: न्यायालय ने पाया कि दीपक गुलाटी मामले में इस बात के पर्याप्त साक्ष्य आवश्यक थे कि अभियुक्त का प्रारंभिक चरण में ही विवाह का वचन निभाने का कोई आशय नहीं था, और साक्ष्यों से स्पष्ट न होने वाले कारणों से वचन न निभाना हमेशा धारा 90 भारतीय दण्ड संहिता (अब धारा 28 भारतीय न्याय संहिता) के अधीन तथ्य का भ्रम नहीं माना जाता है। न्यायालय ने यह भी पाया कि दीपक गुलाटी मामले पर निर्णय के समय भारतीय दण्ड संहिता में धारा 69 भारतीय न्याय संहिता के समकक्ष कोई उपबंध मौजूद नहीं था।
- भारतीय दण्ड संहिता व्यवस्था के अधीन विधिक स्थिति पर: पीठ ने स्पष्ट किया कि भारतीय दण्ड संहिता के अधीन, विवाह के मिथ्या वचन पर धारा 375 के साथ धारा 90 भारतीय दण्ड संहिता (अब क्रमशः भारतीय न्याय संहिता की धारा 63 और 28) के अधीन अभियोजन चलाया जाता है, जिसके लिये यह साबित करना आवश्यक है कि सहमति दूषित हो गई थी क्योंकि पीड़ित को ऐसे वचन पर विश्वास दिलाया गया था जिसे अभियुक्त ने वचन करते समय भी पूरा करने का आशय नहीं किया था।
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 के दायरे पर: न्यायालय ने माना कि धारा 69 भारतीय न्याय संहिता कपटपूर्ण और प्रवंचनापूर्ण आचरण को बलात्संग जैसे गंभीर अपराध से अलग एक विशिष्ट अपराध के रूप में परिभाषित करती है, साथ ही ऐसे प्रवंचनापूर्ण आचरण को दण्डित भी करती है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह उपबंध पहले की तरह ही कठोर है, जिसके अधीन यह साबित करना आवश्यक है कि वचन कभी पूरा न करने के आशय से किया गया था।
- तथ्यों में प्रवंचना के अभाव पर: परिवाद की परीक्षा करते हुए, पीठ ने याचिकाकर्त्ता की ओर से प्रवंचनापूर्ण आचरण का कोई संकेत नहीं पाया, और यह माना कि परिवाद में दिये गए कथन स्पष्ट रूप से सहमति से बने संबंध को दर्शाते हैं, न कि प्रवंचना के माध्यम से प्रेरित लैंगिक संबंध को।
- शारीरिक संबंध के प्रथम अवसर के संबंध में: न्यायालय ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि परिवाद में यह आरोप तक नहीं लगाया गया था कि प्रथम बार शारीरिक संबंध स्थापित करना विवाह के किसी वचन पर आधारित या सशर्त था। परिवादकर्त्ता ने केवल इतना कथन किया था कि वह “उसके अनुनय-विनय के समक्ष समर्पण कर बैठी।"
- माता-पिता की अस्वीकृति के प्रभाव पर: पीठ ने माना कि याचिकाकर्त्ता द्वारा बाद में विवाह करने से इंकार करना, जिसका कारण उसकी माता की अस्वीकृति बताया गया था, प्रवंचना नहीं था और अपितु यह दर्शाता था कि वचन सद्भावना से किया गया था।
- कार्यवाही जारी रखने का कोई आधार न पाते हुए, उच्चतम न्यायालय ने याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध दर्ज FIR को रद्द कर दिया।
भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 क्या है?
संबंधित पुराना उपबंध : भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 375 और 90 (एक साथ पढ़ी जाएं)
मूल अधिनियम का पाठ:
प्रवंचनापूर्णसाधनों आदि का प्रयोग करके मैथुन— जो कोई प्रवंचनापूर्ण साधनों द्वारा या किसी महिला से विवाह करने का ऐसा वचन देकर, जिसे पूरा करने का उसका कोई आशय न हो, उसके साथ लैंगिक संभोग करेगा और ऐसा लैंगिक संभोग बलात्कार के अपराध की श्रेणी में नहीं आता है, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और जुर्माने के लिए भी उत्तरदायी होगा।
स्पष्टीकरण— “प्रवंचनापूर्ण साधनों” के अंतर्गत नियोजन या पदोन्नति का मिथ्या वचन, प्रलोभन अथवा अपनी पहचान छिपाकर विवाह करना सम्मिलित होगा।
भारतीय न्याय संहिता वर्गीकरण:
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दण्ड |
संज्ञेय/असंज्ञेय |
जमानतीय/अजमानतीय |
विचारण किसके द्वारा |
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दस वर्ष तक का कारावास और जुर्माना |
संज्ञेय |
अजमानतीय |
सेशन न्यायालय |