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सांविधानिक विधि
रोगी द्वारा प्राधिकृत किये जाने पर, आपातकालीन स्थिति में समलैंगिक साथी चिकित्सीय निर्णय ले सकते हैं
«16-Sep-2026
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अर्शिया टक्कर बनाम भारत संघ एवं अन्य "किसी व्यक्ति को केवल उसके साथी के लिंग, लैंगिक पहचान या लैंगिक अभिविन्यास के आधार पर या इसलिये कि उनका संबंध विवाह की पारंपरिक समझ के दायरे में नहीं आता है, उसे बाहर करने का कोई चिकित्सीय या नैतिक औचित्य नहीं है।" केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय |
चर्चा में क्यों?
दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ के समक्ष, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) ने अर्शिया टक्कर बनाम भारत संघ और अन्य (2026) के मामले में यह तर्क दिया है कि एक सक्षम वयस्क को अपने साथी को नामित करने की अनुमति दी जानी चाहिये, जिसमें गैर-विषमलिंगी या समलैंगिक संबंध में साथी भी शामिल है, जिससे यदि वे बाद में अक्षम हो जाते हैं तो उनकी ओर से चिकित्सा संबंधी निर्णय लिये जा सकें।
अर्शिया टक्कर बनाम भारत संघ और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अर्शिया टक्कर द्वारा यह याचिका दायर की गई थी, जिसमें रोगी के गैर-विषमलिंगी साथी को उनके चिकित्सा प्रतिनिधि के रूप में मान्यता देने के लिये दिशानिर्देश तैयार करने की मांग की गई थी, जिन्हें चिकित्सा स्थितियों में सहमति देने का अधिकार हो।
- विकल्प के तौर पर, याचिका में यह घोषणा करने की मांग की गई थी कि किसी मरीज द्वारा अपने गैर-विषमलिंगी साथी को पहले से दी गई मेडिकल पावर ऑफ अटॉर्नी, चिकित्सा उपचार या आपात स्थिति के दौरान ऐसे साथी को विधिवत रूप से गठित चिकित्सा प्रतिनिधि के रूप में कार्य करने की अनुमति देने के लिये पर्याप्त होनी चाहिये।
- याचिकाकर्त्ता ने भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद् विनियम, 2002 का खंड 7.16 पर विश्वास किया, जो चिकित्सा प्रक्रियाओं के लिये "पति या पत्नी, अवयस्क के मामले में माता-पिता या संरक्षक, या स्वयं रोगी" से सहमति अनिवार्य करता है, और तर्क दिया कि समलैंगिक संबंधों में भागीदारों की स्पष्ट मान्यता का अभाव उसे अपने साथी के लिये महत्त्वपूर्ण चिकित्सा निर्णय लेने में प्रभावी रूप से शक्तिहीन बना देता है - एक ऐसा अधिकार जो विषमलैंगिक जोड़ों को आसानी से उपलब्ध है।
- याचिकाकर्त्ता ने नवतेज जोहर बनाम भारत संघ मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि यह संविधान के अनुच्छेद 15 के अधीन लिंग के आधार पर "व्यवस्थित बहिष्कार" और विभेद का गठन करता है, जिसमें लैंगिक अभिविन्यास को "लिंग" के अर्थ के अंतर्गत शामिल किया गया है, और आगे तर्क दिया कि यह बहिष्कार अनुच्छेद 21 के अधीन प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करता है।
- पिछले महीने, न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने केंद्र से मौखिक रूप से प्रश्न किया था कि यदि समलैंगिक भागीदारों को संबंध और सहवास का अधिकार है, तो उन्हें एक-दूसरे के लिये चिकित्सा सहमति देने के विकल्प से क्यों वंचित किया जाना चाहिये।
केंद्र ने न्यायालय के समक्ष क्या प्रस्तुत किया है?
- विद्यमान ढाँचे के भीतर अनुतोष को समायोजित करने के संबंध में: केंद्र ने प्रस्तुत किया कि याचिका में मांगा गया अनुतोष लागू विधि और उचित सुरक्षा उपायों के अधीन, विद्यमान विधि और नैतिक ढाँचे के भीतर पर्याप्त रूप से समायोजित किया जा सकता हैं।
- LGBTQIA+ समुदाय को सांविधानिक गारंटी का सम्मान करने के संबंध में: केंद्र ने कहा कि वह गरिमा, निजता, स्वायत्तता, समानता तथा व्यक्तिगत चयन से संबंधित उन सांविधानिक गारंटी को मान्यता देता है और उनका सम्मान करता है, जो LGBTQIA+ समुदाय के सदस्यों सहित सभी व्यक्तियों को उपलब्ध हैं। केंद्र ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके द्वारा प्रस्तुत उत्तर का उद्देश्य क्वीर संबंधों (Queer Relationships) में रहने वाले व्यक्तियों को उपलब्ध सांविधानिक संरक्षण पर प्रश्न उठाना नहीं था।।
- लैंगिक अभिविन्यास के आधार पर बहिष्कार के औचित्य के अभाव पर: केंद्र ने प्रस्तुत किया कि जहाँ एक सक्षम वयस्क ने अक्षमता की स्थिति में अपनी ओर से कार्य करने के लिये अपने साथी को नामित या अन्यथा अधिकृत किया है, वहाँ केवल भागीदारों के लिंग, लैंगिक पहचान या लैंगिक अभिविन्यास के कारण, या इसलिये कि उनका संबंध विवाह की पारंपरिक समझ के अंतर्गत नहीं आता है, ऐसे व्यक्ति को बाहर करने का कोई चिकित्सा या नैतिक औचित्य नहीं है।
- देखरेख संबंधी संबंधों का वैवाहिक या रक्त संबंधों तक सीमित न होना: केंद्र ने पाया कि प्रशासनिक उपाय पहले से ही इस बात की निरंतर मान्यता दर्शाते हैं कि देखरेख, निर्भरता और पारस्परिक जिम्मेदारी के संबंध औपचारिक रूप से मान्यता प्राप्त वैवाहिक या रक्त संबंधों तक ही सीमित नहीं हैं, और किसी सक्षम वयस्क को चिकित्सा संबंधी निर्णय लेने के लिये एक समलैंगिक साथी को नामित करने की अनुमति देना उसी सिद्धांत का एक तार्किक और उपयुक्त विस्तार होगा।
- IMC विनियम, 2002 के खंड 7.16 की व्याख्या के संबंध में: केंद्र ने प्रस्तुत किया कि खंड 7.16 की व्याख्या विद्यमान विधिक ढाँचे के साथ सामंजस्यपूर्ण एवं उद्देश्यपरक रूप से की जानी चाहिये, जिससे किसी सक्षम वयस्क रोगी द्वारा विधिवत् नामित या प्राधिकृत साथी को केवल लिंग, जेंडर, लैंगिक अभिविन्यास अथवा औपचारिक रूप से मान्य वैवाहिक संबंध के अभाव के आधार पर अपवर्जित न किया जाए।।
- पूर्व नामांकन के अभाव में स्थिति के संबंध में: केंद्र ने प्रस्तुत किया कि पूर्व नामांकन के अभाव में, उचित परिस्थितियों में और लागू विधि, सत्यापन और सुरक्षा उपायों के अधीन रहते हुए, चिकित्सा संबंधी निर्णय लेने के प्रयोजनों के लिये साथी को भी देखरेख के रिश्ते में व्यक्ति या निकटतम मित्र के रूप में माना जा सकता है।
- सांविधानिक मूल्यों को आगे बढ़ाने के संबंध में: केंद्र ने प्रस्तुत किया कि इस प्रकार का निर्वचन, रोगी की सुरक्षा और उचित प्रक्रिया को बनाए रखते हुए, स्वायत्तता, गरिमा, समता और गैर-भेदभाव के सांविधानिक मूल्यों को आगे बढ़ाएगी।
- केंद्र सरकार ने आग्रह किया कि याचिकाकर्त्ता की प्रार्थनाओं की परीक्षा विद्यमान वैधानिक प्रावधानों, न्यायिक निर्णयों और सरकारी नीतिगत उपायों के आलोक में की जाए, क्योंकि चिकित्सा संबंधी निर्णय अंततः उपचार की प्रकृति, परिस्थितियों, रोगी की इच्छाओं और लागू विधिक ढाँचे पर निर्भर करते हैं। यह मामला दिल्ली उच्च न्यायालय में लंबित है।
LGBTQIA+ क्या है?
बारे में:
- LGBTQIA+ एक संक्षिप्ताक्षर (Acronym) है, जो समलैंगिक महिला (Lesbian), समलैंगिक पुरुष (Gay), उभयलिंगी (Bisexual), ट्रांसजेंडर (Transgender), क्वियर (Queer), इंटरसेक्स (Intersex) तथा अलैंगिक (Asexual) व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करता है।
- "+" उन अनेक अन्य पहचानों का प्रतिनिधित्व करता है जिनकी अभी भी खोज और समझ की जा रही है; यह संक्षिप्त रूप लगातार विकसित हो रहा है और इसमें गैर-बाइनरी (non-binary) और पैनसेक्सुअल (Pansexual) जैसे शब्द शामिल हो सकते हैं।
- "क्वीर (Queer)" शब्द के बारे में: "क्वीर" शब्द, जिसका प्रयोग अब एक समावेशी और आत्म-पहचान बताने वाले लेबल के रूप में किया जाता है, पहले उन लोगों के विरुद्ध एक अपमानजनक शब्द के रूप में प्रयोग किया जाता था जो विषमलिंगी या सिसजेंडर मानदंडों के अनुरूप नहीं थे। बाद में इस समुदाय ने इसे गर्व और आत्म-पहचान के प्रतीक के रूप में अपनाया और आज इसका प्रयोग एक व्यापक शब्द के रूप में किया जाता है जो उन सभी व्यक्तियों को शामिल करता है जिनकी लैंगिक अभिवृति, लिंग पहचान या लिंग अभिव्यक्ति पारंपरिक विषमलिंगी या द्विलिंगी मानदंडों से बाहर आती है - जिनमें समलैंगिक, गे, उभयलिंगी, ट्रांसजेंडर या गैर-द्विलिंगी के रूप में पहचान करने वाले लोग शामिल हैं, लेकिन इन्हीं तक सीमित नहीं हैं।
भारत में LGBTQIA+ समुदाय की मान्यता का इतिहास:
औपनिवेशिक युग और कलंक (1990 के दशक से पूर्व):
- 1861: ब्रिटिश शासन के अधीन भारतीय दण्ड संहिता की धारा 377 लागू की गई, जिसमें "प्रकृति के विरुद्ध लैंगिक संबंध" को अपराध घोषित किया गया और यह भारत में LGBTQIA+ अधिकारों के लिये एक बड़ी बाधा बन गई।
प्रारंभिक पहचान और सक्रियता (1990 का दशक):
- 1981: प्रथम अखिल भारतीय हिजड़ा सम्मेलन आयोजित किया गया।
- 1991: एड्स भेदभाव विरोधी आंदोलन (ABVA) ने भारत में LGBTQIA+ लोगों की स्थिति पर पहली सार्वजनिक रिपोर्ट "लेस दैन गे" प्रकाशित की, जिसमें विधिक परिवर्तन की मांग की गई।
महत्त्वपूर्ण मामले और असफलताएँ (2000 का दशक):
- 2001: नाज़ फाउंडेशन ने धारा 377 को चुनौती देते हुए एक लोकहित याचिका (PIL) दायर की।
- 2009: दिल्ली उच्च न्यायालय ने नाज़ फाउंडेशन बनाम दिल्ली सरकार के मामले में सहमति से किये गए समलैंगिक कृत्यों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया, जिसे LGBTQIA+ अधिकारों के लिये एक बड़ी जीत के रूप में देखा गया।
- 2013: उच्चतम न्यायालय ने एक अप्रत्याशित निर्णय में दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय को पलट दिया और धारा 377 को बरकरार रखा।
हालिया प्रगति और जारी संघर्ष (2010 का दशक - वर्तमान):
- 2014: राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण बनाम भारत संघ (NALSA निर्णय) मामले में उच्चतम न्यायालय ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को "तीसरे लिंग" के रूप में मान्यता दी।
- 2018: उच्चतम न्यायालय ने नवतेज सिंह जोहर बनाम भारत संघ के मामले में धारा 377 को निरस्त कर दिया, जिससे सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया।
- 2019: ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 पारित किया गया, जो ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को विधिक मान्यता प्रदान करता है और उनके विरुद्ध विभेद को प्रतिबंधित करता है।
- 2020: उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने समलैंगिक जोड़ों के लिव-इन संबंधों को विधिक संरक्षण प्रदान करने की मान्यता दी।
- 2021: अंजली गुरु संजना जान बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य के मामले में, बॉम्बे उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि याचिकाकर्त्ता, एक ट्रांसजेंडर महिला, जिसका ग्राम पंचायत चुनाव आवेदन (महिला उम्मीदवार के रूप में दायर किया गया) खारिज कर दिया गया था, को अपने लिंग की पहचान स्वयं करने का अधिकार था, और उसके आवेदन को स्वीकार करता है।
- 2022: अगस्त 2022 में, उच्चतम न्यायालय ने "परिवार" की परिभाषा का विस्तार करते हुए उसमें समलैंगिक जोड़ों और क्वीर संबंधों को शामिल किया।
- 2023: अक्टूबर 2023 में, उच्चतम न्यायालय की पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने भारत में समलैंगिक विवाह को वैध बनाने की मांग वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया, यह मानते हुए कि उसके पास समलैंगिक जोड़ों को शामिल करने के लिये प्रावधानों को जोड़ने या हटाने के द्वारा विशेष विवाह अधिनियम, 1954 को संशोधित करने का अधिकार नहीं है, और यह स्पष्ट किया कि ऐसी विधियों को अधिनियमित करने का उत्तरदायित्व संसद और राज्य विधानसभाओं का है।