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आपराधिक कानून

जमानत रद्द करना बनाम जमानत आदेश का अपास्त किया जाना — दोनों एक ही नहीं हैं

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 17-Sep-2026

मनन चुघ बनाम हरियाणा राज्य और अन्य 

"जमानत रद्द करने और जमानत आदेश को अपास्त करने के बीच एक वैचारिक अंतर है... जमानत आदेश को निरस्त करने की याचिका मेंजिन कारकों पर विचार किया जाना आवश्यक हैवे इस बात से संबंधित हैं कि संबंधित आदेश अनुचितअवैध या सुसंगत विचारों पर आधारित नहीं है।" 

न्यायमूर्ति सुमीत गोयल 

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति सुमीत गोयल नेमनन चुघ बनाम हरियाणा राज्य और अन्य (2026) के मामलेमेंयात्रा कपट के मामले में अभियुक्त एक महिला को दी गई नियमित जमानत याचिका को रद्द करने की मांग वाली याचिका को अपास्त कर दियाजमानत रद्द करने और जमानत याचिका को अपास्त करने के बीच वैचारिक अंतर को दोहराते हुएउसके भागने के जोखिम की चिंताओं को देखते हुए अपना पासपोर्ट सरेंडर करने का निदेश दिया। 

मनन चुघ बनाम हरियाणा राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ता-परिवादकर्त्ता ने आरोप लगाया कि प्रत्यर्थी संख्या 2, अपने पिता और अन्य सह-अभियुक्तों के साथ मिलकर एक यात्रा व्यवसाय चलाती थी और यात्रा व्यवस्था के लिये उससे ₹8,90,000 प्राप्त किये थे। 
  • जैसे-जैसे यात्रा की तारीख नजदीक आती गईपरिवादकर्त्ता को पता चला कि हवाई टिकट और होटल आरक्षण जालीरद्द या अमान्य थेजिसके कारण उसे बहुत अधिक लागत पर नए सिरे से व्यवस्था करनी पड़ी।  
  • भारतीय न्याय संहिता की धारा 318(4), 3(5) और 316(2) के अधीन प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई। 
  • गुरुग्राम के अपर सेशन न्यायाधीश ने प्रत्यर्थी संख्या को नियमित जमानत प्रदान की। 
  • याचिकाकर्त्ता ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के समक्ष इस जमानत आदेश को रद्द करने की मांग करते हुए तर्क दिया कि विचारण न्यायालय अन्वेषण सामग्री को ठीक से समझने में विफल रहीजिसमें छल और जालसाजी की एक सुनियोजित योजना दिखाई गई थीकि इसी प्रकार की FIR और इसी प्रकार के अपराधों के पैटर्न पर ठीक से विचार नहीं किया गया थाऔर यह कि प्रत्यर्थी संख्या के भागने का खतरा थाक्योंकि उसे पहले IGI हवाई अड्डे पर कथित तौर पर दुबई भागने की कोशिश करते हुए पकड़ा गया था। 
  • राज्य ने याचिकाकर्त्ता का समर्थन करते हुए प्रत्यर्थी द्वारा कथित तौर पर किये गए इसी प्रकार के अपराधों के सिलसिले का हवाला दिया। 
  • प्रत्यर्थी के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि याचिका सार रूप मेंएक सुविचारित जमानत आदेश की अग्राह्य समीक्षा थीऔर जमानत दिये जाने के बाद से कोई भी अप्रत्याशित घटना अभिलेख में अभिलिखित नहीं की गई थी।   

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • दोनों उपचारों के बीच वैचारिक अंतर पर: 
    दिनेश मदन बनाम हरियाणा राज्य (2024) में अपने पूर्व के निर्णय पर विश्वास करते हुएन्यायालय ने माना कि "जमानत रद्द करना" के लिये रिहाई के बाद अभियुक्त की अप्रत्याशित परिस्थितियों या दुर्व्यवहार की आवश्यकता होती हैजबकि "जमानत आदेश को अपास्त करना" के लिये मूल आदेश को अनुचितअवैध या अप्रासंगिक विचारों पर आधारित दिखाया जाना आवश्यक है। 
  • वर्तमान याचिका का वर्गीकरण करते हुए: 
    न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्त्ता मूल रूप से जमानत आदेश को ही अपास्त करने की मांग कर रहा था - इस आधार पर कि विचारण न्यायालय जमानत दिये जाने के समय उपलब्ध सामग्री पर विचार करने में विफल रही थी - न कि जमानत के बाद के किसी अप्रत्याशित आचरण की ओर इशारा कर रहा था। 
  • जमानत आदेश को अपास्त करने के लिये परीक्षा लागू करने पर: 
    यह परीक्षा करते हुए कि क्या विचारण न्यायालय का आदेश विकृतअवैध या पूरी तरह से अप्रासंगिक विचारों पर आधारित थान्यायालय ने इसे एक "सुविचारित आदेश" पायाजो मुख्य रूप से इस आधार पर दिया गया था कि एक ऐसे विचारण में सबूतों के माध्यम से दोष स्थापित करने की आवश्यकता होगी जिसमें काफी समय लगने की उम्मीद हैऔर चालान पहले ही प्रस्तुत किया जा चुका है। 
  • अप्रत्याशित परिस्थितियों के अभाव में: 
    न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्त्ता यह साबित नहीं कर पाया है कि प्रत्यर्थी संख्या ने जमानत मिलने के बाद साक्षियों को प्रभावित करनेसाक्ष्यों से छेड़छाड़ करने या जमानत की किसी शर्त का उल्लंघन करने का प्रयास किया थाऔर यह कि उठाई गई आशंकाएं काफी हद तक काल्पनिक थीं और ठोस सबूतों से समर्थित नहीं थीं। 
  • पहले से विचारे गए मामलों को दोबारा उठाने के संबंध में: 
    न्यायालय ने माना कि उठाए गए आधार - आरोपों की प्रकृति और गंभीरता तथा समान अपराधों का कथित पैटर्न - ऐसे मामले थे जो जमानत दिये जाने के समय उपलब्ध थे और संभवतः उन पर विचार किया गया थाऔर किसी भी अप्रत्याशित परिस्थिति के अभाव में इन्हें दोबारा नहीं उठाया जा सकता था। 
  • भागने के जोखिम संबंधी चिंताओं को संतुलित करने पर: 
    जमानत आदेश को अपास्त करने के लिये आधारों के अभाव में याचिका को खारिज करते हुएन्यायालय ने प्रत्यर्थी संख्या को संबंधित विचारण न्यायालय में दिनों के भीतर अपना पासपोर्ट सौंपने का निदेश दियामूल जमानत आदेश को प्रभावित किये बिना भागने के जोखिम की आशंका को दूर कियाऔर स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दर्शाती हैं। 

जमानत का निरस्तीकरण और जमानत आदेश को अपास्त करने के बीच अंतर 

आधार 

जमानत का निरस्तीकरण  

जमानत आदेश को अपास्त करना 

अभिवचन की प्रकृति  

पहले से प्रदान की गई जमानत को अभियुक्त द्वारा रिहाई के पश्चात् किये गए आचरण के आधार पर निरस्त करने की मांग की जाती है।  

जमानत आदेश को स्वयं चुनौती देते हुएउसके गुण-दोष के आधार पर आदेश को उलटने की मांग की जाती है।  

विचारणीय कारक 

जमानत प्रदान किये जाने के पश्चात् उत्पन्न परिस्थितियाँ/घटनाएँ अथवा अभियुक्त का दुराचरण।  

क्या प्रश्नगत आदेश अनुचितअवैध अथवा अप्रासंगिक विचारणीय कारकों पर आधारित है।  

दृष्टांतदर्शक आधार 

साक्षियों को प्रभावित करके स्वतंत्रता का दुरुपयोग करनाविचारण में विलंब करनाजमानत पर रहते हुए अन्य अपराध करनाजमानत की शर्तों का उल्लंघन करनाअथवा मिथ्या दुर्व्यपदेशन /कपट/तथ्यों के छिपाव द्वारा जमानत प्राप्त करना।    

मूल आदेश का विकृत या अवैध होना अथवा आदेश पारित किये जाने के समय पूर्णतः अप्रासंगिक विचारणीय कारकों पर आधारित होना।  

सबूत का मानदंड 

संभावनाओं की प्रबलता युक्तियुक्त संदेह से परे प्रमाण आवश्यक नहीं है। 

आदेश की इस आधार पर परीक्षा की जाती है कि वह अनुचित/अवैध है या नहींसंभावनाओं के आधार पर नए सिरे से तथ्यात्मक जांच नहीं की जाती।  

मंच — वही न्यायालय 

उसी न्यायालय के समक्ष आवेदन किया जा सकता है जिसने जमानत प्रदान की हो (उदाहरणार्थदण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 437(5) के अधीन मजिस्ट्रेट द्वारा स्वयं प्रदान की गई जमानत निरस्त की जा सकती है)। 

उस न्यायालय से उच्चतर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाना आवश्यक है जिसने जमानत प्रदान की थीउसी न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। 

मंच — मजिस्ट्रेट द्वारा प्रदान जमानत 

सेशन न्यायालय/उच्च न्यायालय मजिस्ट्रेट द्वारा प्रदान की गई जमानत को केवल पश्चात्वर्ती आधारोंजैसे जमानत की शर्तों के उल्लंघनपर निरस्त कर सकता है। 

सामान्यतः सेशन न्यायालय के समक्ष आवेदन किया जाता हैउच्च न्यायालय को स्वतः वर्जित नहीं किया गया है (धारा 439(2) के अधीन समवर्ती अधिकारिता)किंतु सीधे उच्च न्यायालय का रुख करने के लिये ठोस कारण अपेक्षित होते हैं। 

मंच — सेशन न्यायालय द्वारा प्रदान जमानत 

उच्च न्यायालय इसे निरस्त कर सकता हैसेशन न्यायालय अपनी स्वयं की प्रदान की गई जमानत को भी निरस्त कर सकता है। 

आवेदन उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाना आवश्यक है।  

मंच — उच्च न्यायालय द्वारा प्रदान जमानत  

सेशन न्यायालय केवल उच्च न्यायालय द्वारा अधिरोपित शर्तों के उल्लंघन या पश्चात्वर्ती दुरुपयोग के आधार पर जमानत निरस्त कर सकता हैवह उच्च न्यायालय के आदेश की शुद्धता का पुनर्निर्णयन नहीं कर सकता।  

लागू नहीं — इस आधार पर उच्च न्यायालय के जमानत आदेश की समीक्षा करने हेतु इस रूपरेखा के अंतर्गत कोई उच्चतर न्यायालय उपलब्ध नहीं है।  

कपट/दुर्व्यपदेशन का आधार 

यदि ऐसा आरोप लगाया गया हैतो सामान्यतः आवेदन पहले उसी न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिये जिसने जमानत प्रदान की थी। 

इसके लिये यह स्वाभाविक मंच नहीं हैकपट/दुर्व्यपदेशन जमानत के निरस्तीकरण का आधार हैन कि जमानत आदेश को अपास्त करने का। 

मूल प्रकृति 

जमानत प्रदान किये जाने के पश्चात् अभियुक्त के आचरण की तथ्य-विशिष्ट जांच।  

मूल जमानत प्रदान करने वाले आदेश का विधिक/गुण-दोष संबंधी पुनरीक्षण।