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आपराधिक कानून

शारीरिक दण्ड को लैंगिक हमला नहीं माना जाएगा

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 14-Sep-2026

भास्कर पॉल बनाम पश्चिम बंगाल राज्य 

"यद्यपि एक शिक्षक के रूप में अपीलकर्त्ता का आचरण उचित नहीं हो सकता हैविशेष रूप से शारीरिक दण्ड का सहारा लेना और छात्राओं के साथ व्यवहार करते समय असंवेदनशीलता दिखाना... अपीलकर्त्ता की ओर से अपर्याप्तता या शारीरिक दण्ड का सहारा लेना लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 10 को आकर्षित नहीं करेगा।"  

न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदूरकर 

उच्चतम न्यायालय  

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ नेभास्कर पॉल बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2026) के मामलेमें एक स्कूल शिक्षक के विरुद्ध लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 10 के अधीन आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दियायह मानते हुए कि उसका आचरणतथापि अनुचित थाअपराध गठित करने के लिये आवश्यक लैंगिक आशय को प्रकट नहीं करता था। 

भास्कर पॉल बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • महिला शिक्षकों ने प्रधानाध्यापक को सूचित किया कि अपीलकर्त्ताजो एक शिक्षक हैने कक्षा 10 की कुछ छात्राओं को शारीरिक रूप से छुआ थाजिन्होंने उसके विरुद्ध मौखिक रूप से परिवाद किया था।    
  • इसके बादजिला बाल संरक्षण यूनिट (DCPU) ने स्कूल का दौरा किया और एक परामर्श-सह-जांच रिपोर्ट तैयार कीजिसके आधार पर पुलिस ने लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 10 के अधीन स्वतः संज्ञान लेते हुए FIR दर्ज की। 
  • जांच रिपोर्ट में अभिलिखित किया गया कि छात्राओं ने बताया कि जब वे कक्षा में ध्यान नहीं देती थीं तो शिक्षक उनकी पीठ के ऊपरी हिस्से पर पीटता थाऔर जिस प्रकार से वह उन्हें छूता था (उनकी पीठ रगड़नाकमर पर चुटकी काटना) उससे उन्हें असहज महसूस होता था। 
  • इसमें एक ऐसी घटना भी दर्ज की गई है जिसमें शिक्षक ने नक्शा न लाने पर एक छात्रा को थप्पड़ मारा और उसकी गर्दन को "अनुचित तरीके से" छुआ। अन्य छात्रों ने बताया कि यद्यपि उसने उन्हें छुआ नहींलेकिन उसके देखने का तरीका उन्हें असहज कर रहा था। 
  • पीड़ितों के कथन भी मजिस्ट्रेट द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 183 (पूर्व में धारा 164 दण्ड प्रक्रिया संहिता) के अधीन अभिलिखित किये गए थे। 
  • अपीलकर्त्ता ने कलकत्ता उच्च न्यायालय (जलपाईगुड़ी स्थित सर्किट बेंच) के समक्ष भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 (पूर्व में धारा 482 दण्ड प्रक्रिया संहिता) के अधीन दर्ज FIR को रद्द करने की मांग कीजिसने कार्यवाही को रद्द करने से इंकार कर दिया।  
  • इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख कियाजिसने उसके विरुद्ध कार्यवाही पर रोक लगा दी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • धारा के अधीन लैंगिक हमला के आवश्यक तत्त्व पर: 
    न्यायालय ने माना कि लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा के अधीन "लैंगिक हमला" के लिये बालक के निजी अंगों को छूनाया प्रवेश के बिना शारीरिक संपर्क से जुड़ा कोई अन्य कृत्य, "लैंगिक आशय" के साथ किया जाना आवश्यक है – लैंगिक आशय वह आवश्यक तत्त्व है जिसके बिना अपराध नहीं बनता है।     
  • लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 10 के लिये सीमा:  
    न्यायालय ने माना कि यद्यपि एक शिक्षक के रूप में अपीलकर्त्ता का आचरण अनुचित थाविशेष रूप से शारीरिक दण्ड का सहारा लेना और छात्राओं के साथ व्यवहार करते समय संवेदनशीलता की कमीपीड़ितों के कथनों को ध्यानपूर्वक पढ़ने से धारा 10 को आकर्षित करने के लिये आवश्यक लैंगिक आशय का प्रकटन नहीं हुआ। 
  • अनुचित आचरण और लैंगिक अपराध के बीच अंतर पर: 
    न्यायालय ने टिप्पणी की कि छात्रों को संभालने में शिक्षक की अपर्याप्तताया उसके द्वारा शारीरिक दण्ड का सहारा लेनाअपने आप में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 10 को आकर्षित नहीं करेगाभले ही ऐसा आचरण अनुशासनात्मक दृष्टिकोण से आपत्तिजनक हो।  
  • लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अभियोजन से होने वाले अपरिवर्तनीय नुकसान पर: 
    न्यायालय ने कहा कि किसी बालिका विद्यालय या सहशिक्षा संस्थान में शिक्षक के विरुद्ध लैंगिक हमले का आरोप उसे वस्तुतः उसके पूरे करियर और जीवन के लिये दोषी ठहरा देता हैऔर अंततः दोषमुक्त होना भी आपराधिक विचारण से पहले ही हुए नुकसान की भरपाई के लिये "पूरी तरह से अपर्याप्त" होगा।  
  • विलंब और साक्ष्य की प्रकृति पर: 
    न्यायालय ने FIR दर्ज करने में हुई देरी पर आपत्ति जताई और कहा कि प्रधानाध्यापक और महिला शिक्षकों के कथनजिन्होंने आपराधिक प्रक्रिया शुरू की थीअनुश्रुत साक्ष्य पर आधारित साक्ष्य हैं। 
  • अभियोजन जारी रखना प्रक्रिया का दुरुपयोग है: 
    न्यायालय ने माना कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के आधार पर अभियोजन जारी रखने की अनुमति देना विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और अपीलकर्त्ता को अत्यधिक नुकसान पहुँचाएगायद्यपि न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इससे उसके आचरण को क्षमा नहीं किया जाता हैऔर उसे कम आयु के विद्यार्थियोंविशेष रूप से छात्राओं के साथ व्यवहार करते समय स्वयं को संवेदनशील बनाने की आवश्यकता है। 
  • उपरोक्त के मद्देनजरन्यायालय ने अलीपुरदुआर स्थित विशेष न्यायालय के समक्ष लंबित मामले से संबंधित संपूर्ण कार्यवाही को रद्द कर दिया और उच्च न्यायालय के आदेश को अपास्त कर दिया। 

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 के अंतर्गत लैंगिक हमला को नियंत्रित करने वाली विधि क्या है? 

  • लैंगिक हमला (धारा 7):जो कोईलैंगिक आशय से बालक की योनिलिंगगुदा या स्तनों को स्पर्श करता है या बालक से ऐसे व्यक्ति या किसी अन्य व्यक्ति की योनिलिंगगुदा या स्तन का स्पर्श कराता है या लैंगिक आशय से कोई अन्य कार्य करता है जिसमें प्रवेशन किये बिना शारीरिक संपर्क अंतर्ग्रस्त होता हैलैंगिक हमला करता हैयह कहा जाता है 
  • लैंगिक हमले के लिये दण्ड (धारा 8):जो कोईलैंगिक हमला करेगा वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि तीन वर्ष से कम की नहीं होगी किंतु जो पाँच वर्ष तक की हो सकेगीदंडित किया जाएगा और जुमनि से भी दंडनीय होगा 
  • विश्वास या अधिकार के पद पर आसीन व्यक्तियों द्वारा गंभीर यौन उत्पीड़न (धारा 9()):जो कोईकिसी शैक्षणिक संस्था के प्रबंधन या कर्मचारियों पर किसी व्यक्ति द्वारा उस संस्था में अध्ययनरत बालक पर किया गया लैंगिक हमला गुरुतर लैंगिक हमला कहलाता है। 
  • गुरुतर लैंगिक हमले के लिये दण्ड (धारा 10):जो कोईगुरुतर लैंगिक हमला करेगावह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि पाँच वर्ष से कम की नहीं होगी किंतु जो सात वर्ष तक की हो सकेगीदंडित किया जाएगा और जुमनि से भी दंडनीय होगा 

शारीरिक दण्ड क्या है? 

बारे में: 

  • संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समिति द्वारा शारीरिक दण्ड को "कोई भी ऐसा दण्ड जिसमें शारीरिक बल का प्रयोग किया जाता है और जिसका उद्देश्य किसी भी हद तक दर्द या असुविधा पहुँचाना होता हैचाहे वह कितना भी हल्का क्यों न हो" के रूप में परिभाषित किया गया है। 
    • समिति के अनुसारइसमें अधिकतर बालकों को हाथ से या लाठीबेल्ट आदि जैसे उपकरणों से मारना (थप्पड़ मारनाघूंसे मारना) शामिल है। 
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसारशारीरिक दण्ड देना वैश्विक स्तर परघरों और स्कूलों दोनों मेंबहुत प्रचलित है। 
    • से 14 वर्ष की आयु के लगभग 60% बालक नियमित रूप से अपने माता-पिता या अन्य देखरेख करने वालों द्वारा शारीरिक दण्ड का शिकार होते हैं। 
  • भारत में बालकों को लक्षित करके दिये जाने वाले 'शारीरिक दण्डकी कोई सांविधिक परिभाषा नहीं है। 

शारीरिक दण्ड के प्रकार: 

  • राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) द्वारा परिभाषितशारीरिक दण्ड में कोई भी ऐसा कार्य शामिल है जिससे बालक को दर्दक्षति या असुविधा पहुँचाई जाती है। 
    • इसमें बालकों को असहज स्थितियों में खड़ा करना शामिल हैजैसे कि बेंच पर खड़ा करनाकुर्सी की तरह दीवार के सहारे खड़ा करनाया उनके सिर पर स्कूल बैग रखना। 
    • इसमें पैरों के बीच कान पकड़नाघुटने टेकनाजबरन नशीले पदार्थों का सेवन कराना और बलकों को स्कूल परिसर के भीतर बंद स्थानों में कैद करना जैसी प्रथाएं भी शामिल हैं। 
  • मानसिक उत्पीड़न सेतात्पर्य गैर-शारीरिक दुर्व्यवहार से है जो बालक की शैक्षणिक और मनोवैज्ञानिक भलाई को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है। 
    • इस प्रकार की सजा में व्यंग्यगाली-गलौजअपमानजनक भाषा का प्रयोग करते हुए डांटनाधमकाना और अपमानजनक टिप्पणियों का प्रयोग जैसे व्यवहार शामिल हैं। 
    • इसमें बालक का मजाक उड़ानाउसे नीचा दिखाना या उसे शर्मिंदा करना जैसी हरकतें भी शामिल हैंजिससे भावनात्मक तनाव और असहजता का माहौल बनता है।