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आपराधिक कानून

यालय किसी व्यक्ति को आरोप विरचित न किये गए अपराध के लिये दोषसिद्ध कब कर सकता है?

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 16-Sep-2026

पिंचेमालंगाकी बरेह बनाम मेघालय राज्य 

"यह तय करने के लिये कि क्या न्याय में कोई विफलता हुई हैयह परीक्षा करना सुसंगत होगा कि क्या अभियुक्त उस अपराध के मूल तत्त्वों से अवगत था जिसके लिये उसे दोषी ठहराया जा रहा है।" 

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया 

उच्चतम न्यायालय  

चर्चा में क्यों 

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारी की पीठ नेपिंचेमलंगकी बारेह बनाम मेघालय राज्य (2026) के मामलेमें यह अभिनिर्धारित किया कि लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन विचारण किए गए अभियुक्त को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 (भारतीय न्याय संहिता की धारा 64) के अंतर्गत बलात्संग के अपराध के लिये दोषसिद्ध किया जा सकता हैभले ही उक्त धारा के अंतर्गत कोई पृथक आरोप विरचित न किया गया होक्योंकि दोनों अपराधों में समान आपराधिक कृत्य (Actus Reus) निहित था और अभियुक्त को अपना बचाव प्रस्तुत करने का अवसर प्राप्त हुआ था। 

पिंचेमलंगकी बारेह बनाम मेघालय राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता को लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) की धारा 3/4 के अधीन प्रवेशन लैंगिक हमले के लिये दोषी ठहराया गया था। 
  • लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन अपीलकर्त्ता की दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रखा जा सका क्योंकि अभियोजन पक्ष किशोर न्याय अधिनियम की धारा 94 के अधीन पीड़ित की आयु का पता लगाने में असफल रहा।  
  • अपीलकर्त्ता ने इस आधार पर दोषमुक्त होने की मांग की कि पीड़िता का अवयस्क होना साबित नहीं हुआ थाऔर अलग से यह तर्क दिया कि उसे बलात्संग के लिये दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि उसके विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 के अधीन कोई आरोप विरचित नहीं किया गया थाऔर उसे उस आरोप पर अपनी प्रतिरक्षा करने का उचित अवसर नहीं दिया गया था। 
  • यह मामला अपील के जरिए उच्चतम न्यायालय तक पहुँचा 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 464 के अधीन बिना आरोप वाले अपराध के लिये दोषी ठहराने की शक्ति पर: 
    न्यायमूर्ति मिश्रा द्वारा लिखित एक निर्णय में न्यायालय ने कहा कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 464 के अधीनअपील या पुनरीक्षण न्यायालय किसी अभियुक्त को ऐसे अपराध के लिये दोषी ठहरा सकता है जिसके लिये कोई आरोप विरचित नहीं किया गया थाजब तक कि ऐसा करने से न्याय में विफलता न हो। 
  • न्याय की विफलता के परीक्षण पर: 
    न्यायालय ने माना कि न्याय की विफलता हुई है या नहींयह तय करने में यह परीक्षा करना सुसंगत है कि क्या अभियुक्त उस अपराध के मूल तत्त्वों से अवगत था जिसके लिये उसे दोषी ठहराया जा रहा हैक्या उसके विरुद्ध स्थापित किये जाने वाले मुख्य तथ्यों को उसे स्पष्ट रूप से समझाया गया थाऔर क्या उसे अपनी प्रतिरक्षा करने का उचित अवसर मिला था। 
  • बलात्संग और प्रवेशन लैंगिक हमले के सामान्य कृत्य के संबंध में: 
    न्यायालय ने माना कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 375 के अधीन बलात्संग के लिये कृत्य वही है जो लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा के अधीन प्रवेशन लैंगिक हमले के लिये हैएकमात्र अंतर पीड़िता की अवयस्कता हैऔर जहाँ बलात्संग का तथ्य स्पष्ट रूप से स्थापित हो चुका हैवहाँ बलात्संग का आरोप न लगाना अभियुक्त के हित में नहीं होगा। 
  • प्रवेशन लैंगिक हमले के साथ बलात्संग का समरूप अपराध होने के संबंध में: 
    न्यायालय ने माना कि चूँकि बलात्संग का अपराध प्रवेशन लैंगिक हमले के साथ समरूप हैइसलिये अभियुक्त को पहले अपराध के लिये दोषी ठहराने में कोई अंतर नहीं हैभले ही आरोप केवल दूसरे अपराध के लिये ही विरचित किये गए हों।     
  • अभियुक्त को अपनी प्रतिरक्षा करने का उचित अवसर दिये जाने के संबंध में: 
    न्यायालय ने माना कि जहाँ अभियुक्त को लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा के अधीन लगाए गए आरोप के विरुद्ध अपनी प्रतिरक्षा करने का अवसर दिया गया हैजो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 के अधीन अपराध के समान प्रकृति का हैवहाँ भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 के अधीन उसे दोषी ठहराने में न्याय का उल्लंघन नहीं होताभले ही औपचारिक आरोप न लगाया गया होयदि अभियोजन पक्ष पीड़ित के अवयस्क होने को साबित करने में असफल रहता है।   
  • दलबीर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2004) पर निर्भरता के संबंध में: 
    न्यायालय ने दलबीर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले का हवाला दियाजिसमें भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302, 498-क और 304-ख के अधीन विचारण चलाए गए एक अभियुक्त को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 के अधीन दोषी ठहराया गया थाजिस पर आरोप नहीं लगाया गया थाऔर दोहराया कि एक अपील या पुनरीक्षण न्यायालय किसी अभियुक्त को बिना आरोप वाले अपराध के लिये दोषी ठहरा सकता है यदि अभियुक्त को इसके मूल तत्वों की जानकारी थीउसके विरुद्ध मुख्य तथ्य स्पष्ट रूप से बताए गए थेऔर उसे अपनी प्रतिरक्षा करने का उचित अवसर दिया गया था। 
  • अपील शक्तियों के दायरे पर: 
    न्यायालय ने माना कि आवश्यक आरोप विरचित करने में विचारण न्यायालय की त्रुटि से अपील न्यायालय की शक्तियां सीमित नहीं होती हैंऔर ऐसी शक्तियां निष्कर्षों और दण्ड की प्रकृति और सीमा को बदलने के लिये पर्याप्त व्यापक हैंजिसमें कोई भी संशोधन या परिणामी आदेश देना शामिल है जो न्यायसंगत हो सकता है। 
  • उपरोक्त को ध्यान में रखते हुएअपील को आंशिक रूप से मंजूर कर लिया गयाजिसमें अपीलकर्त्ता की दोषसिद्धि को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 के अधीन संशोधित किया गयासाथ ही भारतीय दण्ड संहिता की धारा 506 के अधीन उसकी दोषसिद्धि और दण्ड को बरकरार रखा गया। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 510 क्या है? 

पृष्ठभूमि एवं उद्देश्य: 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 510, जो पूर्ववर्ती दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 464 के अनुरूप है और उसका स्थान लेती हैदोषसिद्धि और दण्ड को केवल आरोप विरचित करने में त्रुटिलोप या अनियमितता के कारण स्वतः अमान्य होने से बचाती है। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 510 के प्रमुख उपबंध: 

  • साधारण नियम (उपधारा 1):किसी सक्षम न्यायालय द्वारा पारित कोई भी निर्णयदंडादेश या आदेश केवल इसलिये अमान्य नहीं माना जाएगा कि कोई आरोप निर्धारित नहीं किया गया थाया आरोप में कोई त्रुटिलोप या अनियमितता (आरोपों का कुसंयोजन सहित) थीजब तक कि अपीलपुष्टिकरण या पुनरीक्षण न्यायालय की यह राय न हो कि वास्तव में न्याय में विफलता हुई है। 
  • न्याय में विफलता पाए जाने पर उपचारात्मक शक्तियां (उपधारा 2):जहाँ अपीलपुष्टि या पुनरीक्षण न्यायालय यह पाता है कि वास्तव में न्याय में विफलता हुई हैतो वह — 
    • यदि विफलता आरोप विरचित करने में लोप के कारण हुई होतो आरोप विरचित करने और आरोप विरचित होने के तुरंत बाद से विचारण को पुनः प्रारंभ करने का आदेश देनाया 
    • यदि विफलता आरोप में किसी त्रुटिलोप या अनियमितता के कारण हुई होतो वह किसी भी उपयुक्त तरीके से विरचित किये गए आरोप पर नए सिरे से विचारण का निदेश दे सकता है। 
  • परंतुक — अनिवार्य रूप से दोषसिद्धि रद्द करना:यदि न्यायालय यह पाता है कि साबित तथ्यों के आधार पर अभियुक्त के विरुद्ध कोई वैध आरोप नहीं बनता हैतो उसे पुनर्विचार का आदेश देने के बजाय दोषसिद्धि को रद्द करना होगा। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 510 और दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 464 के बीच तुलना: 

पहलू 

दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 464 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 510 

उपबंध संख्या 

धारा 464 

धारा 510 

न्याय की विफलता” की कसौटी 

आरोप के अभाव या आरोप में त्रुटि के कारण कोई निष्कर्षदंडादेश या आदेश केवल इस आधार पर अविधिमान्य नहीं होगाजब तक कि उसके परिणामस्वरूप न्याय की विफलता कारित न हुई हो। 

समान शब्दों में यथावत् रखा गया है। 

आरोप विरचित न किये जाने पर शक्ति 

न्यायालय आरोप विरचित किये जाने का आदेश दे सकता हैतत्पश्चात् विचारण उसी बिंदु से पुनः प्रारंभ होगा। 

समान रूप से यथावत् रखा गया है। 

आरोप में त्रुटि/अनियमितता होने पर शक्ति 

न्यायालय अपने विवेकानुसार विरचित आरोप के आधार पर नए विचारण का निदेश दे सकता है। 

समान रूप से यथावत् रखा गया है। 

दोषसिद्धि निरस्त करने संबंधी परंतुक 

यदि साबित किये गए तथ्यों के आधार पर कोई वैध आरोप विरचित नहीं किया जा सकतातो दोषसिद्धि निरस्त की जानी होगी।  

समान रूप से यथावत् रखा गया है। 

सारभूत परिवर्तन  

 

कोई नहींभारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के पुनर्संरचनात्मक क्रम में केवल उपबंध की संख्या बदली गई है तथा इसके पाठविस्तार या विधिक प्रभाव में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। 

पूर्व निर्णयों की निरंतर प्रयोज्यता 

सहजात/लघुतर ऐसे अपराधों के लिए दोषसिद्धि को नियंत्रित करता थाजिनके संबंध में आरोप विरचित नहीं किया गया था (उदाहरण के लियेदलबीर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य)। 

धारा 464 के अधीन दिये गए पूर्व निर्णय लागू होते रहेंगेजैसा कि पिंचेमलंगकी बारेह बनाम मेघालय राज्य (2026) में पुनः प्रतिपादित किया गया है।