9 मार्च से शुरू हो रहे हमारे ऑल-इन-वन ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स के साथ अपनी ज्यूडिशियरी की तैयारी को मजबूत बनाएं | यह कोर्स अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों माध्यमों में उपलब्ध है।   |   आज ही हमारे ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स में एडमिशन लें और अपनी तैयारी को और बेहतर बनाएँ | हिंदी माध्यम बैच: 9 मार्च, सुबह 8 बजे   |   आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   ज्यूडिशियरी की तैयारी अब हिंदी माध्यम में! दृष्टि ज्यूडिशियरी का नया बैच 22 जून 2026 से शुरू | आज ही एडमिशन लें | ऑनलाइन व ऑफलाइन दोनों मोड में उपलब्ध |   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से







होम / करेंट अफेयर्स

सांविधानिक विधि

एकपक्षीय अभिरक्षा आदेश को लागू करने के लिये बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पोषणीय नहीं है

    «
 07-Aug-2026

ओगिराला वेंकट साई सुनील मनोहर बनाम आंध्र प्रदेश राज्य एवं अन्य 

"प्रत्यर्थी संख्या का सही पता न देने के कारण ही वह आदेश प्राप्त किया गया थाजिसके परिणामस्वरूप प्रत्यर्थी संख्या की पीठ पीछे याचिकाकर्त्ता के पक्ष में अभिरक्षा का आदेश जारी किया गया।" 

न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहारी और न्यायमूर्ति सुभेंदु सामंत 

स्रोत: आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों?      

न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहारी और न्यायमूर्ति सुभेंदु सामंता की खंडपीठ नेओगिराला वेंकट साई सुनील मनोहर बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले में एक पिता की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को खारिज कर दियाजिसमें एकपक्षीय अभिरक्षा आदेश को लागू करने की मांग की गई थीयह मानते हुए कि इस प्रकार की याचिका का उपयोग माता  को नोटिस दिये बिना प्राप्त अभिरक्षा आदेश को लागू करने के लिये नहीं किया जा सकता है। 

ओगिराला वेंकट साई सुनील मनोहर बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?   

  • याचिकाकर्त्ता पिता ने कुटुंब न्यायालय द्वारा पारित एक आदेश के आधार पर अपने छह वर्षीय पुत्र की अभिरक्षा की मांग करते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कीजिसमें उसे संरक्षक नियुक्त किया गया था और माता को 60 दिनों के भीतर अभिरक्षा सौंपने का निदेश दिया गया था।                                                    
  • उन्होंने तर्क दिया कि एक बार कुटुंब न्यायालय द्वारा अभिरक्षा का आदेश पारित हो जाने के बादमाता की निरंतर अभिरक्षा अवैध हो गईजिससे उन्हें बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के माध्यम से अभिरक्षा की बहाली की मांग करने का अधिकार मिल गया। 
  • माता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्त्ता द्वारा जानबूझकर गलत पता देने के बाद एकपक्षीय अभिरक्षा का आदेश प्राप्त किया गया थाजिससे उसे कुटुंब न्यायालय की कार्यवाही में सूचना प्राप्त करने से वंचित कर दिया गया था। 
  • उन्होंने उच्च न्यायालय को सूचित किया कि एकपक्षीय अभिरक्षा आदेश को अपास्त करने के लिये आवेदनसाथ ही उन्हें दाखिल करने में हुए विलंब को माफ करने के लिये आवेदनपहले से ही कुटुंब न्यायालय के समक्ष लंबित हैं। 
  • उन्होंने आगे तर्क दिया कि संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 की धारा 43 अभिरक्षा आदेशों को लागू करने के लिये एक सांविधिक तंत्र प्रदान करती हैऔर इसलिये बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पोषणीय नहीं थी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं 

  • बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की वैधता पर:न्यायालय ने दोहराया कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका एक असाधारण और विवेकाधीन उपचार है और इसका उपयोग केवल अभिरक्षा आदेश को लागू करने के लिये नहीं किया जा सकता है। 
  • अभिरक्षा आदेश प्राप्त करने के तरीके के संबंध में:पीठ ने प्रथम दृष्टया पाया कि याचिकाकर्त्ता ने एकपक्षीय तलाक की डिक्री और अभिरक्षा आदेश दोनों को माता के पते के रूप में अपना पता प्रस्तुत करके प्राप्त किया था। यद्यपि याचिकाकर्त्ता ने स्वयं तलाक की कार्यवाही में यह दलील दी थी कि माता ने 2022 में वैवाहिक घर छोड़ दिया था और अपने माता-पिता के घर में रह रही थीउसने न तो अपने माता-पिता का पता बताया और न ही बेंगलुरु के उन पतों का प्रकटन किया जिनका उल्लेख उसने बाद में कुटुंब न्यायालय की कार्यवाही शुरू करते समय अपने विधिक नोटिस में किया था। 
  • अभिरक्षा आदेश की अंतिम वैधता पर:न्यायालय ने माना कि अभिरक्षा आदेश माता की पीठ पीछेउसे बिना सूचना दिये पारित किया गया था। चूँकि एकपक्षीय आदेश को अपास्त करने के लिये उसकी याचिकाएं लंबित थींइसलिये आदेश को अंतिम वैधता प्राप्त नहीं हुई थी और यह बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका जारी करने का आधार नहीं बन सकता था। 
  • सांविधिक उपचार की उपलब्धता के संबंध में:पीठ ने माना कि संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 की धारा 43 अवज्ञा के मामलों में अभिरक्षा आदेशों को लागू करने के लिये एक सांविधिक तंत्र प्रदान करती हैऔर इसलिये याचिकाकर्त्ता के इस तर्क को खारिज कर दिया कि बंदी प्रत्यक्षीकरण ही एकमात्र उपलब्ध उपचार था। पीठ ने आगे कहा कि जहाँ ऐसा सांविधिक उपचार मौजूद हैवहाँ रिट अधिकारिता को निष्पादन न्यायालय की अधिकारिता में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। 
  • प्रदान किये गए अनुतोष के संबंध में:यह मानते हुए कि एकपक्षीय और गैर-अंतिम आदेश के आधार पर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका जारी करने का अधिकार नहीं थाउच्च न्यायालय ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी। 

बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका क्या होती है? 

अर्थ और प्रकृति: 

  • हेबियस कॉर्पस (Habeas Corpus) एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है " आपके पास व्यक्ति का शरीर प्रस्तुत किया जाए"।  
  • यह एक विधिक उपचारात्मक प्रक्रिया हैजो किसी व्यक्ति के अवैध निरोध के विरुद्ध उपचार प्रदान करती है 
  • इसका मूल उद्देश्य किसी व्यक्ति को विधिविरुद्ध निरोध या कारावास से मुक्त कराना है। 
  • यह न्यायालय द्वारा जारी किया गया एक आदेश है जिसमें बंदी को न्यायालय के समक्ष पेश करने और यह जांचने का निदेश दिया जाता है कि गिरफ्तारी वैध थी या नहीं। 
  • यह रिट किसी व्यक्ति के स्वतंत्रता और व्यक्तिगत आजादी के अधिकार का निर्धारण करती है। 

सांविधानिक उपबंध : 

  • अनुच्छेद 32 के अधीन उच्चतम न्यायालय और अनुच्छेद 226 के अधीन उच्च न्यायालयों को रिट जारी करने का अधिकार है। 
  • अनुच्छेद 32 के अधीनउच्चतम न्यायालय मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिये रिट जारी करता है। 
  • अनुच्छेद 226 के अधीनउच्च न्यायालयों के पास विधिक और मौलिक अधिकारों के उल्लंघन दोनों के लिये रिट जारी करने की व्यापक अधिकारिता है। 
  • भारत की क्षेत्रीय सीमा के भीतर और बाहर स्थित सभी प्राधिकरणों पर उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता है। 
  • उच्च न्यायालय उन मामलों से निपटते हैं जब उस अधिकार पर उनका नियंत्रण होता है और वाद-हेतुक उनकी अधिकारिता के अंतर्गत आता है। 

कौन आवेदन कर सकता है: 

  • वह व्यक्ति जिसे अवैध रूप से निरुद्ध या अभिरक्षा में लिया गया हो। 
  • कोई भी व्यक्ति जो इस मामले के लाभ से अवगत हो। 
  • मामले के तथ्यों और परिस्थितियों से परिचित कोई भी व्यक्ति जो स्वेच्छया से अनुच्छेद 32 या 226 के अधीन आवेदन दाखिल करता है। 
  • जैसा कि शीला बारसे बनाम महाराष्ट्र राज्य (1983) में कहा गया हैयदि कोई निरुद्ध किया गया व्यक्ति आवेदन दाखिल नहीं कर सकता हैतो कोई अन्य व्यक्ति उसकी ओर से आवेदन दाखिल कर सकता है। 

कब याचिका खारिज हो जाती है: 

  • जब न्यायालय के पास बेदखली के मामले पर क्षेत्रीय अधिकारिता का अभाव हो। 
  • जब निरोध किसी सक्षम न्यायालय के आदेश से संबंधित हो। 
  • जब निरुद्ध किया गया व्यक्ति पहले ही छोड़ा जा चुका हो। 
  • जब दोषों को दूर करके कारावास को वैध ठहराया गया हो। 
  • जब कोई सक्षम न्यायालय गुण-दोष के आधार पर याचिका खारिज कर देता है। 

प्रकृति और दायरा: 

  • यह एक प्रक्रियात्मक रिट हैन कि एक सारभूत रिटजैसा कि कानू सान्याल बनाम जिला मजिस्ट्रेट दार्जिलिंग (1974) में कहा गया है। 
  • इस पद्धति में केवल शरीर को न्यायालय के समक्ष पेश करने के बजाय तथ्यों और परिस्थितियों की परीक्षा करके निरोध की वैधता पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। 
  • यह रिट याचिका न केवल सदोष परिरोध में रखने के लिये अपितु निरोध में लेने वाले अधिकारी द्वारा दुर्व्यवहार और विभेद से सुरक्षा के लिये भी दायर की जा सकती हैजैसा कि सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन (1980) में कहा गया है। 
  • पूर्व-न्याय का सिद्धांत अवैध परिरोध के मामलों पर लागू नहीं होतानए आधारों के साथ क्रमिक याचिकाएं दायर की जा सकती हैं। 

सबूत का भार: 

  • निरोध में लेने वाले व्यक्ति या प्राधिकरण पर यह साबित करने का भार होता है कि निरोध विधिक आधार पर किया गया था 
  • यदि निरुद्ध व्यक्ति यह आरोप लगाता है कि उसे दुर्भावनापूर्ण तरीके से तथा संबंधित प्राधिकारी की अधिकारिता से बाहर निरुद्ध किया गया हैतो ऐसी स्थिति में साक्ष्य का भार निरुद्ध व्यक्ति पर स्थानांतरित हो जाता है