9 मार्च से शुरू हो रहे हमारे ऑल-इन-वन ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स के साथ अपनी ज्यूडिशियरी की तैयारी को मजबूत बनाएं | यह कोर्स अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों माध्यमों में उपलब्ध है।   |   आज ही हमारे ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स में एडमिशन लें और अपनी तैयारी को और बेहतर बनाएँ | हिंदी माध्यम बैच: 9 मार्च, सुबह 8 बजे   |   आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   ज्यूडिशियरी की तैयारी अब हिंदी माध्यम में! दृष्टि ज्यूडिशियरी का नया बैच 22 जून 2026 से शुरू | आज ही एडमिशन लें | ऑनलाइन व ऑफलाइन दोनों मोड में उपलब्ध |   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से







होम / करेंट अफेयर्स

सिविल कानून

सिविल न्यायालय धारा 151 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन कूटरचना संबंधी परिवाद अग्रेषित करने का निदेश दे सकता है

    «    »
 21-Sep-2026

हिम्मत सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य 

"ऐसा कोई अभिव्यक्त या विवक्षित निषेध नहीं है जो किसी सिविल न्यायालय को कूटरचना के गंभीर अपराध के आरोप के मामले में किसी पक्षकार या साक्षी को पुलिस को परिवाद भेजने का निदेश जारी करने से रोकता हो।" 

न्यायमूर्ति गजेंद्र सिंह 

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति गजेंद्र सिंह की पीठ नेहिम्मत सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2026) के मामलेमें यह अभिनिर्धारित किया कि सिविल न्यायालय के पास सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 151 के अधीन अंतर्निहित शक्ति है कि वह कूटरचना के गंभीर आरोपों से जुड़े मामलों में किसी पक्षकार या साक्षी को प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने के लिये पुलिस को परिवाद भेजने का निदेश दे। 

हिम्मत सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह विवाद कृषि भूमि से संबंधित पारिवारिक मामले से उत्पन्न हुआ, जिसमें याचिकाकर्त्ता और प्रत्यर्थी भाई-बहन हैं। 
  • प्रत्यर्थी 2 और 3 (बहनें) ने द्वितीय सिविल न्यायाधीश, सीनियर डिवीजन, धरमपुरी के समक्ष स्वामित्व की घोषणा की मांग करते हुए एक सिविल वाद दायर किया। 
  • कार्यवाही के दौरान, भाइयों (याचिकाकर्त्ता 1 और 2) ने एक वसीयत पर विश्वास किया, जिसे कथित तौर पर उनके पिता ने याचिकाकर्त्ता 2 के पक्ष में निष्पादित किया था, और कहा जाता है कि यह याचिकाकर्त्ता 3 और 4 की उपस्थिति में बनाई गई थी। 
  • 28 जुलाई को दिये गए अपने निर्णय में, सिविल जज ने पाया कि सिविल वाद दायर होने के बाद वसीयत को कूटरचित बनाया गया था और याचिकाकर्त्ताओं और अन्य संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध FIR दर्ज करने का निदेश दिया। 
  • तदनुसार धरमपुरी पुलिस थाने में भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 61 (आपराधिक षड्यंत्र), 336 (छल के लिये कूटरचना), 338 (मूल्यवान प्रतिभूति या वसीयत की कूटरचना) और 340 (कूटरचित दस्तावेज को असली के रूप में उपयोग करना) के अधीन FIR दर्ज की गई। 
  • याचिकाकर्त्ताओं ने FIR को रद्द करने की मांग करते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

सिविल न्यायालय की FIR दर्ज करने का निदेश देने की अंतर्निहित शक्ति पर: 

  • न्यायालय ने माना कि यद्यपि सिविल प्रक्रिया संहिता में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है जो किसी सिविल न्यायालय को किसी पक्षकार या साक्षी को पुलिस परिवाद दर्ज कराने का निदेश देने का अधिकार देता हो, फिर भी ऐसे निदेश के विरुद्ध कोई अभिव्यक्त या विवक्षित रोक भी नहीं है, और यह शक्ति सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 151 के अधीन न्यायालय की अंतर्निहित अधिकारिता से प्राप्त होती है। 

इस प्रकार की शक्ति को मान्यता देने के औचित्य पर: 

  • न्यायालय ने पाया कि कूटरचना के मामलों में अभियुक्त प्राय इस आधार पर FIR को रद्द करने के लिये उच्च न्यायालय का रुख करते हैं कि विवाद मूल रूप से सिविल मामला है, जिससे कभी-कभी अपराधियों को "विधि के शिकंजे" से बचने का अवसर मिल जाता है। 
  • इसने इसका कारण सिविल न्यायालयों की कूटरचना के मामलों को दर्ज करने या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 379 (जो दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 340 के अनुरूप है) के अधीन कार्यवाही शुरू करने में अनिच्छा को बताया और स्पष्ट किया कि इस शक्ति को मान्यता देने से गलत काम करने वालों को उचित निवारक संदेश मिलेगा। 

मनोहर लाल चोपड़ा बनाम राय बहादुर राव राजा सेठ हीरालाल (1962) पर निर्भरता पर: 

  • न्यायालय ने संविधान पीठ के उस निर्णय पर विश्वास किया जिसमें यह पुष्टि की गई थी कि धारा 151 सिविल न्यायालय के अधीन न्यायोचित कार्य के लियेआदेश देने की न्यायालय का अंतर्निहित अधिकार निर्विवाद है, तथापि उस अधिकार का प्रयोग संहिता के प्रावधानों को अकृत करने के लिये नहीं किया जा सकता है। 
  • चूँकि संहिता स्वयं अंतर्निहित शक्ति के अस्तित्व को मान्यता देती है, इसलिये इसकी सीमाओं से परे प्रतिबंधों को लागू करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता, और धारा 151 के अधीन परिकल्पित "न्याय के उद्देश्य" विफल हो जाएंगे यदि कूटरचना का पता लगाने के लिये ऐसी शक्ति का प्रयोग नहीं किया जा सकता है।  

क्या न्यायालय दस्तावेज़ की कूटरचना अनिवार्य रूप से धारा 340 दण्ड प्रक्रिया संहिता/379 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की प्रक्रिया को आकर्षित करती है: 

  • सचिंद नंद सिंह बनाम बिहार राज्य (1998) के मामलेमें उच्चतम न्यायालय के निर्णय का हवाला देते हुए, न्यायालय ने दोहराया कि धारा 195(1)()(ii) दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन वर्जन- जिसके अनुसार न्याय प्रशासन को प्रभावित करने वाले कूटरचना संबंधी अपराधों का संज्ञान लेने से पहले संबंधित न्यायालय द्वारा लिखित परिवाद की आवश्यकता होती है उस स्थिति में लागू नहीं होता, जहाँ कूटरचना दस्तावेज़ को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किये जाने या साक्ष्य के रूप में दिये जाने से पूर्व की गई हो 

न्यायालय परिसर के बाहर कूटरचना किये जाने के संबंध में: 

  • न्यायालय ने माना कि अध्याय 26 के उपबंध उन अपराधों पर लागू होते हैं जो न्याय प्रशासन को प्रभावित करते हैं जबकि कोई दस्तावेज़ न्यायालय के अभिलेखों का भाग होता है, और यह कि दाखिल करने से काफी पहले, न्यायालय परिसर के बाहर किया गया कूटरचना का कृत्य केवल इसलिये संरक्षण प्राप्त नहीं करता है क्योंकि दस्तावेज़ बाद में न्यायालय के अभिलेख में अभिलिखित हो गया।  
  • चूँकि वसीयत न्यायालय के बाहर और साक्ष्य के रूप में पेश किये जाने से पहले ही कूटरचित बनाई गई थी, इसलिये धारा 340(1) दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन किसी प्रारंभिक जांच की आवश्यकता नहीं थी, और पुलिस को मामला दर्ज करने में कोई बाधा नहीं थी। 

तदनुसार, न्यायालय ने FIR को रद्द करने से इंकार कर दिया और याचिका खारिज कर दी। 

सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 151 क्या है? 

बारे में: 

  • सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 151 न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों से संबंधित है। 
  • इसमें प्रक्रियात्मक नियमों से उत्पन्न कठिनाइयों को दूर करने के लिये न्यायालय की शक्ति से संबंधित प्रावधान शामिल हैं। 
  • जब संहिता के अधीन कोई स्पष्ट उपबंध न हो, तब न्यायालय द्वारा इस शक्ति का प्रयोग किया जाएगा। 

प्रावधान: 

सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 151 न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों के संरक्षण का उपबंध करती है: 

इस संहिता में ऐसा कुछ भी नहीं है जो न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति को सीमित करता हो या उस पर किसी भी प्रकार से प्रभाव डालता हो, जिसके अधीन वह न्याय के प्रयोजनों के लिये या न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिये आवश्यक आदेश दे सकता है। 

सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 151 की प्रयोज्यता:  

  • न्यायालय को निष्पक्षता, न्याय और सद्भावना प्रदान करने के लिये अपनी अंतर्निहित शक्ति का प्रयोग करना चाहिये 
  • जब कोई वैकल्पिक उपचार उपलब्ध न हो, तो न्यायालय धारा 151 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन निहित शक्ति का प्रयोग कर सकता है। 
  • यह धारा पक्षकारों को कोई ठोस अधिकार प्रदान नहीं करती है, अपितु न्याय प्रक्रिया के दौरान उत्पन्न होने वाली प्रक्रियात्मक असमानताओं को दूर करने में सहायता करती है। 

अंतर्निहित शक्तियों की प्रकृति: 

  • धारा 151 के अंतर्गत अंतर्निहित शक्तियां अवशिष्ट प्रकृति की हैं - वे न तो संहिता द्वारा प्रदत्त हैं और न ही सीमित की गई हैं, अपितु न्यायालय के रूप में अपने अस्तित्व के कारण ही न्यायालय में निहित हैं। 
  • ये शक्तियां संहिता के विशिष्ट प्रावधानों के पूरक हैं और इनका उपयोग किसी भी स्पष्ट सांविधिक प्रावधान को रद्द करने या उससे बचने के लिये नहीं किया जा सकता है। 
  • वे केवल संहिता की कमियों और अंतरालों में ही काम करते हैं, उन स्थितियों को संबोधित करते हैं जिनकी संविधान निर्माताओं ने विशेष रूप से कल्पना नहीं की थी।