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सांविधानिक विधि
उच्चतम न्यायालय ने करोड़ों रुपए की न्यायालयीन जमा राशि की सुरक्षा के लिये विधि बनाने का आह्वान किया
«21-Sep-2026
स्रोत: द हिंदू
परिचय
उच्चतम न्यायालय की एक पीठ ने कहा है कि देश भर के न्यायालयों और अधिकरणों में अपीलों के लंबित रहने के दौरान वादियों द्वारा जमा किये गए करोड़ों रुपए की सुरक्षा के लिये एक विधि आवश्यक है। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और आलोक आराधे की पीठ ने लंबित वादों के दौरान जमा की गई धनराशि के प्रबंधन को मानकीकृत करने के लिये राष्ट्रव्यापी विधायी सुधार की मांग की, और कहा कि वादियों की धनराशि को तदर्थ प्रबंधन से बचाया जाना चाहिये।
न्यायालय द्वारा किस समस्या की पहचान की गई है?
- न्यायालय ने न्यायालय द्वारा आदेशित जमा राशि को नियंत्रित करने वाले एकसमान नियमों के अभाव की ओर इशारा किया - उदाहरण के लिये, जहाँ एक न्यायालय किसी मुकदमेबाज को अपील की सुनवाई के दौरान रोक प्राप्त करने के लिये धन जमा करने का निदेश देता है।
- अब तक, अलग-अलग न्यायालयों और अधिकरणों ने अपीलों के लंबित रहने के दौरान जमा राशि और उनके निवेश पर मामले-दर-मामले के आधार पर आदेश पारित किये हैं।
- इसके चलते बड़ी मात्रा में धनराशि विभिन्न बैंकों के वित्तीय साधनों में फंसी रह गई है, जिस पर ब्याज दरें अनियमित हैं और ऐसे जमाओं के ब्याज लेखांकन को लेकर निर्णय के बाद मुकदमेबाजी शुरू हो गई है।
- पीठ ने पाया कि मुद्रास्फीति और आर्थिक अनिश्चितताओं का दबाव जमा पर ब्याज दरों को लेकर चिंताओं को और बढ़ा देता है।
न्यायालय ने एकसमान ढाँचा अपनाने की मांग क्यों की?
- पीठ ने यह टिप्पणी की कि किसी भी जमा राशि की आर्थिक अखंडता को बनाए रखने और ब्याज प्रदान करने के लिये, जमा राशि को संभालने की विधि और तरीके में स्पष्टता और एकरूपता होनी चाहिये, और मानकीकरण की कमी पैसे के समय मूल्य के सिद्धांत और एक निश्चित और स्पष्ट तरीके से ब्याज के संचय को कमजोर करती है।
- न्यायालय ने आगे बताया कि वादियों द्वारा जमा की गई धनराशि के साथ व्यवहार में विषमता के कारण न्यायालयों में मामलों की संख्या और बढ़ रही है, क्योंकि सामान्य मानकों और सुसंगत सिद्धांतों की कमी के परिणामस्वरूप निवेश, नवीनीकरण, राशि, लेखांकन और जमा पर ब्याज से संबंधित नियमित प्रश्नों का बार-बार निर्धारण करना पड़ता है - जिससे न्यायालयों और अधिकरणों पर भार बढ़ जाता है।
न्यायालय द्वारा सुझाया गया अमेरिकी मॉडल क्या है?
- न्यायालय ने एक साझा मंच बनाने के अमेरिकी मॉडल का सुझाव दिया, जहाँ न्यायालयों और अधिकरणों में जमा की गई धनराशि को एक एकीकृत योजना में एकत्रित किया जाता है और मुकदमेबाजी करने वाले पक्षकारों के लिये सबसे लाभकारी वित्तीय साधन में निवेश किया जाता है।
- पीठ ने टिप्पणी की कि इस प्रकार का एक साझा मंच न केवल ब्याज दरों में निश्चितता उत्पन्न करेगा और मुकदमेबाजों के लिये पहुँच में आसानी बढ़ाएगा, अपितु जमा किये गए धन को कैसे निवेश किया जाए और उससे कैसे निपटा जाए, इस संबंध में न्यायालयों और अधिकरणों पर पड़ने वाले भार को भी कम करेगा।
- उच्चतम न्यायालय ने अंतरराष्ट्रीय पूर्व निर्णयों पर आधारित एक सांविधिक ढाँचे की सिफारिश की, विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका की कोर्ट रजिस्ट्री इन्वेस्टमेंट सिस्टम की ओर इशारा करते हुए।
न्यायालय ने क्या निदेश जारी किये?
- न्यायालय ने कहा कि इस विषय पर उपयुक्त विधि विकसित करना और बनाना आवश्यक है और उसने भारत के विधि आयोग से उठाए गए विवाद्यकों की परीक्षा करने का अनुरोध किया, और इस प्रक्रिया में, अन्य देशों द्वारा बनाई गई विधियों पर भी विचार करने को कहा।
- इसमें यह पाया गया कि विधि आयोग के लिये भारतीय रिजर्व बैंक, वित्त मंत्रालय और नोडल विधि एवं न्याय मंत्रालय से परामर्श करना आवश्यक हो सकता है।
- पीठ ने निदेश दिया कि निर्णय की एक प्रति विधि आयोग के अध्यक्ष, RBI गवर्नर और वित्त एवं विधि एवं न्याय मंत्रालयों के सचिवों को भेजी जाए।
निष्कर्ष
उच्चतम न्यायालय की टिप्पणियों से भारत की सिविल प्रक्रिया प्रणाली में लंबे समय से चली आ रही एक खामी उजागर होती है— लंबित अपीलों के दौरान न्यायालयों और अधिकरणों द्वारा रखे गए वादियों के धन के प्रबंधन के लिये एकसमान नियमों का अभाव। तदर्थ प्रबंधन, ब्याज दरों में असंगति और लंबित मामलों की बढ़ती संख्या के जोखिमों को रेखांकित करते हुए और अमेरिकी न्यायालय रजिस्ट्री निवेश प्रणाली को एक संभावित मॉडल के रूप में सुझाते हुए, न्यायालय ने भारतीय विधि आयोग पर RBI और वित्त एवं विधि एवं न्याय मंत्रालयों के परामर्श से इस विवाद्यक की परीक्षा करने का दायित्व डाला है, जिससे न्यायालयी धन की आर्थिक अखंडता की रक्षा के लिये एक संभावित सांविधिक ढाँचा तैयार करने का मार्ग प्रशस्त हो सके।