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सिविल कानून

पूर्व-न्याय (Res Judicata) के सिद्धांत के कारण पश्चातवर्ती पक्षकार बनाए जाने का आवेदन वर्जित है

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 03-Aug-2026

संजीव कुमार बनाम शकुंतला देवी और अन्य 

"विभिन्न सिविल प्रक्रिया संहिता प्रावधानों के अधीन दायर किये गए पश्चातवर्ती पक्षकार बनाए जाने आवेदनों पर पूर्व-न्याय लागू होता है।" 

न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और संजय करोल 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ नेसंजीव कुमार बनाम शकुंतला देवी और अन्य (2026) के मामलेमें यह निर्णय दिया गया कि सिविल प्रक्रिया संहिता के किसी ऐसे उपबंध के अधीन दायर किया गया कोई भी पश्चातवर्ती पक्षकार बनाए जाने का आवेदनजो पहले लागू किये गए प्रावधान से भिन्न होपूर्व-न्याय द्वारा वर्जित हैयदि पहले आवेदन पर पहले ही गुण-दोष के आधार पर विनिश्चय किया जा चुका हैभले ही वह पहले का निर्णय तथ्यों की गलत समझ पर आधारित हो। 

संजीव कुमार बनाम शकुंतला देवी और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

यह विवाद पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के उस निर्णय से उत्पन्न हुआ जिसमें प्रत्यर्थियों द्वारा आदेश 22 नियम 10 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन दायर की गई पश्चातवर्ती पक्षकार बनाए जाने की याचिका को स्वीकार करते हुए उन्हें लंबित द्वितीय अपील में रिकॉर्ड पर लाया गया था। 

  • यह घटना तब हुई जब इससे पहले इन्हीं प्रत्यर्थियों द्वारा सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम 10 के अधीन पक्षकार बनने की मांग करते हुए दायर किया गया एक आवेदन गुण-दोष के आधार पर खारिज कर दिया गया था। 
  • उच्च न्यायालय ने यह राय व्यक्त की कि चूँकि पहले की अस्वीकृति तथ्यों के गलत आकलन पर आधारित थीइसलिये एक अलग प्रावधान के अधीन पश्चातवर्ती  आवेदन पूर्व-न्याय के दायरे से बाहर नहीं होगा। 
  • उच्चतम न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या पूर्व-न्याय का सिद्धांत किसी पश्चातवर्ती आवेदन को रोकने के लिये लागू होता हैजहाँ पहले का निर्णययद्यपि गुण-दोष के आधार पर दिया गया थातथ्यों के गलत दृष्टिकोण पर आधारित था। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • तथ्यात्मक त्रुटि के होते हुए भी पूर्व-न्याय की प्रयोज्यता पर:न्यायालय ने माना कि एक बार आदेश नियम 10 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन पहले के आवेदन पर गुण-दोष के आधार पर निर्णय लिया जा चुका हैतो निष्कर्ष पक्षकारों पर बाध्यकारी होंगेभले ही वह निर्णय तथ्यों की गलत समझ पर आधारित हो। 
  • गलत आदेश के लिये उचित उपचार के संबंध में:न्यायालय ने टिप्पणी की कि यदि प्रत्यर्थियों का मानना ​​है कि पहले की अस्वीकृति तथ्यात्मक रूप से गलत थीतो उचित तरीका उस आदेश के विरुद्ध विधिक उपचारों का सहारा लेना थान कि उसी अनुतोष की मांग करते हुए किसी अन्य प्रावधान के अधीन एक नया आवेदन दाखिल करना। 
  • पश्चातवर्ती आवेदन की प्रकृति पर:न्यायालय ने पश्चातवर्ती आदेश 22 नियम 10 सिविल प्रक्रिया संहिता आवेदन को पक्षकारों के बीच पहले से ही तय किये गए विवाद्यक का एक अग्राह्य पुन: विवाद्यक उठाना बतायाजिसे केवल एक अलग सांविधिक प्रावधान के माध्यम से उठाया गया था।  
  • अंतिम परिणाम पर:न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश को अपास्त कर दिया और यह माना कि प्रत्यर्थियों का पक्षकार बनने का आवेदन पूर्व-न्याय के अधीन वर्जित था। 

पूर्व-न्याय (Res Judicata) क्या है? 

अर्थ: 

  • "Res" का अर्थ है विषयवस्तु, "judicata" का अर्थ है निर्णीत — दोनों मिलकरएक ऐसा मामला जिसका निर्णय पहले ही हो चुका है। इसेसिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 11 के अंतर्गत संहिताबद्ध किया गया है।  

मूल सिद्धांत: 

  • एक बार किसी सक्षम न्यायालय द्वारा किसी मामले पर अंतिम निर्णय हो जाने के पश्चातकोई भी पक्षकार पश्चातवर्ती वाद में उस मामले को दोबारा नहीं उठा सकता। 
  • इससे मुकदमों की बहुलता को रोका जा सकता है और पक्षकारों को एक ही मामले में दो बार परेशान होने से बचाया जा सकता है। 

अंतर्निहित सूक्ति : 

  • Nemo debet bis vexari pro una et eadem causa- किसी को भी एक ही कारण से दो बार परेशान नहीं किया जाना चाहिये।  
  • Interest reipublicae ut sit finis litium- यह राज्य के हित में है कि मुकदमेबाजी समाप्त होनी चाहिये 
  • Res judicata pro veritate occipitur – न्यायिक निर्णय को सही माना जाना चाहिये 

आवश्यक तत्त्व: 

  • विवादित विषय प्रत्यक्षत: और सारतः पूर्ववर्ती वाद के समान होना चाहिये 
  • वही पक्ष (या उनके माध्यम से दावा करने वाले पक्षकार)। 
  • दोनों वादों में हक एक ही होना चाहिये 
  • पूर्ववर्ती न्यायालय के पास बाद के मामले का विचारण करने की पर्याप्त अधिकारिता होनी चाहिये 
  • मामले की सुनवाई हो चुकी होगी और अंततः निर्णय भी हो चुका होना चाहिये 

विस्तार: 

  • यह न केवल सिविल वादों पर लागू होता है अपितु निष्पादन कार्यवाहीकराधान मामलोंऔद्योगिक न्यायनिर्णयप्रशासनिक आदेशों और अंतरिम आदेशों पर भी लागू होता है। 
  • धारा 11 इस सिद्धांत का संपूर्ण विवरण नहीं है। 

स्पष्टीकरण 1 – "पूर्ववर्ती वाद": 

  • पहले से विनिश्चित किया गया वाद "पूर्ववर्ती वाद" कहलाता हैचाहे वह कभी भी दायर किया गया हो। 
  • महत्त्वपूर्ण निर्णय की तिथि हैन कि संस्थित की गई तिथि। 

व्याख्या 4  – आन्वयिक पूर्व-न्याय  

  • इसमें न केवल उन विवाद्यकों को वर्जित किया गया है जिन पर वास्तव में विनिश्चय किया जा चुका हैअपितु उन विवाद्यकों को भी वर्जित किया जाता है जिन्हें पूर्ववर्ती वाद में उठाया जा सकता था और उठाया जाना चाहिये थालेकिन नहीं उठाया गया। 
  • यह उसी लोकनीति के तर्क पर आधारित है जिस पर पूर्व-न्याय स्वयं आधारित है। 

व्याख्या 6 – प्रतिनिधि वाद: 

  • जहाँ किसी साझा निजी/सार्वजनिक अधिकार के लिये सद्भावनापूर्वक वाद दायर किया जाता हैवहाँ निर्णय उस अधिकार में हित रखने वाले सभी व्यक्तियों पर बाध्यकारी होता है। 
  • शर्तें: स्वयं और अज्ञात अन्य व्यक्तियों के लिये संयुक्त रूप से दावा किया गया अधिकारसभी संबंधित पक्षकारों की ओर से सद्भावनापूर्वक चलाया गया वादयदि आदेश नियम सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन दायर किया गया हैतो इसकी आवश्यकताओं का कठोरता से पालन किया जाना चाहिये 

अपवाद: 

  • बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका। 
  • कपट या मिलीभगत से प्राप्त निर्णय। 
  • पर्याप्त नए साक्ष्य जो पहले सम्यक सतर्कता के होते हुए भि नहीं मिल सकते थे। 
  • मूल न्यायालय के पास उचित अधिकारिता नहीं थी