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सिविल कानून
न्यायाधीशों के वेतन संबंधी विवरण सूचना का अधिकार अधिनियम से छूट प्राप्त नहीं हैं
«01-Aug-2026
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मद्रास उच्च न्यायालय बनाम तमिलनाडु सूचना आयोग एवं अन्य “लोक निधि से प्रदत्त वेतन का विवरण नागरिकों से गोपनीय रखकर प्रकटीकरण से वंचित नहीं किया जा सकता” न्यायमूर्ति एम. धंदापानी |
स्रोत: मद्रास उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एम. धंदापानी ने मद्रास उच्च न्यायालय बनाम तमिलनाडु सूचना आयोग और अन्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि न्यायाधीशों के वेतनमान/वेतन से संबंधित विवरण सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8 के अंतर्गत छूट प्राप्त नहीं हैं, क्योंकि ऐसा वेतन भारत की संचित निधि से दिया जाता है और इस प्रकार यह लोक अभिलेख का विषय है।
इस मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- आवेदक अकबर अहमद ने मद्रास उच्च न्यायालय (स्वयं उपस्थित पक्ष द्वारा कार्यवाही का संचालन) नियम, 2019 के संबंध में जानकारी प्राप्त करने के लिये एक RTI आवेदन दायर किया।
- मांगी गई जानकारी में पार्टी-इन-पर्सन कमेटी के सदस्यों के नाम और पदनाम, उनका विधिक अनुभव, उपलब्धियां, योग्यताएं, विशेषज्ञता, आचरण संबंधी विवरण, वेतनमान/वेतन विवरण और उच्च न्यायालय की प्रशासनिक समिति के कार्य, उत्तरदायित्व और शक्तियां शामिल थीं।
- उच्च न्यायालय के लोक सूचना अधिकारी (PIO) ने सूचना देने से इंकार कर दिया, और अपीलीय प्राधिकरण ने इस इंकार को बरकरार रखा।
- आवेदक ने तमिलनाडु राज्य सूचना आयोग के समक्ष द्वितीय अपील दायर की, जिसने उच्च न्यायालय को मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने का निदेश दिया।
- मद्रास उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल ने राज्य सूचना आयोग के इस आदेश को स्वयं उच्च न्यायालय में चुनौती दी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- रजिस्ट्री के तर्क पर: रजिस्ट्री ने तर्क दिया कि सूचना आंतरिक प्रशासन से संबंधित थी और सूचना अधिकार अधिनियम की धारा 8 के अधीन छूट प्राप्त थी, इसके लिये उसने रजिस्ट्रार जनरल, मद्रास उच्च न्यायालय बनाम के. एलंगो (उच्चतम न्यायालय द्वारा समर्थित) मामले का हवाला दिया, जिसमें सतर्कता जांच के विवरण और कर्तव्यों के निर्वहन से असंबंधित व्यक्तिगत जानकारी को छूट दी गई थी।
- न्यायाधीशों के वेतन विवरण के संबंध में: न्यायालय ने माना कि चूँकि न्यायाधीशों को भारत की संचित निधि से वेतन मिलता है और यह संदाय लोक निधि से किया जाता है, इसलिये किसी नागरिक को वेतन/वेतनमान के विवरण जानने से रोका नहीं जा सकता है और इस जानकारी को प्रस्तुत करने पर सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा 8 के अधीन कोई प्रतिबंध नहीं है।
- स्वयं उपस्थित पक्षकारों की समिति के विवरण के संबंध में: न्यायालय ने पाया कि समिति का गठन और उसकी संरचना एक प्रशासनिक कार्य था, न कि गोपनीय जानकारी, और इसका प्रकटीकरण उच्च न्यायालय के प्रशासनिक कामकाज को खतरे में नहीं डालेगा।
- गोपनीयता और संवेदनशीलता के संबंध में: न्यायालय ने पाया कि मांगी गई जानकारी में गोपनीयता या संवेदनशीलता का कोई तत्त्व नहीं था, क्योंकि ऐसी समितियों के कामकाज को उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णयों के माध्यम से पहले ही संबोधित किया जा चुका था।
- अंतिम निर्देश पर: न्यायालय ने उच्च न्यायालय रजिस्ट्री के अभिवचन को खारिज कर दिया, याचिका का निपटारा किया और रजिस्ट्री को दो सप्ताह के भीतर जानकारी उपलब्ध कराने का निदेश दिया।
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8 क्या है?
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8 – सूचना के प्रकट किये जाने से छूट:
धारा 8(1) – प्रकटीकरण से छूट प्राप्त श्रेणियाँ
इस अधिनियम में किसी भी बात के होते हुए भी, किसी भी नागरिक को निम्नलिखित जानकारी देने की कोई बाध्यता नहीं है:
- (क) ऐसी सूचना जिसका प्रकटन भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य के सुरक्षा, रणनीतिक, वैज्ञानिक या आर्थिक हित, विदेशी राज्यों के साथ संबंधों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करेगा, या किसी अपराध को उद्दीपन का कारण बनेगा।
- (ख) ऐसी जानकारी जिसे किसी न्यायालय या अधिकरण द्वारा प्रकाशित करना स्पष्ट रूप से निषिद्ध हो, या जिसका प्रकटन न्यायालय की अवमानना माना जा सकता हो।
- (ग) ऐसी सूचना, जिसका प्रकटन संसद या राज्य विधानमंडल के विशेषाधिकार का उल्लंघन करेगा।
- (घ) वाणिज्यिक विश्वास, व्यापार गोपनीयता या बौद्धिक संपदा सहित ऐसी जानकारी, जिसका प्रकटन किसी पर व्यक्ति की प्रतियोगी स्थिति को नुकसान पहुँचाएगी, जब तक कि सक्षम प्राधिकारी संतुष्ट न हो कि व्यापक जनहित में इसका प्रकटन करना उचित है।
- (ङ) किसी व्यक्ति को उसके विश्वासपूर्ण संबंध में उपलब्ध जानकारी, जब तक कि सक्षम प्राधिकारी संतुष्ट न हो कि व्यापक जनहित प्रकटीकरण को उचित ठहराता है।
- (च) किसी विदेशी सरकार से गोपनीय रूप से प्राप्त जानकारी।
- (छ) ऐसी जानकारी, जिसका प्रकटन किसी व्यक्ति के जीवन या शारीरिक सुरक्षा को खतरे में डाल सकता है, या विधि प्रवर्तन या सुरक्षा प्रयोजनों के लिये गोपनीय रूप से दी गई जानकारी या सहायता के स्रोत की पहचान कर सकता है।
- (ज) ऐसी जानकारी जो अपराधियों के अन्वेषण, पकड़े या अभियोजन की प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न करे।
- (झ) मंत्रिमंडल के कागजात जिनमें मंत्रिपरिषद, सचिवों और अन्य अधिकारियों के विचार-विमर्श के अभिलेख शामिल हैं।
- परंतु 1: मंत्रिपरिषद के विनिश्चय, उनके कारण और वे सामग्रियां जिनके आधार पर विनिश्चय लिये गए थे, विनिश्चय किये जाने और विषय के पूरा या समाप्त होने के पश्चात जनता को उपलब्ध कराएं जाएंगे।
- परंतु 2: इस धारा में विनिर्दिष्ट छूटों के अंतर्गत आने वाले विषयों का प्रकटन नहीं किया जाएगा।
- (ञ) ऐसी जानकारी जो व्यक्तिगत सूचना से संबंधित है, जिसका प्रकटन किसी लोक क्रियाकलाप या हित से संबंधित नहीं है, या जिससे व्यक्ति की निजता का अनुचित उल्लंघन होगा, जब तक कि केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी/राज्य लोक सूचना अधिकारी/अपील प्राधिकारी का यह समाधान नहीं हो जाता कि व्यापक लोक हित में प्रकटन न्यायोचित है।
- परंतु: ऐसी सूचना के लिये, जिसको यथास्थिति, संसद या किसी राज्य विधानमंडल को देने से इंकार नहीं किया जा सकता, किसी भी व्यक्ति को इंकार नहीं किया जा सकेगा।
धारा 8(2) – सर्वोपरि लोक हित
- शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923 या उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञेय किसी छूट में किसी बाते होते हुए भी, किसी लोक प्रधिकारी को सूचना तक पहुँच अनुज्ञात की जा सकेगी, यदि सूचनके प्रकटन में लोक हित संरक्षित हितों को होने वाले नुकसान से अधिक हो।
धारा 8(3) – बीस वर्षीय नियम
- उपधारा (1) के खंड (क), (ग) और (i) के अधीन रहते हुए, धारा 6 के अधीन अनुरोध की तिथि से बीस वर्ष पूर्व घटित किसी घटना, वृत्तांत या मामले से संबंधित जानकारी अनुरोध करने वाले किसी भी व्यक्ति को प्रदान की जाएगी।
- यदि बीस वर्ष की अवधि की संगणना किस तिथि से की जानी है, इस संबंध में कोई प्रश्न उठता है, तो अधिनियम के अंतर्गत सामान्य अपीलों के अधीन रहते हुए, केंद्र सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा।