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आपराधिक कानून

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 180

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 03-Aug-2026

आतिश उर्फ ​​कृष्णकांत बनाम उत्तर प्रदेश राज्य 

"पुलिस को साक्षी का अपना कथन अभिलिखित करना चाहियेन कि दोष साबित करने वाली सामग्री का सुझाव देना चाहिये।" - 

न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल 

स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ नेआतिश उर्फ ​​कृष्णकांत बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामलेमें उत्तर प्रदेश के DGP को सभी पुलिस अधिकारियों को आवश्यक निर्देश जारी करने का निदेश दिया जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि धारा 180 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन कथन अभिलिखित करते समयवे साक्षियों से दोषारोपणकारी प्रश्न न पूछेंअपितु कुछ बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगने के अलावासाक्षी द्वारा अपनी भाषा में दिये गए कथन को ही अभिलिखित करें। 

आतिश उर्फ ​​कृष्णकांत बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह मामला जमानत याचिका से जुड़ा है जिसमें अभियुक्त दहेज मृत्यु के आरोपों का सामना कर रहा था। 
  • इससे पहले की सुनवाई मेंन्यायालय ने राज्य को धारा 180 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन अभिलिखित किये गए प्रथम सूचनाकर्त्ता और उसकी पत्नी के कथनों की ऑडियो/वीडियो रिकॉर्डिंग पेश करने का निदेश दिया था। 
  • न्यायालय ने मृतक की भाभी के कॉल डिटेल रिकॉर्ड और मेडलीएपीआर (MedLEapr) डिजिटल प्लेटफॉर्म को क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम्स (CCTNS) के साथ एकीकृत करने के संबंध में भी निर्देश मांगे थे। 
  • अन्वेषण अधिकारी और पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर को न्यायालय के समक्ष उपस्थित रहने का निदेश दिया गया। 
  • इन निर्देशों के अनुसारयह पाया गया कि अन्वेषण के दौरान मृतक की भाभी के कॉल डिटेल रिकॉर्ड प्राप्त नहीं किये गए थेप्राप्त होने परउनसे मृतक या उसके ससुराल वालों की कोई कॉल का पता नहीं चलाऔर घटना से एक दिन पहले दहेज उत्पीड़न के संबंध में की गई कॉल का आरोप साबित नहीं हो सका। 
  • यह भी बताया गया कि MedLEapr CCTNS के साथ एकीकृत नहीं हैयद्यपि स्वास्थ्य विभाग से अनुरोध करने पर CCTNS के माध्यम से पोस्टमार्टम रिपोर्ट प्राप्त की जा सकती है।  
  • रिकॉर्डिंग की परीक्षा करने परपीठ ने पाया कि कथन अभिलिखित करने वाले पुलिस अधिकारी नेप्रथम सूचनाकर्त्ता और उसकी पत्नी द्वारा बताई गई घटना के विवरण को अभिलिखित करने के बजायदोषारोपणकारी प्रकृति के भ्रामक प्रश्न पूछे थे। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • दोषारोपणकारी प्रश्न पूछने की अनुचितता पर:न्यायालय ने साक्षियों को दोषारोपणकारी सामग्री सुझाने की प्रथा को "बिल्कुल गलत" करार दियायह मानते हुए कि आपराधिक न्याय प्रशासन का उद्देश्य केवल दोषियों को दण्डित करना नहीं अपितु निर्दोषों की रक्षा करना भी हैऔर पुलिस को किसी साक्षी को अभियुक्त के विरुद्ध सामग्री सुझाने का सुझाव नहीं देना चाहिये 
  • कथन अभिलिखित करने के तरीके पर:न्यायालय ने माना कि धारा 180 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन कथन साक्षी द्वारा बताई गई भाषा और संस्करण में लिखे जाने चाहियेकेवल कुछ स्पष्टीकरण मांगने के लिये ही इसमें छूट की अनुमति है। 
  • जारी निर्देश पर:न्यायालय ने लखनऊ के DGP को सभी पुलिस अधिकारियों को आवश्यक निर्देश जारी करने का निदेश दिया कि धारा 180 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन कथन अभिलिखित करते समयउन्हें दोष सिद्ध करने वाले प्रश्न नहीं पूछने चाहियेऔर कुछ बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगने के अलावासाक्षी द्वारा अपनी भाषा में दिये गए कथन को ही अभिलिखित करना चाहिये 
  • जमानत याचिका के गुण-दोष पर :विचार करते हुए न्यायालय ने पाया कि मृतक की मृत्यु विषैले पदार्थ के सेवन से हुई थी, FIR लगभग तीन महीने बाद विसरा रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद अभिलिखित की गई थीइस विलंब का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया थाप्रथम सूचनादाता और उसकी पत्नी के कथनों में विसंगतियां थींऔर घटना से एक दिन पहले मृतक द्वारा अपनी भाभी को किये गए फोन कॉल के आरोप की पुष्टि करने वाला कोई सबूत नहीं था। गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त किये बिनान्यायालय ने आवेदक को जमानत दे दी। 
  • लंबित तकनीकी विवाद्यक पर:यह देखते हुए कि MedLEapr, CCTNS और CIS के बीच डेटा ट्रांसफर से संबंधित प्रश्नों की आगे परीक्षा की आवश्यकता हैन्यायालय ने इस सीमित उद्देश्य के लिये मामले को लंबित रखा और उप महानिदेशक, NIC, नई दिल्लीऔर अतिरिक्त महानिदेशक (तकनीकी)उत्तर प्रदेश पुलिस से अगली तारीख को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित होकर तकनीकी विवाद्यकों को हल करने में सहायता करने का अनुरोध किया।  

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 180 क्या है? 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 180 - पुलिस द्वारा साक्षियों की परीक्षा: 

उपधारा (1) – परीक्षा करने की शक्ति 

  • किसी मामले का अन्वेषण कर रहा कोई भी पुलिस अधिकारीया राज्य सरकार द्वारा निम्नतर पंक्ति का कोई भी पुलिस अधिकारीजो अन्वेषण अधिकारी के अनुरोध पर कार्य कर रहा होमामले के तथ्यों और परिस्थितियों से परिचित माने जाने वाले किसी भी व्यक्ति से मौखिक रूप से परीक्षा कर सकता है। 

उपधारा (2) – सत्य उत्तर देने का कर्त्तव्य  

  • जिस व्यक्ति की परीक्षा की जा रही हैवह मामले से संबंधित पूछे गए सभी प्रश्नों का सत्यपूर्वक उत्तर देने के लिये बाध्य है। 
  • अपवाद: उसे ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने की आवश्यकता नहीं है जिनके उत्तर देने से उस पर आपराधिक आरोपदण्ड या संपत्ति समपहरण की आशंका हो सकती है (आत्म- अभिशंसन के विरुद्ध संरक्षण)। 

उपधारा (3) – कथनों को अभिलिखित करना 

  • पुलिस अधिकारी कथन को लिखित रूप में अभिलिखित कर सकता हैऔर यदि वह ऐसा करता हैतो उसकी परीक्षा किये गए प्रत्येक व्यक्ति के लिये एक पृथक् और सटीक रिकॉर्ड रखना होगा। 
  • प्रथम परंतुक :कथन को ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक साधनों द्वारा भी अभिलिखित किया जा सकता है। 
  • द्वितीय परंतुक:जहाँ कथित अपराध भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64, 65, 66, 67, 68, 69, 70, 71, 74, 75, 76, 77, 78, 79, या 124 (महिलाओं के विरुद्ध अपराधमुख्य रूप से लैंगिक अपराध) के अंतर्गत हैवहाँ महिला पीड़ित का कथन महिला पुलिस अधिकारी या महिला अधिकारी द्वारा अभिलिखित किया जाना चाहिये