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आपराधिक कानून

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 23

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 11-Aug-2026

बनाम Y 

"सह-अभियुक्त के प्रकटीकरण वाले कथनबिना किसी मुआवजे केप्रथम दृष्टया धारा 23 भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अधीन आते हैं" 

न्यायमूर्ति सूर्य प्रताप सिंह 

स्रोत: पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सूर्य प्रताप सिंह की अध्यक्षता वाली पीठ ने आभूषण की दुकान में हुई डकैती में प्रयोग की गई देसी पिस्तौल की आपूर्ति के अभियुक्त व्यक्ति को जमानत दे दी। पीठ ने माना कि सह-अभियुक्तों के कथनजो पुलिस अभिरक्षा में रहते हुए अभिलिखित किये गए थे और जिनके साथ किसी भी प्रकार की बरामदगी या तथ्य की खोज नहीं हुई थीप्रथम दृष्टया भारतीय सुरक्षा अधिनियम, 2023 (BSA) की धारा 23 को आकर्षित करते हैं। 

इस मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • पुलिस स्टेशन सेक्टर-8, जिला फरीदाबाद में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 310(2), 311, 61(2) और 238(ख) तथा आयुध अधिनियम की धारा 25 और 25(8) के अधीन प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई। 
  • विनय जैन के परिवाद के अनुसारसुबह लगभग 10:36 बजेजब उनके कर्मचारी दुकान खोलने के बाद उसकी सफाई कर रहे थेतभी चार लड़के आए - एक ने हेलमेट पहना हुआ था और तीन के चेहरे ढके हुए थेजिनमें से दो देसी पिस्तौल से लैस थे और एक के पास चाकू था। 
  • आरोप है कि हमलावरों ने परिवादकर्त्ता  से बंदूक की नोक पर 10 किलो चांदी, 2 लाख रुपए नकद, 50 ग्राम सोना और 350 रत्न लूट लिये 
  • परिवादकर्त्ता ने बताया कि उसने विरोध किया था और एक हमलावर के चेहरे पर मुक्का मारते समय वह उसका चेहरा देख पाया था और उसकी पहचान करने में सक्षम होगा। 
  • याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध अभियोजन पक्ष का मामला यह था कि उसने अपराध करने में प्रयोग की गई देसी पिस्तौल की आपूर्ति की थी। 
  • याचिकाकर्त्ता की प्रथम जमानत याचिका 12.02.2026 को वापस ले ली गई थीजिसके बाद उसने द्वितीय जमानत याचिका के साथ उच्च न्यायालय का रुख किया। 
  • याचिकाकर्त्ता को 07.11.2025 को गिरफ्तारी के बाद से अभिरक्षा में रखा गया था। 

पक्षकारों के तर्क: 

  • याचिकाकर्त्ता:अधिवक्ता ने प्रस्तुत किया कि याचिकाकर्त्ता घटनास्थल पर उपस्थित नहीं थाउस पर केवल सह-अभियुक्त को देसी पिस्तौल की आपूर्ति करने का आरोप हैउससे कुछ भी बरामद नहीं किया जा सका हैऔर निकट भविष्य में विचारण के समाप्त होने की संभावना नहीं है। 
  • राज्य:राज्य के अधिवक्ता ने स्वीकार किया कि याचिकाकर्त्ता डकैती में सक्रिय रूप से शामिल नहीं थालेकिन उन्होंने तर्क दिया कि उसने मुख्य अभियुक्त को सहायता प्रदान की थी और उसकी भूमिका गंभीर थी। यह भी प्रस्तुत किया गया कि याचिकाकर्त्ता का आपराधिक रिकॉर्ड साफ नहीं थाक्योंकि वह छह अन्य मामलों में अभियुक्त था। 
  • राज्य की ओर से कोई अभिरक्षा प्रमाण पत्र या औपचारिक जवाब दाखिल नहीं किया गयाजिसने मौखिक रूप से याचिका का विरोध किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • एकमात्र आरोप पर:न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध एकमात्र आरोप हथियार की आपूर्ति करने का थाजबकि घटनास्थल पर उसकी उपस्थिति या षड्यंत्र में उसकी भागीदारी को दर्शाने वाला कोई सबूत मौजूद नहीं था। 
  • प्रकटीकरण कथनों पर:न्यायालय ने पाया कि सह-अभियुक्तों के प्रकटीकरण कथनों की स्वीकार्यता और विश्वसनीयता पर प्रश्न उठता हैक्योंकि ये कथन सह-अभियुक्तों की पुलिस अभिरक्षा में रहते हुए अभिलिखित किये गए थे और इनके आधार पर कोई भी आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं हुई थीइसलिये ये कथन प्रथम दृष्टया धारा 23 भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अंतर्गत आते हैं। 
  • सह-अभियुक्त और अन्वेषण के संबंध में:न्यायालय ने सह-अभियुक्त को पहले ही दी जा चुकी जमानतकथन में निहित खामियों और अन्वेषण के पूर्ण होने पर ध्यान दियाजिसके परिणामस्वरूप याचिकाकर्त्ता से कुछ भी बरामद नहीं किया जा सका। 
  • विलंब और भागने के जोखिम पर:न्यायालय ने विचारण के शीघ्र निष्कर्ष की असंभावना और ऐसी किसी भी सामग्री के अभाव पर विचार किया जो यह संकेत देती हो कि याचिकाकर्त्ता साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ करेगासाक्षियों को प्रभावित करेगा या विचारण में सहयोग करने में विफल रहेगा। 
  • पूर्व निर्णयों पर:न्यायालय नेदताराम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य , 2018  पर विश्वास कियाजहाँ उच्चतम न्यायालय ने निर्दोषता की उपधारणा और इस नियम को दोहराया कि जमानतन कि जेलमानक हैचेतावनी देते हुए कि इन सिद्धांतों को कभी-कभी नजरअंदाज कर दिया जाता हैजिससे लंबा कारावास होता है। 
  • न्यायालय नेसतेंद्र कुमार अंतिल बनाम सी.बी.आई. , (2022) पर भी विश्वास कियाजहाँ उच्चतम न्यायालय ने कम दोषसिद्धि दर को जमानत निर्णय को प्रभावित करने देने के विरुद्ध चेतावनी दी थीयह मानते हुए कि जमानत आवेदन को विचारण में निर्णय के साथ नहीं जोड़ा जा सकता हैऔर निरंतर अभिरक्षा के बाद अंततः दोषमुक्त होना गंभीर अन्याय होगा। 
  • इन कारकों के संचयी प्रभाव को देखते हुए याचिकाकर्त्ता जमानत का हकदार हैऔर मामले की योग्यता पर टिप्पणी किये बिनान्यायालय ने विचारण न्यायालय की संतुष्टि के अनुरूप व्यक्तिगत और जमानत बंधपत्र प्रस्तुत करने पर उसको छोड़ने का आदेश दिया। 

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 23 क्या है? 

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 23— पुलिस अधिकारी से की गई संस्वीकृति : 

  • उपधारा (1):किसी पुलिस अधिकारी से की गई कोई भी संस्वीकृति किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति के विरुद्ध साबित न की जाएगी 
  • उपधारा (2):कोई भी संस्वीकृतिजो किसी व्यक्ति ने उस समय की हो जब वह पुलिस अधिकारी अभिरक्षा में होउसके विरुद्ध साबित न की जाएगी जब तककि वह मजिस्ट्रेट की साक्षात् उपस्थिति में न की गई हो 
  • उपधारा (2) का परंतुक:जब किसी तथ्य के बारे में यह अभिसाक्ष्य दिया जाता है कि किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति सेजो पुलिस अधिकारी की अभिरक्षा में होप्राप्त जानकारी के परिणामस्वरूप उसका पता चला हैतब ऐसी जानकारी में सेउतनी चाहे वह संस्वीकृति की कोटि में आती हो या नहींजितनी पता चले हुए तथ्य से स्पष्टतया संबंधित हैसाबित की जा सकेगी।