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आपराधिक कानून

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम बाल साक्षियों से प्रतिपरीक्षा करने को वर्जित नहीं करता है

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 19-Aug-2026

शंकर सिंह बनाम दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्य 

"लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम का यह अर्थ नहीं है कि प्रतिरक्षा करने वाला पक्ष बाल साक्षी से प्रश्न नहीं पूछ सकता या उसे प्रश्न पूछने की आवश्यकता नहीं है।" 

न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा 

स्रोत: दिल्ली उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा की पीठ ने शंकर सिंह बनाम दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (2026) के मामले में, लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन दोषसिद्धि को चुनौती देने वाली अपील को यह मानते हुए खारिज कर दिया कि विचारण न्यायालय ने पीड़ित बालक से प्रतिपरीक्षा करने की अनुमति न देकर त्रुटि की थी, इसे "गलत प्रक्रिया" करार दिया। 

शंकर सिंह बनाम दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता को भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 342, 376(2)(i) और (l) तथा लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 6 के अधीन एक 11 वर्षीय लड़की को कई बार सदोष परिरोध और उस पर गंभीर लैंगिक हमला करने के लिये दोषी ठहराया गया था। उसे 12 वर्ष के कठोर कारावास के साथ 12,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया गया था। 
  • पीड़िता का कथन धारा 164 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन अभिलिखित किया गया था, जिसमें उसने मैथिली बोली में केवल दो शब्द बोले थे, जिनका अनुवाद उसकी माता ने किया था। 
  • विचारण के दौरान, प्रतिरक्षा पक्ष ने पीड़ित बच्ची के सामने कुछ सुझाव रखने की कोशिश की, जिनमें यह भी शामिल था कि घटना घटी ही नहीं थी और उसने न तो कोई शोर मचाया था और न ही किसी को सूचित किया था। 
  • विचारण न्यायालय ने इन सुझावों को इस आधार पर अस्वीकार कर दिया कि लगभग पाँच वर्ष की मानसिक आयु वाले बालक में इन सुझावों की प्रकृति और महत्त्व को समझने की क्षमता नहीं थी। अपीलकर्त्ता ने दिल्ली उच्च न्यायालय में अपनी दोषसिद्धि को चुनौती दी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण के अधीन बाल साक्षी से प्रतिपरीक्षा के संबंध में: न्यायालय ने माना कि लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम बालक को आक्रामक पूछताछ या चरित्र हनन से बचाता है और यह सुनिश्चित करता है कि विचारण के दौरान बच्चे की गरिमा बनी रहे, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रतिरक्षा पक्ष बाल साक्षी से प्रश्न नहीं पूछ सकता या पूछने की आवश्यकता नहीं है। 
  • क्षेत्रीय बोली में पीड़िता के कथन पर: न्यायालय ने कहा कि पीड़िता ने धारा 164 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन दिये गए अपने कथन के दौरान मैथिली में केवल दो शब्द बोले थे, जिसका अनुवाद उसकी माता ने किया था, और यह माना कि अवयस्क पीड़िता या दुभाषिया को शपथ न दिलाए जाने से कथन स्वतः ही खारिज नहीं हो जाएगा। 
  • साक्ष्य की पर्याप्तता पर: न्यायालय ने माना कि अवयस्क के परिसाक्ष्य को, विचारण न्यायालय द्वारा अभिलिखित किये गए हाव-भावों के साथ, समग्र रूप से पढ़ा जाना चाहिये और अभियुक्त के प्रत्यक्ष कृत्यों को स्थापित करने के लिये पर्याप्त सामग्री पाई। न्यायालय ने आगे कहा कि घटना के प्रत्येक साक्षी से परीक्षा न करने से प्रतिकूल निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, जब वास्तव में प्रस्तुत साक्ष्य ठोस, विश्वसनीय और उचित संदेह से परे अपराध साबित करने के लिये पर्याप्त हो। 
  • लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण के अधीन सुरक्षा उपायों को तकनीकी आधार न मानने के संबंध में: न्यायालय ने माना कि लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण नियम, 2020 के अधीन सुरक्षा उपाय बालक की सुरक्षा और सुविधा प्रदान करने के उद्देश्य से हैं, और सिद्ध पूर्वाग्रह के अभाव में अन्यथा विश्वसनीय ठोस साक्ष्य को खारिज करने के लिये इन्हें तकनीकी आधार में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। 
  • विचारण न्यायालय की त्रुटिपूर्ण प्रक्रिया पर: दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए भी, न्यायालय ने माना कि विचारण न्यायालय ने बाल पीड़ित से प्रतिरक्षा पक्ष द्वारा प्रस्तावित प्रश्नों को इस आधार पर पूरी तरह से अस्वीकार करके त्रुटि की कि वह उन्हें समझ नहीं सकती थी। लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 33 का हवाला देते हुए, न्यायालय ने कहा कि किसी बालक की मुख्य परीक्षा, प्रतिपरीक्षा या पुन: परीक्षा के दौरान पूछे जाने वाले प्रश्न विशेष न्यायालय को सूचित किये जाने चाहिये, जो फिर उन प्रश्नों को बच्चे से पूछता है। न्यायालय ने माना कि धारा 33(2) के अधीन इस प्रक्रिया को अपनाया जाना चाहिये था, और प्रतिरक्षा पक्ष को साक्षी से सुझाव मांगने से पूरी तरह से नहीं रोका जाना चाहिये था। 

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन बाल गवाह से जिरह क्या होती है? 

अधिनियम के बारे में: 

  • लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012 बालकों को लैंगिक शोषण और दुर्व्यवहार से बचाने, उनकी अंतर्निहित संवेदनशीलता को दूर करने और उनकी सुरक्षा एवं कल्याण सुनिश्चित करने के लिये बनाया गया एक ऐतिहासिक विधि है। इसे संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अपनाया गया और भारत सरकार द्वारा 11 दिसंबर 1992 को स्वीकार किया गया बाल अधिकारों पर अभिसमय के अनुरूप अधिनियमित किया गया था। 

उद्देशिका : 

  • यह अधिनियम बालकों को लैंगिक हमला, लैंगिक उत्पीड़न और अश्लील साहित्य से संबंधित अपराधों से बचाता है और ऐसे अपराधों और उनसे संबंधित मामलों के विचारण के लिये विशेष न्यायालयों की स्थापना का उपबंध करता है। 

प्रमुख तिथियां: 

  • अधिनियमित होने की तिथि: 19 जून 2012 
  • प्रवर्तित होने की तिथि: 14 नवंबर 2012 

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण संशोधन अधिनियम, 2019: 

  • यह 16 अगस्त 2019 से लागू हुआ। 
  • इस अधिनियम के अंतर्गत अपराधों के लिये अधिक कठोर दण्ड का उपबंध किया गया है। 
  • धारा 2(1) में खंड (घक) सम्मिलित किया गया है, जिसमें "बालक संबंधी अश्लील सामग्री" को परिभाषित किया गया है। 
  • सोलह वर्ष से कम आयु के बालक पर लाँगिक हमला करने का मामला अधिनियम की धारा 4 के दायरे में लाया गया है। 

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन बाल साक्षी से प्रतिपरीक्षा: 

धारा 33 के अंतर्गत स्थिति: 

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम प्रतिरक्षा पक्ष को बाल साक्षी से प्रतिपरीक्षा करने से नहीं रोकता है। यह अधिनियम प्रतिपरीक्षा के तरीके को नियंत्रित करता है, जिससे बालक को मानसिक आघात से बचाया जा सके और साथ ही अभियुक्त के निष्पक्ष विचारण के अधिकार को भी संरक्षित किया जा सके। 

प्रतिपरीक्षा के दौरान बरती जाने वाली परीक्षा को नियंत्रित करने वाले प्रमुख सुरक्षा उपाय: 

  • प्रत्यक्ष पूछताछ निषेध: विशेष लोक अभियोजक और प्रतिरक्षा पक्ष के अधिवक्ता बालक से सीधे प्रश्न नहीं पूछते। धारा 33(2) के अधीन, मुख्य परीक्षा, प्रतिरक्षा या पुन: परीक्षा के दौरान पूछे जाने वाले प्रश्न पहले विशेष न्यायालय को सूचित किये जाने चाहिये, जो फिर उन प्रश्नों को बालक से उचित तरीके से पूछता है। 
  • संरक्षण, निषेध नहीं: धारा 33(6) बालक से आक्रामक पूछताछ या चरित्र हनन को प्रतिबंधित करती है और यह आवश्यक है कि बालक की गरिमा को हर समय बनाए रखा जाए, लेकिन यह प्रतिपरीक्षा पर रोक नहीं लगाता है। 
  • बार-बार विराम: विशेष न्यायालय विचारण के दौरान आवश्यकतानुसार बालक को विराम देने की अनुमति दे सकता है। 
  • सहायक उपस्थिति: परिसाक्ष्य के दौरान बालक के साथ एक विश्वसनीय परिवार के सदस्य, संरक्षक, मित्र या रिश्तेदार को उपस्थित रहने की अनुमति दी जा सकती है। 
  • बार-बार परिसाक्षी की अनुमति नहीं: बालक को बार-बार परिसाक्ष्य के लिये नहीं बुलाया जा सकता।