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सिविल कानून

परिसीमा अधिनियम की धारा 14

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 13-Aug-2026

मैगेबा ब्रिज प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम मेसर्स ट्रेड सेंटर 

"कंपनी के परिसमापन की कार्यवाही शुरू करने से धन वसूली के लिये वाद का पृथक् उपचार की परिसीमा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।" 

न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति जे.बी.परदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ नेमैगेबा ब्रिज प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम मेसर्स ट्रेड सेंटर (2026) के मामले मेंयह निर्णय दिया कि परिसमापन कार्यवाही में व्यतीत समय को परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 14 के अधीन धन वसूली के लिये वाद दायर करने के उद्देश्य से अपवर्जित नहीं किया जा सकता हैक्योंकि परिसमापन और वसूली अलग-अलग अनुतोष की मांग करने वाली कार्यवाही हैं। 

मैगेबा ब्रिज प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम मेसर्स ट्रेड सेंटर (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • प्रत्यर्थी ने जून 2010 में ₹24,36,105 की वसूली के लिये वाद दायर कियाजो जनवरी 2006 और मार्च 2007 से बकाया बिलों पर आधारित थाअर्थात ऐसे वादों के लिये विहित तीन वर्ष की परिसीमा से परे। 
  • वाद दायर करने से पहलेप्रत्यर्थी ने फरवरी 2009 में कंपनी न्यायालय में अपीलकर्त्ता कंपनी को उसी बकाया राशि के संबंध में बंद करने की मांग की थी। 
  • कंपनी न्यायालय ने पाया कि अपीलकर्त्ता ने ऋण के संबंध में एक वास्तविक विवाद उठाया था और प्रत्यर्थी को वाद के सिविल उपचार का सहारा लेने के लिये कहा। 
  • तथापि अपीलकर्त्ता ने तीन बिलों को स्वीकार कियाजिनका भुगतान हो चुका थाऔर जनवरी 2006 की तारीख वाले दो बिलों के लिये सुरक्षा प्रदान करने पर सहमति व्यक्त कीलेकिन प्रत्यर्थी ने सभी बिलों के अधीन वसूली के लिये दबाव डाला। 
  • प्रत्यर्थी ने तर्क दिया कि वसूली वाद के लिये परिसीमा की संगणना करते समय परिसमापन कार्यवाही को आगे बढ़ाने में व्यतीत समय को परिसीमा अधिनियम की धारा 14 के अधीन अपवर्जित किया जाना चाहिये 
  • कलकत्ता उच्च न्यायालय ने वसूली के वाद को मंजूर कर लियाजिसके बाद अपीलकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • अनुतोष की मांग में अंतर के संबंध में:न्यायालय ने माना कि परिसमापन की कार्यवाहीजिससे ऋण की वसूली हो भी सकती है और नहीं भीधन की वसूली के वाद से अलग हैऔर एक की लंबितता दूसरे पर लागू होने वाली परिसीमा को प्रभावित नहीं करती है।  
  • धारा 14 की प्रयोज्यता पर:न्यायालय ने माना कि परिसीमा अधिनियम की धारा 14 के अधीन प्रत्यर्थी की प्रतिरक्षा मान्य नहीं हो सकतीक्योंकि परिसमापन कार्यवाही में व्यतीत समय को एक ही विचाराधीन मामले से संबंधित नहीं माना जा सकताऔर न ही दोनों कार्यवाहियों में एक ही अनुतोष की मांग की गई थी। 
  • पूर्व निर्णयों पर निर्भरता:न्यायालय नेयशवंत देवराव देशमुख बनाम वालचंद रामचंद कोठारी (1950) के मामलेपर विश्वास कियाजहाँ निष्पादन याचिका दाखिल करने में विलंब को माफ करने के उद्देश्य से दिवाला कार्यवाही में व्यतीत समय को अपवर्जित करने से इंकार कर दिया गया थाऔर यह माना कि परिसमापन कार्यवाही में व्यतीत समय को यहाँ भी अपवर्जित नहीं किया जा सकता है। 
  • परिसीमा और अंतिम अनुतोष पर:वसूली का वाद तीन वर्ष की परिसीमा अवधि के बाद दायर किया गया पाया गयाइसलिये न्यायालय ने उच्च न्यायालय के उस निर्णय को अपास्त कर दिया जिसमें वसूली का अनुतोष दिया गया थाजबकि यह पुष्टि की गई कि वाद वैध रूप से रजिस्ट्रीकृत भागीदारी फर्म द्वारा विधिवत रूप से दायर किया गया था। अपील मंजूर कर ली गई और वसूली का वाद परिसीमा के कारण खारिज कर दिया गया। 

परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 14 क्या है? 

धारा 14 – बिना अधिकारिता वाले न्यायालय में सद्भावपूर्वक की गई कार्यवाही में लगे समय का अपवर्जन: 

उपधारा (1) – वादों के लिये अपवर्जन: 

  • किसी भी वाद के लिये परिसीमा अवधि की संगणना करते समयवह समय जिसमें वादी ने उचित तत्परता से किसी अन्य सिविल कार्यवाही को आगे बढ़ाया होउसे शामिल नहीं किया जाएगा। 
  • यह नियम तब भी लागू होता है जब दूसरी कार्यवाही प्रथम दृष्ट्या न्यायालयअपील न्यायालय या पुनरीक्षण न्यायालय के समक्ष हुई होऔर चाहे वह प्रतिवादी के विरुद्ध हो। 
  • यह अपवर्जन केवल तभी लागू होता है जब कार्यवाही विचाराधीन मामले से संबंधित हो। 
  • कार्यवाही सद्भावनापूर्वक की गई होनी चाहिये थी। 
  • जिस न्यायालय में इस मामले की सुनवाई हुईवह अधिकारिता की कमी या इसी प्रकार के किसी अन्य कारण से इस पर सुनवाई करने में असमर्थ रहा होगा। 

उपधारा (2) – आवेदनों के लिये अपवर्जन: 

  • किसी भी आवेदन के लिये परिसीमा काल की संगणना करते समयउस समय को अपवर्जित नहीं किया जाएगा जिसके दौरान आवेदक ने किसी अन्य सिविल कार्यवाही को उचित तत्परता से आगे बढ़ाया हो। 
  • यह नियम तब भी लागू होता है जब दूसरी कार्यवाही प्रथम दृष्ट्या न्यायालयअपील न्यायालय या पुनरीक्षण न्यायालय के समक्ष हुई हो। 
  • दूसरी कार्यवाही भी उसी पक्ष के विरुद्ध और उसी प्रकार के अनुतोष के लिये होनी चाहिये थी। 
  • कार्यवाही सद्भावनापूर्वक की गई होनी चाहिये थी। 
  • जिस न्यायालय में इस मामले की सुनवाई हुईवह अधिकारिता की कमी या इसी प्रकार के किसी अन्य कारण से इस पर सुनवाई करने में असमर्थ रहा होगा। 

उपधारा (3) – सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 23 नियम के अधीन नए वादों के लिये अपवर्जन: 

  • सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 23, नियम के होते हुए भीउपधारा (1) आदेश 23, नियम के अधीन न्यायालय की अनुमति से दायर किये गए नए वाद पर लागू होती है। 
  • यह उस स्थिति में लागू होता है जब ऐसी अनुमति इस आधार पर दी गई हो कि न्यायालय की अधिकारिता में दोष या इसी प्रकार के अन्य कारण से पहला वाद विफल होना ही था। 

स्पष्टीकरण – इस धारा के प्रयोजनों के लिये: 

  • (क)पूर्ववर्ती  सिविल कार्यवाही के लंबित रहने की अवधि को छोड़करकार्यवाही शुरू होने का दिन और कार्यवाही समाप्त होने का दिन दोनों गिने जाएंगे। 
  • (ख)कोई वादी या आवेदक, जो किसी अपील का प्रतिरोध कर रहा हो, कार्यवाही का अभियोजन करता हुआ समझा जाएगा। 
  • (ग)पक्षकारों या वाद-हेतुकों के कुसंयोजन को अधिकारिता में त्रुटि जैसी प्रकृति का हेतुक समझ जाएगा।