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वाणिज्यिक विधि

अनिर्दिष्ट संविदात्मक क्षतिपूर्ति, दिवाला और शोधन अक्षमता के अंतर्गत परिचालन ऋण नहीं है

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 13-Aug-2026

श्रीनिवास रेड्डी वेलागाला बनाम श्रवणथी इंफ्राटेक प्रा. लिमिटेड 

"सक्षम न्यायालय द्वारा न्यायनिर्णय के माध्यम से क्षतिपूर्ति का आकलन और निर्धारण किये जाने तक क्षतिपूर्ति परिचालन ऋण के दायरे से बाहर रहती है - राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) और राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण (NCLAT) ऐसे विवादों का निपटारा करने के लिये अभिप्रेत मंच नहीं हैं।" 

न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ नेश्रीनिवास रेड्डी वेलागला बनाम श्रावंती इंफ्राटेक प्राइवेट लिमिटेड (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि संविदा के भंग से उत्पन्न होने वाली क्षति के लिये अनिर्धारित दावे दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 के अधीन "परिचालनात्मक ऋण" का आधार नहीं बन सकते हैंऔर इस आधार पर धारा के आवेदन को स्वीकार करने वाले राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) और राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण(NCLAT) के समवर्ती आदेशों को अपास्त कर दिया। 

श्रीनिवास रेड्डी वेलागला बनाम श्रावंती इंफ्राटेक प्राइवेट लिमिटेड (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी 

  • यह विवाद आंध्र प्रदेश में 225 मेगावाट के गैस आधारित बिजली स्टेशन की स्थापना के लिये इंजीनियरिंगप्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन (EPC) संविदा से उत्पन्न हुआजो प्रत्यर्थी को 827 करोड़ रुपए में दिया गया था। 
  • प्रत्यर्थी ने दावा किया कि संविदात्मक लक्ष्यों को प्राप्त करने के बावजूदअपीलकर्त्ता ने कुल देय 165.4 करोड़ रुपए के मुकाबले केवल 50.15 करोड़ रुपए का संदाय कियाजिसके बाद प्रत्यर्थी ने काम रोक दिया और अपीलकर्त्ता द्वारा कथित भंग के लिये क्षतिपूर्ति का दावा किया।  
  • संबंधित संदाय 2011 और 2012 के बीच देय थेलेकिन प्रत्यर्थी ने दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता की धारा के अधीन आवेदन केवल 2018 में दायर किया। 
  • राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) ने धारा के अधीन दायर आवेदन को स्वीकार कर लियाऔर राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण(NCLAT) ने इस स्वीकृति को बरकरार रखाजिसके चलते अपीलकर्त्ता ने अपील में उच्चतम न्यायालय का रुख किया।    

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • ऋण के निर्धारण पर:न्यायालय ने माना कि संविदा के भंग से उत्पन्न क्षतिचाहे वह निश्चित हो या अनिश्चितको परिचालन ऋण नहीं माना जा सकता जब तक कि सक्षम न्यायालय के समक्ष न्यायनिर्णय के माध्यम से उसका आकलन और निर्धारण न हो जाएक्योंकि NCLT और NCLAT ऐसे विवादों के न्यायनिर्णय के लिये उपयुक्त मंच नहीं हैं और इसके बजाय वे कॉर्पोरेट देनदार के अस्तित्व और परिसमापन में वसूली को अधिकतम करने से संबंधित हैं। 
  • निलंबन और निष्क्रियता भार के दावे पर:न्यायालय ने पाया कि चूँकि कोई वाद या मध्यस्थता कार्यवाही नहीं हुई थी जिसमें प्रत्यर्थी द्वारा दावा किये गए निलंबननिष्क्रियता और विमोचन शुल्क का आकलन या निर्धारण किया गया होइसलिये इन राशियों को धारा के आवेदन के उद्देश्य से परिचालन ऋण के रूप में नहीं माना जा सकता है। 
  • परिसीमा के संबंध में:न्यायालय ने माना कि प्रत्यर्थी का दावा परिसीमा द्वारा वर्जित थाक्योंकि ऋण 2011-2012 में उत्पन्न हुआ थालेकिन दिवाला आवेदन केवल 2018 में दायर किया गया थाजो तीन वर्ष की परिसीमा अवधि से काफी बाद का समय था। 
  • विधिक नोटिसों के माध्यम से पुराने दावों को पुनर्जीवित करने के संबंध में:न्यायालय ने प्रयर्थी के इस तर्क को खारिज कर दिया कि तकनीकी रूप से संविदा समाप्त न होने के कारण उसका दावा जीवित थायह मानते हुए कि बार-बार विधिक नोटिस भेजने से समाप्त हो चुके दावे को पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता जब तक कि देनदार लिखित रूप में ऋण को स्वीकार न कर लेऔर यह दोहराते हुए कि दिवाला और शोधन अक्षमता का उद्देश्य कालवर्जित ऋणों को नया जीवन देना नहीं है। 
  • प्रदान किये गए अनुतोष के संबंध में:न्यायालय ने अपील मंजूर कर लीधारा के अधीन दायर आवेदन की स्वीकृति अपास्त कर दी और प्रत्ययर्थी को EPC करार के अधीन निर्धारित उचित विवाद समाधान मंच के समक्ष अपने दावों को आगे बढ़ाने की स्वतंत्रता प्रदान की। 

दिवाला और शोधन अक्षमता के अधीन परिचालन ऋण क्या है? 

बारे में: 

  • परिचालनात्मक ऋण से तात्पर्य वस्तुओं या सेवाओं के प्रावधानजिसमें नियोजन भी शामिल हैके संबंध में किये गए दावे से हैया किसी भी विधि के अधीन केंद्र या राज्य सरकार को देय बकाया राशि के संबंध में किये गए ऋण से है जो उस समय लागू हो। 
  • इसे "वित्तीय ऋण" से अलग माना जाता हैजो पैसे के समय मूल्य के बदले संदाय से उत्पन्न होता है। 
  • कोई दावा तभी प्रवर्तनीय "ऋण" बनता है जब वह विधि के अनुसार देय और संदाय योग्य होकेवल विवादित या अनिर्णीत क्षतिपूर्ति का दावा स्वतः ही इस श्रेणी में नहीं आता। 

धारा आवेदन के लिये मुख्य आवश्यकताएँ: 

  • ऋण होना चाहियेउसका व्यतिक्रम होना चाहियेऔर राशि संहिता के अधीन विहित सीमा से अधिक होनी चाहिये 
  • ऋण पर कोई विवाद नहीं होना चाहियेया उठाया गया कोई भी विवाद वास्तविकपूर्व-मौजूद विवाद नहीं होना चाहिये जो मांग नोटिस से पहले ज्ञात हो। 
  • किसी सक्षम न्यायिक मंच द्वारा अंतिम रूप दिये जाने तक अनिर्धारित क्षतिपूर्ति की संगणना निश्चित रूप से नहीं की जा सकती है और इसलिये यह धारा के अधीन आवेदन का आधार नहीं बन सकती है। 

ऋण के निश्चितीकरण (Crystallization) का महत्त्व: 

  • ऋण के निश्चितीकरण से यह सुनिश्चित होता है कि केवल निर्धारितपरिमाणित तथा विधि द्वारा प्रवर्तनीय राशियाँ ही संक्षिप्त एवं समयबद्ध दिवाला कार्यवाही के दायरे में लाई जाए। 
  • यह दिवाला और शोधन अक्षमता को विवादित या सट्टा दावों की वसूली के लिये एक मंच में परिवर्तित होने से रोकता हैजिससे अंतर्निहित संविदात्मक विवादों के न्यायनिर्णय के बजाय समाधान के अपने उद्देश्य को संरक्षित किया जा सके।