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सिविल कानून
निर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम की धारा 14(3)(ग)
«14-Aug-2026
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राहुल गणेश मेहता बनाम नारायण गणपत गायकवाड़ "करार में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था जिसमें वादी पक्ष की ऐसी योग्यताओं को साबित करने की आवश्यकता हो।" न्यायमूर्ति शर्मिला यू. देशमुख |
स्रोत: बॉम्बे उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
बॉम्बे उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति शर्मिला यू. देशमुख ने राहुल गणेश मेहता बनाम नारायण गणपत गायकवाड़ (2026) के मामले में अपील पर सुनवाई करते हुए यह अभिनिर्धारित किया कि किसी भूखंड के संपूर्ण विकास से संबंधित और विकासकर्ता द्वारा उसमें अंश आरक्षित रखने से जुड़ा विकास करार विशुद्ध निर्माण संविदा नहीं है, और इस प्रकार के करार के विनिर्दिष्ट पालन को वर्जित करने के लिये विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 14(3)(ग) लागू नहीं की जा सकती। न्यायालय ने विचारण न्यायालय द्वारा वादियों के अस्थायी व्यादेश के आवेदन को अस्वीकार करने के निर्णय को अपास्त करते हुए उसे मंजूर कर लिया।
राहुल गणेश मेहता बनाम नारायण गणपत गायकवाड़ (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- वादी पक्ष ने एक विकास करार में प्रवेश किया जिसके अधीन उन्हें पूरी विवादित भूमि का विकास करना था और निर्मित क्षेत्र का 50% अंश प्रतिवादी संख्या 1 को अंतरित करना था, जबकि शेष 50% भूमि त्रिपक्षीय करार के माध्यम से वादी पक्ष के पक्ष में अंतरित की जानी थी।
- करार के खंड 7 में यह प्रावधान था कि एक बार CIDCO द्वारा प्लॉट का भौतिक कब्जा सौंप दिये जाने के बाद, प्रतिवादी नंबर 1 वादी या उनके नामित व्यक्तियों के पक्ष में त्रिपक्षीय करार पर हस्ताक्षर करेगा।
- वादी पक्ष करार के अधीन पहले ही 70,80,000 रुपए का संदाय कर चुका था।
- यह आरोप लगाया गया था कि प्रतिवादियों ने संपत्ति को किसी तीसरे पक्ष (प्रतिवादी संख्या 3) को अंतरित करने का प्रयास किया, जिसके कारण वादियों ने अस्थायी व्यादेश के लिये आवेदन के साथ-साथ विनिर्दिष्ट पालन के लिये एक वाद दायर किया।
- विचारण न्यायालय ने व्यादेश आवेदन को इस आधार पर खारिज कर दिया कि वादी ने कोई दस्तावेज पेश नहीं किया था जिससे यह पता चलता हो कि वे डेवलपर थे या उन्होंने कोई विकास कार्य किया था, और करार को विशुद्ध निर्माण संविदा माना जो विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम की धारा 14(3)(ग) के अंतर्गत आता है।
- विचारबन न्यायालय ने इस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया कि प्रतिवादी नंबर 3 बिना किसी सूचना के मूल्य के लिये एक वास्तविक क्रेता था।
- इससे व्यथित होकर वादीगण ने बॉम्बे उच्च न्यायालय के समक्ष आदेश के विरुद्ध अपील दायर की।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- करार की प्रकृति पर: न्यायालय ने माना कि पक्षकारों के बीच संविदा संपूर्ण वाद भूखंड के विकास के लिये था, जिसमें निर्मित क्षेत्र का 50% भाग वादी द्वारा प्रतिवादी संख्या 1 को सौंपा जाना था, जबकि शेष 50% भाग वादी के पास रहेगा। न्यायालय ने माना कि वादी केवल निर्माण कार्य करने के लिये नियुक्त ठेकेदार नहीं थे, और विचारण न्यायालय ने करार को विशुद्ध निर्माण संविदा मानकर धारा 14(3)(ग) लागू करने में त्रुटि की थी।
- विकासकर्ता होने के सबूत के संबंध में: न्यायालय ने पाया कि करार में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था जिसमें वादी पक्ष को विकासकर्ता के रूप में कोई सबूत प्रस्तुत करने की आवश्यकता हो, और वादी पक्ष के पास वास्तविक निर्माण कार्य के लिये किसी ठेकेदार को नियुक्त करने का विकल्प खुला था। न्यायालय ने यह माना कि इसलिये वादी पक्ष को यह साबित करने की आवश्यकता नहीं है कि वे विकासकर्ता हैं या उन्होंने पहले कोई विकास कार्य किया है।
- धारा 7 और त्रिपक्षीय करार पर: न्यायालय ने पाया कि विचारण न्यायालय विकास करार के खंड 7 पर ध्यान देने में विफल रही, जिसमें CIDCO द्वारा कब्जा सौंपे जाने के बाद वादी या उनके नामित व्यक्तियों के पक्ष में त्रिपक्षीय करार के निष्पादन का प्रावधान था।
- विकास करारों के दायरे पर: सुशील कुमार अग्रवाल बनाम मीनाक्षी साधु (2019) के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने टिप्पणी की कि एक विकास करार व्यवस्थाओं की एक विस्तृत श्रृंखला का वर्णन कर सकता है और इसे यंत्रवत् रूप से निर्माण संविदा के समान नहीं माना जा सकता है।
- प्रतिधारण खंड के प्रभाव पर: न्यायालय ने माना कि वादी के पूरे भूखंड को विकसित करने के अधिकार को केवल इस आधार पर कम नहीं किया जा सकता कि भूमि का 50% भाग बाद में उनके पक्ष में अंतरित कर दिया जाएगा।
- वास्तविक क्रेता के संबंध में: न्यायालय कहा कि विचारण न्यायालय ने स्वयं इस तर्क को स्वीकार नहीं किया था कि प्रतिवादी संख्या 3 बिना सूचना के मूल्य के लिये एक वास्तविक क्रेता था, जो व्यादेश अनुतोष प्रदान करने के पक्ष में था।
- तदनुसार, न्यायालय ने दिनांक 19 जून 2024 के विवादित आदेश को अपास्त कर दिया और वादी के अस्थायी व्यादेश के आवेदन को मंजूर कर लिया।
विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 14 क्या है?
विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 14 — ऐसी संविदाएं, जो विनिर्दिष्टतया प्रवर्तनीय नहीं हैं:
उपधारा (1) — चार श्रेणियों की संविदाएं विनिर्दिष्ट पालन को वर्जित करती है:
- (क) वे संविदाएं जिनमें मौद्रिक प्रतिकर पर्याप्त अनुतोष है।
- (ख) ऐसी संविदाएं जो बहुत सूक्ष्म हों, विवरणों से भरपूर हों, या पक्षकारों की व्यक्तिगत योग्यताओं/इच्छाशक्ति पर निर्भर हों, उन्हें न्यायालय द्वारा प्रवर्तित नहीं किया जा सकता है।
- (ग) वे संविदाएं जो प्रकृति में निर्धारणीय हैं।
- (घ) ऐसी संविदाएं जिनमें निरंतर कर्तव्य शामिल हो और जिसकी न्यायालय निगरानी नहीं कर सकता।
उपधारा (2) — वर्तमान या भविष्य के विवादों को माध्यस्थम् के लिये संदर्भित करने वाले करारों के विनिर्दिष्ट प्रवर्तन को वर्जित करती है (सिवाय माध्यस्थम् अधिनियम, 1940 के अधीन दिये गए प्रावधानों के)। यद्यपि, यदि ऐसा करार करने वाला पक्षकार इसका पालन करने से इंकार करता है और माध्यस्थम् खंड के अंतर्गत आने वाले विषय पर वाद करता है, तो उस संविदा का अस्तित्व वाद के वर्जन के रूप में कार्य करता है।
उपधारा (3) — उपधारा (1) के खंड (क), (ग) और (घ) के अपवाद बनाता है, जिससे तीन स्थितियों में विनिर्दिष्ट पालन की अनुमति मिलती है:
- (क) बंधक निष्पादित करने या ऋण की चुकौती के लिये प्रतिभूति प्रदान करने की संविदा, जिसे उधारकर्ता तुरंत चुकाने को तैयार नहीं है (बशर्ते ऋणदाता ऋण के किसी भी शेष भाग को अग्रिम करने को तैयार हो)।
- (ख) संविदाएं(i) औपचारिक भागीदारी विलेख के निष्पादन के लिये जहाँ भागीदारी व्यवसाय पहले ही शुरू हो चुका है, या (ii) किसी फर्म में भागीदार के अंश की खरीद के लिये।
- (ग) किसी भवन के निर्माण या भूमि पर अन्य कार्य के निष्पादन के लिये संविदा, तीन शर्तों के संतुष्ट होने के अधीन:
- कार्य का वर्णन इतनी सटीकता से किया गया है कि न्यायालय उसकी सटीक प्रकृति का निर्धारण कर सके;
- वादी का संविदा के पालन में पर्याप्त एवं महत्त्वपूर्ण हित है, ऐसा कि मौद्रिक प्रतिकर पर्याप्त अनुतोष नहीं होगा; और
- संविदा के अनुसार, प्रतिवादी ने उस भूमि के पूर्ण या आंशिक भाग पर कब्जा प्राप्त कर लिया है जिस पर कार्य किया जाना है।