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आपराधिक कानून

नई सामग्री के अभाव में पुलिस समान आरोपों के आधार पर पुनः प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं कर सकती

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 17-Aug-2026

मोनाली बाघमारे और अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य और अन्य 

"प्रारंभ से ही कपटपूर्ण आशय के अभाव मेंकेवल वचन को पूरा न करना या संविदा की शर्तों को भंग करनास्वयं में आपराधिक दायित्व को आकर्षित नहीं कर सकता।" 

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल 

स्रोत: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की एक खंडपीठजिसमें मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल शामिल थेनेमोनाली बाघमारे और अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य और अन्य (2026) के मामलेमें भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 318(4) और 3(5) के अधीन दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट को रद्द कर दियायह मानते हुए कि जहाँ पुलिस ने प्रारंभ में एक परिवाद को असंज्ञेय मामला माना थावहीं बाद में समान आरोपों परबिना किसी नई सामग्री के, FIR दर्ज करने से इस निष्कर्ष को बल मिलता है कि विशुद्ध रूप से वाणिज्यिक विवाद को आपराधिक रंग दे दिया गया था। 

मोनाली बाघमारे और अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ताओं पर आरोप है कि उन्होंने परिवादकर्त्ता और उसके सहयोगियों को 22,000 रुपए मासिक वेतन वाले विक्रेता/अभिकर्त्ता के रूप में नियुक्ति का आश्वासन देकर कुल 1,02,480 रुपए जमा करने के लिये प्रेरित किया था। 
  • परिवादकर्त्ता ने आरोप लगाया कि वचन किये गए लाभ कभी प्रदान नहीं किये गएजिससे छल के आरोप उत्पन्न हुए। 
  • 18 सितंबर 2025 को दायर परिवाद परपुलिस ने प्रारंभ में मामले को असंज्ञेय विवाद के रूप में माना और धारा 155 दण्ड प्रक्रिया संहिता (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 174 के अनुरूप) के अधीन कार्यवाही दर्ज कीजिसमें परिवादकर्त्ता को सक्षम न्यायालय में जाने की सलाह दी गई थी। 
  • दो दिनों के भीतरऔर बिना किसी नई सामग्री या परिस्थितियों में परिवर्तन केपुलिस ने 20 सितंबर 2025 को धारा 318(4) और 3(5) भारतीय न्याय संहिता के अधीन विवादित FIR दर्ज की। 
  • याचिकाकर्त्ताओं ने FIR को रद्द करने की मांग करते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया और तर्क दिया कि विवाद पूरी तरह से वाणिज्यिक प्रकृति का था। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • अंतर्निहित संबंध की प्रकृति पर:न्यायालय ने पाया कि परिवादकर्त्ता और अन्य व्यक्तियों ने स्टांप पेपर पर प्रत्यक्ष विक्रेता करारों पर हस्ताक्षर करके स्वतंत्र व्यवसाय स्वामियों के रूप में स्वेच्छा से व्यवसाय में शामिल हुए थे। इन करारों में पक्षकारों के अधिकारों और दायित्वों को निर्धारित किया गया था और इनमें FIR में लगाए गए आरोपों के अनुसार 22,000 रुपए के मासिक वेतन के संदाय या भोजन और आवास के प्रावधान से संबंधित कोई शर्त नहीं थी।   
  • छल के तत्त्वों पर:न्यायालय ने माना कि आरोप मूलतः एक वाणिज्यिक और संविदात्मक संबंध से उत्पन्न हुए थेऔर अभिलेख में मौजूद सामग्री से प्रथम दृष्टया संव्यवहार की शुरुआत में याचिकाकर्त्ताओं की ओर से किसी भी कपटपूर्ण या बेईमान आशय का प्रकटन नहीं होता है - जो कि धारा 318(4) भारतीय न्याय संहिता के अधीन छल के अपराध के गठन के लिये अनिवार्य शर्त है। न्यायालय ने टिप्पणी की कि मात्र किसी वचन का पूरा न होना या संविदात्मक शर्तों का भंगप्रारंभ से ही कपटपूर्ण आशय के अभाव मेंस्वयं में आपराधिक दायित्व को आकर्षित नहीं कर सकता है। 
  • असंज्ञेय से संज्ञेय मामले में परिवर्तन के संबंध में:न्यायालय ने पाया कि उसी परिवाद पर पुलिस ने पहले मामले को असंज्ञेय मानते हुए धारा 155 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन कार्यवाही दर्ज की थीलेकिन दो दिनों के भीतर ही बिना कोई नई सामग्री पेश कियेउन्हीं आरोपों पर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर ली। न्यायालय ने माना कि अभिलेख में कार्यवाही की प्रकृति में इस प्रकार के परिवर्तन को स्पष्ट करने वाला कोई ठोस सबूत नहीं हैऔर यह परिस्थिति याचिकाकर्त्ताओं के इस तर्क का समर्थन करती है कि विवाद मूल रूप से एक व्यावसायिक करार से उत्पन्न हुआ था और इसे आपराधिक रंग दिया गया था। 
  • अनुतोष प्राप्त होने पर:यह मानते हुए कि कथित अपराध के आवश्यक तत्त्व सिद्ध नहीं हुएन्यायालय ने याचिका मंजूर कर ली और प्रथम सूचना रिपोर्ट को रद्द कर दिया। 

भारतीय न्याय संहिता की धारा 318 के अधीन छल क्या है? 

बारे में: 

  • भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 318 (जो धारा 420 भारतीय दण्ड संहिता को धारा 415 के साथ पढ़ने के अनुरूप है) छल को परिभाषित करती है और उसे दण्डित करती है। 
  • छल में किसी व्यक्ति को छल करनाबेईमानी या कपट से उसे संपत्ति सौंपने या ऐसा कार्य करने/न करने के लिये प्रेरित करना शामिल है जो वह अन्यथा नहीं करताजिससे नुकसान या अपहानि होती है या होने की संभावना होती है। 
  • एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व यह है कि कपटपूर्ण या बेईमानी का आशय संव्यवहार के प्रारंभ में ही मौजूद होना चाहियेयदि प्रारंभ में ऐसा कोई आशय नहीं थातो बाद में वचन निभाने में विफलताअधिक से अधिक संविदा के सिविल भंग के समान हैन कि आपराधिक अपराध के। 

भारतीय न्याय संहिता की धारा 318(4): 

  • इसमें छल और बेईमानी से संपत्ति सौंपने या मूल्यवान प्रतिभूति को नष्ट करने से संबंधित अपराध शामिल हैंजिसके लिये सात वर्ष तक का कारावास और जुर्माना हो सकता है - यह संपत्ति से संबंधित छल का गंभीर रूप है। 

भारतीय न्याय संहिता की धारा 3(5): 

  • यह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 34 के अनुरूप है और इसमें कई व्यक्तियों द्वारा सामान्य आशय से किये गए कृत्यों से संबंधित उपबंध हैंजिसके अधीन प्रत्येक व्यक्ति को इस प्रकार उत्तरदायी ठहराया जाता है मानो वह कृत्य केवल उसी व्यक्ति द्वारा किया गया हो। 

संज्ञेय और असंज्ञेय अपराधों में क्या अंतर है? 

  • संज्ञेय अपराध वह है जिसमें पुलिस अधिकारी बिना वारण्ट के गिरफ्तारी कर सकता है और मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति के बिना अन्वेषण प्रारंभ कर सकता है। 
  • अज्ञेय अपराध वह है जिसमें पुलिस बिना वारण्ट के गिरफ्तारी नहीं कर सकती या मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना अन्वेषण नहीं कर सकतीसूचनाकर्त्ता को सक्षम न्यायालय में जाने के लिये कहा जाना चाहियेऔर पुलिस भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 174 (दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 155 के अनुरूप) के अधीन मामले को दर्ज करती है।