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सिविल कानून
सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 96
«21-Aug-2026
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बाबू बनाम भूमि अधिग्रहण अधिकारी एवं विशेष उप कलेक्टर एवं अन्य "इस प्रकार के निर्णय के विरुद्ध अपील का उपचार विधि अधिनियम की धारा 54 में निहित विशेष उपबंध द्वारा नियंत्रित होता है, न कि सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 96 के अधीन साधारण उपबंध द्वारा।" न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहरी और न्यायमूर्ति सुभेंदु सामंत |
स्रोत: आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहरी और न्यायमूर्ति सुभेंदु सामंता की खंडपीठ ने पी. बाबू बनाम भूमि अधिग्रहण अधिकारी और विशेष उप कलेक्टर और अन्य (2026) के मामले में यह अभिनिर्धारित किया कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 18 या 30 के अधीन कार्यवाही में संदर्भ न्यायालय द्वारा पारित डिक्री के विरुद्ध अपील केवल अधिनियम की धारा 54 के अधीन ही की जा सकती है, न कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 96 के अधीन।
पी. बाबू बनाम भूमि अधिग्रहण अधिकारी एवं विशेष उप कलेक्टर एवं अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अपीलकर्त्ता ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 30 के अधीन विशेष उप कलेक्टर द्वारा अधिग्रहित भूमि के लिये दिये गए प्रतिकर के हकदार व्यक्तियों के संबंध में किये गए संदर्भ से उत्पन्न प्रतिकर के बंटवारे से संबंधित भूमि अधिग्रहण विवाद में प्रधान वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश और डिक्री को चुनौती दी।
- अपील को क्रमांकित करने के प्रक्रम में, रजिस्ट्री ने धारा 54 के अधीन इसकी स्वीकार्यता पर आपत्ति जताई। एक समन्वय पीठ ने स्वीकार्यता के प्रश्न को अंतिम निर्णय के लिये खुला छोड़ते हुए अपील के रजिस्ट्रीकरण का निदेश दिया।
- प्रत्यर्थी ने प्रारंभिक आपत्ति उठाते हुए तर्क दिया कि विवादित आदेश धारा 2(2) कसिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन एक डिक्री है और इसलिये धारा 96 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन अपील की जा सकती है। यह भी तर्क दिया गया कि धारा 54 केवल किसी पंचाट या पंचाट के भाग पर लागू होती है, जबकि विवादित आदेश प्रतिकर के बंटवारे से संबंधित धारा 30 के संदर्भ से उत्पन्न हुआ है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- धारा 54 के पीछे विधायी आशय पर: न्यायालय ने माना कि जहाँ तक विधायी न्यायालय अधिनियम के अंतर्गत कार्यवाही में दिये गए किसी निर्णय या उसके किसी भाग का संबंध है, वहाँ विधानमंडल ने अधिनियम की धारा 18 और 30 के अंतर्गत विशेष उपचार प्रदान किया है। यदि विधानमंडल का उद्देश्य धारा 30 के अंतर्गत संदर्भ न्यायालय द्वारा पारित निर्णयों को धारा 96 सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत अपील योग्य बनाना होता, तो धारा 54 के अंतर्गत विशेष अपील उपबंध बनाने की आवश्यकता नहीं होती। धारा 54 का समावेश ही यह दर्शाता है कि अधिनियम के अंतर्गत दिये गए निर्णयों के विरुद्ध अपीलें विशेष रूप से इसी विशेष उपबंध द्वारा शासित होती हैं।
- धारा 18 और धारा 30 के अधीन संदर्भित मामलों का समान महत्त्व : न्यायालय ने माना कि धारा 30 के अधीन संदर्भित मामला और धारा 18 के अधीन संदर्भित मामला, दोनों ही कलेक्टर द्वारा संदर्भित न्यायालय को भेजे गए सांविधिक मामले हैं। धारा 18 तब लागू होती है जब कोई हितधारक पंचाट पर विवाद करता है, जबकि धारा 30 तब लागू होती है जब प्रतिकर के बंटवारे या उन व्यक्तियों के संबंध में विवाद उत्पन्न होता है जिन्हें यह देय है।
- धारा 26(2) के अधीन डीम्ड डिक्री और लागू अपीलीय उपचार पर: न्यायालय ने माना कि जबकि धारा 18 और 30 के अधीन निर्णय अधिनियम की धारा 26 के मद्देनजर डिक्री के समान है, ऐसी डिक्री के विरुद्ध अपील उपचार भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 54 में निहित विशेष उपबंध द्वारा शासित है, न कि धारा 96 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन साधारण उपबंध द्वारा।
- धारा 54 के अंतर्गत "कार्यवाही" के दायरे पर: न्यायालय ने माना कि धारा 54 में "कार्यवाही" में धारा 18 और 30 के अंतर्गत संदर्भों पर निर्णय शामिल है, जबकि धारा 54 अपील का अधिकार प्रदान करती है और सिविल प्रक्रिया संहिता केवल ऐसी अपील की प्रक्रिया को नियंत्रित करती है।
- निर्णय पर: न्यायालय ने सुनवाई की स्वीकार्यता संबंधी आपत्ति को खारिज करते हुए कहा कि धारा 18 या 30 के अधीन संदर्भित न्यायालय के निर्णयों के विरुद्ध अपीलें भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 54 के अधीन दायर की जाती हैं, न कि धारा 96 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन। अब इस मामले की गुण-दोष के आधार पर सुनवाई की जाएगी।
सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 96 क्या है?
सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 96 - मूल डिक्री की अपील
- उपधारा (1): वहाँ के सिवाय जहाँ इस संहिता के पाठ में वा तत्समय प्रवृत्त किसी जन्य विधि द्वारा अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबंधित है, ऐसी हर डिक्री की, जो आरंभिक अधिकारिता का प्रयोग करने वाले किसी न्यायालय द्वारा पारित की गई है, अपील उस न्यायालय में होगी जो ऐसे न्यायालय के विनिश्चयों की अपीलों को सुनने के लिये प्राधिकृत है ।
- उपधारा (2): एकपक्षीय पारित मूल डिक्री की अपील हो सकेगी।
- उपधारा (3): पक्षकारों की सहमति से जो डिक्री न्यायालय ने पारित की है उसकी कोई अपील नहीं होगी।
- उपधारा (4): लघुवाद न्यायालयों द्वारा संज्ञेय वाद में किसी डिक्री से कोई अपील, यदि ऐसी डिक्री की रकम या उसका मूल्य दस हजार रुपए से अधिक नहीं है तो, केवल विधि के प्रश्न के संबंध में ही होगी।