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आपराधिक कानून
दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961: उच्चतम न्यायालय के 2026 के निदेश
« »26-Aug-2026
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"बहुत से लोग जो खुलेआम दहेज मांगते और देते हैं, वे बिना किसी सजा के बच जाते हैं... दुर्भाग्य से यह प्रथा समाज में गहरी जड़ें जमा चुकी है, इसलिये इसमें तुरंत परिवर्तन आना संभव नहीं है, अपितु इसमें शामिल सभी पक्षकारों, चाहे वह विधायिका हो, न्यायपालिका हो, विधि प्रवर्तन एजेंसियां हों, नागरिक समाज संगठन हों आदि, की ओर से ठोस प्रयास की आवश्यकता है।" न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने दहेज संबंधी अपराधों से जुड़ी विधियों के कार्यान्वयन को मजबूत करने के लिये 20 अगस्त, 2026 को व्यापक निदेश जारी किये। ये निदेश तब आए जब उच्चतम न्यायालय उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अजमल बेग के मामले में 15 दिसंबर, 2025 के अपने पूर्व निर्णय के अनुपालन पर विचार कर रहा था ।
पृष्ठभूमि क्या थी?
- न्यायालय धारा 304-ख और धारा 498-क, भारतीय दण्ड संहिता और दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 के अधीन अभियोजनों में प्रणालीगत विलंब और अप्रभावी कार्यान्वयन को संबोधित करने वाले अपने पूर्व निर्णय के अनुपालन की निगरानी कर रहा था।
- पीठ ने स्वीकार किया कि सांविधिक सुरक्षा उपायों के होते हुए भी, दहेज से संबंधित अपराध करने वाले अक्सर कमजोर प्रवर्तन तंत्र और विचारण के लंबे विलंब के कारण जवाबदेही से बच निकलते हैं।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि दहेज प्रथा को समाप्त करने के लिये विधायिका, न्यायपालिका, विधि प्रवर्तन एजेंसियों और सिविल समाज के समन्वित और निरंतर प्रयास की आवश्यकता है ।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- लगातार बनी हुई प्रवर्तनीय कमियों पर:
न्यायालय ने कहा कि दहेज के संव्यवहार में खुलेआम भाग लेने वाले व्यक्ति प्राय दण्ड से बच जाते हैं, और बार-बार न्यायिक निर्णयों के होते हुए भी दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 के कार्यान्वयन में कठिनाइयाँ बनी हुई हैं। - संस्थागत कार्रवाई की आवश्यकता पर:
पीठ ने पाया कि दहेज प्रथा सामाजिक व्यवहार में गहराई से समाई हुई है, जिसके लिये अलग-थलग न्यायिक हस्तक्षेप के बजाय सभी हितधारकों के बीच केंद्रित, समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है।
उच्चतम न्यायालय द्वारा जारी प्रमुख दिशा-निर्देश
1. संस्थागत सहायता तंत्रों को सुदृढ़ बनाना:
राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को दहेज निषेध अधिकारियों के प्रभावी कामकाज को सुनिश्चित करना चाहिये और निम्नलिखित को सुदृढ़ बनाना चाहिये:
- वन स्टॉप सेंटर
- परिवार परामर्श केंद्र
- महिला सहायता डेस्क
- पीड़ित सहायता तंत्र, हेल्पलाइन और ऑनलाइन शिकायत निवारण प्रणाली
2. जागरूकता और शैक्षिक उपाय:
शिक्षा विभागों, महिला एवं बाल विकास विभागों और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों के समन्वय से दहेज की सामाजिक बुराई, लैंगिक समानता, सांविधानिक मूल्यों और महिलाओं के अधिकारों पर सतत संवेदीकरण कार्यक्रम।
3. मामलों का प्राथमिकता वर्गीकरण और निगरानी:
न्यायालयों को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 304-ख/498-क (धारा 80/85 भारतीय न्याय संहिता) के अधीन आने वाले मामलों को प्राथमिकता देनी चाहिये। जिला न्यायपालिका को तीन वर्ष से अधिक समय से लंबित मामलों की पहचान करके उनकी आवधिक मासिक/त्रैमासिक समीक्षा करनी चाहिये।
4. परीक्षण की समयबद्ध प्रगति:
- आरोप पत्र दाखिल होने के बाद अभियुक्त की तत्काल उपस्थिति।
- आरोप विरचित करने की प्रक्रिया अधिमानतः 60-90 दिनों के भीतर पूरी हो जानी चाहिये।
- दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 309/भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 346, 2023 के अधीन साक्ष्यों की निरंतर, दिन-प्रतिदिन रिकॉर्डिंग।
5. स्थगन का नियमन और साक्षी प्रबंधन:
- स्थगन केवल अभिलिखित किये गए कारणों के लिये ही किया जाएगा।
- प्रतिरक्षा पक्ष के अधिवक्ता की बार-बार अनुपस्थिति की स्थिति में विधिक सहायता अधिवक्ता/अमिकस क्यूरी की नियुक्ति।
- आरोप विरचित होने के तुरंत बाद साक्षियों की सूची तैयार करना।
6. प्रौद्योगिकी और डिजिटल निगरानी का उपयोग:
उच्च न्यायालय मौजूदा CIS बुनियादी ढाँचे के भीतर चरण-वार लंबित मामलों की ट्रैकिंग, डिजिटल डैशबोर्ड और पुराने लंबित मामलों के लिये स्वचालित अलर्ट को एकीकृत करेंगे।
7. उच्च न्यायालयों के समक्ष लंबित मामलों का पुनर्विलोकन :
लंबित आपराधिक अपीलों, पुनरीक्षणों, धारा 482 दण्ड प्रक्रिया संहिता/धारा 528 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता याचिकाओं और जमानत मामलों, विशेष रूप से स्थगित विचारण कार्यवाही से संबंधित मामलों की आवधिक पुनर्विलोकन।
8. प्रशिक्षण, संवेदीकरण और विशेषीकृत अभियोजन:
न्यायिक अकादमियों और पुलिस प्रशिक्षण संस्थानों के माध्यम से न्यायिक अधिकारियों, पुलिस अधिकारियों, अभियोजकों, सुरक्षा अधिकारियों और परामर्शदाताओं के लिये आवधिक प्रशिक्षण।
9. वैवाहिक विवादों के उचित मामलों में मध्यस्थता/परामर्श:
न्यायालय वैवाहिक कलह के उन मामलों में मध्यस्थता का विकल्प तलाश सकते हैं जिनमें मृत्यु, गंभीर हिंसा या अन्य गंभीर अपराध शामिल न हों - संज्ञेय अपराधों की गंभीरता से समझौता किये बिना।
10. अनुपालन एवंआवधिक रिपोर्टिंग:
सभी उच्च न्यायालयों और राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को प्रत्येक वर्ष 15 जनवरी, 15 मई और 15 सितंबर को लंबित मामलों की स्थिति, चरण-वार स्थिति और प्रशिक्षण/जागरूकता उपायों सहित स्थिति/अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करनी होगी, जब तक कि लंबित मामलों की संख्या में पर्याप्त कमी न आ जाए।
दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 क्या है?
परिचय:
- दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 भारत में दहेज देने, लेने और मांगने पर रोक लगाने के लिये बनाया गया एक केंद्रीय विधान है। यह 1 जुलाई 1961 से लागू हुआ और पूरे भारत पर लागू होता है (जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के बाद, यह वहाँ भी लागू होता है, क्योंकि पहले इसके लिये पृथक् राज्य विधि थी)।
- यह अधिनियम दहेज मृत्यु और महिलाओं के उत्पीड़न पर बढ़ती सामाजिक चिंता और भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के अनुरूप अधिनियमित किया गया था, लेकिन ऐतिहासिक रूप से इसे कमजोर प्रवर्तन के लिये आलोचना का सामना करना पड़ा है - एक चिंता जिसे उच्चतम न्यायालय ने बार-बार उठाया है, हाल ही में उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अजमल बेग (2026) में।
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धारा |
उपबंध |
मुख्य बिंदु |
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2 |
दहेज की परिभाषा |
विवाह के संबंध में विवाह से पूर्व, विवाह के समय या विवाह के पश्चात दी जाने वाली संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति। मुस्लिम मेहर को इसमें शामिल नहीं किया जाता। |
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3 |
दहेज देना/लेना |
न्यूनतम 5 वर्ष का कारावास तथा कम से कम ₹15,000 या दहेज के मूल्य, जो भी अधिक हो, के समान जुर्माने। सद्भावपूर्वक दिये गए, विधि के अनुसार सूचीबद्ध एवं अत्यधिक न होने वाले उपहारों को छूट प्राप्त है। |
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4 |
दहेज की मांग |
दण्ड : 6 महीने से 2 साल तक की कैद + 10,000 रुपये तक का जुर्माना। |
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4-क |
विज्ञापन प्रतिबंध |
विवाह के बदले धन/संपत्ति देने वाले विज्ञापनों पर प्रतिबंध। दण्ड: 6 महीने से 5 वर्ष तक का कारावास + 15,000 रुपए तक का जुर्माना। |
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5 |
करार का शून्य होना |
दहेज देने या लेने संबंधी कोई भी करार आरंभ से ही शून्य (Void ab initio) होगा। |
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6 |
पत्नी के लाभ के लिये दहेज |
दहेज में प्राप्त संपत्ति को 3 माह के भीतर पत्नी को अंतरित किया जाना आवश्यक है। पत्नी की प्राप्ति से पूर्व मृत्यु होने की स्थिति में यह उसके उत्तराधिकारियों/संतानों/माता-पिता को अंतरित होगा। |
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7 |
संज्ञान |
अपराध का संज्ञान पुलिस रिपोर्ट अथवा पीड़ित व्यक्ति, उसके संबंधी या मान्यता-प्राप्त कल्याण संस्था द्वारा कीये गए परिवाद पर लिया जा सकता है। विचारण प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट या उससे उच्च स्तर के अधिकारी द्वारा किया जाता है। |
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8 |
अपराध की प्रकृति |
अपराध अजमानतीय तथा अशमनीय है। |
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8-क |
सबूत का भार |
अपराध का उल्टा भार — अभियुक्त को यह साबित करना होगा कि उसने कोई अपराध नहीं किया है। |
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8-ख |
दहेज प्रतिषेध अधिकारी |
राज्य द्वारा नियुक्त अधिकारी, जिनका दायित्व दहेज के अपराधों की रोकथाम तथा साक्ष्य एकत्र करना है। उन्हें सलाहकार बोर्डों द्वारा सहायता प्रदान की जाती है। |
संबंधित आपराधिक उपबंध
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पुरानी विधि |
नई विधि |
विषय |
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भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 304-ख |
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 80 |
दहेज मृत्यु |
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भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 498-क |
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85 |
पति या उसके नातेदारों द्वारा क्रूरता |
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भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 113-ख |
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 118 |
दहेज मृत्यु के संबंध में उपधारणा |