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सिविल कानून
दू अविभाजित परिवार (HUF) के सबूत के अभाव में पुत्र का सहदायिकी संपत्ति पर दावा विफल
« »25-Aug-2026
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देवराम बनाम खेतारामऔर अन्य "एक बार धारा 8 के अधीन उत्तराधिकार हो जाने के बाद, उत्तराधिकारी अपनी-अपनी व्यक्तिगत क्षमता में संपत्ति के उत्तराधिकारी बनते हैं और इस प्रकार हस्तांतरित संपत्ति को केवल पक्षकारों के पूर्व संबंधों के आधार पर संयुक्त परिवार की संपत्ति नहीं माना जा सकता है।" न्यायमूर्ति फरजंद अली |
स्रोत: राजस्थान उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति फरजंद अली की पीठ ने देवराम बनाम खेताराम और अन्य (2026) के मामले में यह अभिरनिर्धारित किया कि एक पुत्र हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 8 के अधीन अपने पिता द्वारा विरासत में मिली संपत्ति में स्वतंत्र सहदायिकी हिस्सेदारी का दावा नहीं कर सकता है, जब तक कि यह दर्शाने वाले अभिवचन न हों कि संपत्ति हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) या सहदायिकी संपत्ति का चरित्र बरकरार रखती है।
देवराम बनाम खेतराम और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- कृषि भूमि मूल रूप से अपीलकर्त्ता के दादा को आवंटित की गई थी, जो दादा के तीन पुत्रों (प्रत्यर्थियों) को विरासत में मिली, जिनमें अपीलकर्त्ता के पिता (प्रत्यर्थी संख्या 1) भी शामिल हैं।
- अपीलकर्त्ता ने आरोप लगाया कि प्रत्यर्थियों ने उसकी सहमति के बिना विक्रय विलेखों के माध्यम से भूमि का हस्तांतरण कर दिया।
- अपीलकर्त्ता ने दावा किया कि प्रत्यर्थी संख्या 1 का वैध पुत्र होने के नाते, उसने जन्म से ही संपत्ति में सहदायिकी हित प्राप्त कर लिया था, और तदनुसार उसने संपत्ति के हस्तांतरण को चुनौती दी।
- अधिकारों की घोषणा, स्थायी व्यादेश और विक्रय विलेखों को रद्द करने की मांग करते हुए एक वाद विचारण न्यायालय के समक्ष दायर किया गया था।
- विचारण न्यायालय ने इस आधार पर वाद खारिज कर दिया कि सक्षम राजस्व न्यायालय द्वारा अपीलकर्त्ता के खातेदारी अधिकारों की घोषणा नहीं की गई थी।
- अपीलकर्त्ता ने विचारण न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध यह प्रथम अपील दायर की है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- धारा 8 के अधीन हस्तांतरित संपत्ति की प्रकृति पर: न्यायालय ने माना कि एक बार हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के अधीन उत्तराधिकार हो जाने पर, उत्तराधिकारी अपनी व्यक्तिगत क्षमता में उत्तराधिकार प्राप्त करते हैं, और इस प्रकार हस्तांतरित संपत्ति को केवल पक्षकारों के बीच पूर्व के संबंध के आधार पर संयुक्त परिवार की संपत्ति नहीं माना जा सकता है।
- अधिनियम की धारा 4 के संबंध में: न्यायालय ने टिप्पणी की कि किसी व्यक्ति के पक्ष में सहदायिकी अधिकार स्थापित करने या संपत्ति को पैतृक संपत्ति के रूप में परिभाषित करने के लिये धारा 4 पर अकेले विश्वास नहीं किया जा सकता। संपत्ति का स्वरूप अधिग्रहण के स्रोत, पूर्वजों द्वारा अर्जित अधिकारों की प्रकृति और उत्तराधिकारियों को प्राप्त अधिकारों के आधार पर स्वतंत्र रूप से निर्धारित किया जाना चाहिये।
- हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) से संबंधित अभिवचनों के अभाव में: न्यायालय को वादपत्र में ऐसा कोई अभिवचन नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि प्रत्यर्थियों के पास रहते हुए भी संपत्ति हिंदू अविभाजित परिवार या सहदायिकी संपत्ति बनी हुई थी। ऐसे अभिवचनों के अभाव में, प्रत्यर्थी संख्या 1 के साथ अपने संबंध के आधार पर अपीलकर्त्ता का सहदायिकी अधिकार का दावा निराधार माना गया।
- हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) की स्थिति की उपधारणा पर: न्यायालय ने यह माना कि केवल इसलिये कि अपीलकर्त्ता मूल आबंटिती का वंशज है, संपत्ति को हिंदू अविभाजित परिवार या सहदायिकी संपत्ति नहीं माना जा सकता है।
- अपीलकर्त्ता के विभाजन की मांग करने के अधिकार पर: न्यायालय ने माना कि किसी विनिर्दिष्ट अभिवचन या सामग्री के अभाव में, जो यह स्थापित करती हो कि संपत्ति किसी पूर्व-मौजूद हिंदू अविभाजित परिवार या विद्यमान सहदायिकी संपत्ति का हिस्सा थी, अपीलकर्त्ता जन्म से स्वतंत्र 1/9वां सहदायिकी हिस्सा का दावा नहीं कर सकता था, और इसलिये उसके पिता के जीवनकाल के दौरान विभाजन की मांग करने का कोई विधिक रूप से लागू करने योग्य अधिकार नहीं था।
- सिविल न्यायालय की अधिकारिता पर: न्यायालय ने यह माना कि कोई सिविल न्यायालय केवल इसलिये अधिकारिता ग्रहण नहीं कर सकता क्योंकि वाद घोषणा, निरस्तीकरण और व्यादेश के रूप में प्रस्तुत किया गया है। चूँकि अपीलकर्त्ता ने सक्षम राजस्व न्यायालय से अपने खातेदारी अधिकारों की घोषणा प्राप्त नहीं की थी, इसलिये सिविल न्यायालय रजिस्ट्रीकृत खातेदारों द्वारा किये गए हस्तांतरण की वैधता की जांच करने के लिये ऐसे अधिकारों के अस्तित्व को नहीं मान सकता था।
- तदनुसार अपील खारिज कर दी गई और विचारण न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा गया, न्यायालय ने माना कि अपीलकर्त्ता का मामला मूल और अधिकारिता संबंधी दोनों आधारों पर विफल रहा।
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 क्या है?
पृष्ठभूमि एवं उद्देश्य:
- हिंदुओं में बिना वसीयत के उत्तराधिकार से संबंधित विधि में संशोधन और उसे संहिताबद्ध करने के लिये अधिनियमित किया गया।
- यह नियम हिंदुओं, बौद्धों, जैनियों और सिखों पर लागू होता है और वसीयत की अनुपस्थिति में संपत्ति के उत्तराधिकार को नियंत्रित करता है।
इस मामले से संबंधित प्रमुख उपबंध :
- धारा 4 (अध्यारोही प्रभाव): यह अधिनियम उन मामलों में किसी भी पूर्ववर्ती हिंदू विधि, ग्रंथ, नियम या प्रथा पर अध्यारोही प्रभाव प्रदान करता है जिनके लिये अधिनियम उपबंध करता है, लेकिन यह स्वयं से अर्जित संपत्ति को पैतृक/सहदायिकी संपत्ति में परिवर्तित नहीं करता है।
- धारा 8 (पुरुषों की दशा में उत्तराधिकार के साधारण नियम): इसमें उपबंधित किया है कि निर्वसीयत मरने वाले हिंदू पुरुष की संपत्ति सर्वप्रथम अनुसूची के प्रथम वर्ग के उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित होती है; ऐसे उत्तराधिकारी संपत्ति को अपनी व्यक्तिगत क्षमता में प्राप्त करते हैं, न कि संयुक्त परिवार की संपत्ति के रूप में।
- सहदायिकी संपत्ति: एक अटूट श्रृंखला में पुरुष वंश की चार पीढ़ियों तक विरासत में मिली संपत्ति, जिसमें सहदायिकों को जन्म से ही हिस्सा प्राप्त होता है; यह धारा 8 के अधीन उत्तराधिकारी के व्यक्तिगत, स्व-अर्जित हिस्से के रूप में प्राप्त होने वाली संपत्ति से भिन्न है।
- हिंदू अविभाजित परिवार (HUF): एक विधिक इकाई जिसमें एक ही पूर्वज से वंशानुगत रूप से जुड़े सभी व्यक्ति शामिल होते हैं, जिनमें पत्नियां और अविवाहित पुत्रियाँ भी शामिल हैं; हिंदू अविभाजित परिवार का दर्जा विशेष रूप से अभिवचन के रूप में प्रस्तुत और साबित किया जाना चाहिये, और केवल वंश के आधार पर इसे मान नहीं लिया जाता है।