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पारिवारिक कानून

घरेलू हिंसा अधिनियम के अधीन क्षमा किये गए भरण-पोषण के दावे को पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता है

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 25-Aug-2026

रेजी बेबी बनाम सुबी मैरी 

"बाद की कार्यवाही के माध्यम से ऐसे दावों को पुनर्जीवित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।" 

न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति मनमोहन 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ नेरेजी बेबी बनाम सुबी मैरी (2026) के मामलेमेंपत्नी और पुत्री द्वारा पति के विरुद्ध शुरू की गई घरेलू हिंसा अधिनियम की कार्यवाही को रद्द कर दियायह मानते हुए कि एक पत्नी जिसने कुटुंब न्यायालय के समक्ष एक समझौता करार और बाद के शपथपत्र के माध्यम से भरण-पोषण सहित सभी मौद्रिक दावों को स्वेच्छा से त्याग दिया हैघरेलू हिंसा अधिनियम की कार्यवाही के माध्यम से ऐसे दावों को पुनर्जीवित नहीं कर सकती है। 

रेजी बेबी बनाम सुबी मैरी (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • पति (अपीलकर्त्ता) और पत्नी (प्रत्यर्थी संख्या 1) ने 2016 में एक समझौता करार पर हस्ताक्षर कियेजिसके अधीन पत्नी ने विशेष रूप से पति के विरुद्ध किसी भी प्रकार का मौद्रिक या भरण-पोषण का दावा न करने पर सहमति व्यक्त की। 
  • समझौते के अनुसारविवाह-विच्छेद अधिनियम, 1869 की धारा 10क के अधीन तलाक के लिये एक संयुक्त आवेदन दायर किया गया था और 2017 में तलाक का आदेश पारित किया गया था। 
  • इसके बाद पत्नी और पुत्री (प्रत्यर्थी संख्या 2) ने घरेलू हिंसा अधिनियम के अधीन परिवाद दर्ज कराया 
  • पति ने केरल उच्च न्यायालय के समक्ष शिकायत को रद्द करने की मांग कीजिसने उनकी याचिका खारिज कर दीजिसके परिणामस्वरूप सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष यह अपील दायर की गई है। 
  • पति ने तर्क दिया कि घरेलू हिंसा अधिनियम की कार्यवाही सभी विवादों के निपटारे के बाद शुरू की गई थीपत्नी ने स्पष्ट रूप से मौद्रिक दावों को त्याग दिया थाऔर पुत्री को पहले ही दो संपत्तियों के रूप में प्रतिकर मिल चुका था जिन्हें उसने बेच दिया था। 
  • प्रत्यर्थियों ने तर्क दिया कि समझौता करार दबाव में किया गया था क्योंकि पत्नी अमेरिका में प्रवास करने के लिये शीघ्र तलाक चाहती थीकि भरण-पोषण प्रावधान का अभाव ही जबरदस्ती का संकेत थाऔर सांविधिक और मौलिक अधिकारों का त्याग लोकनीति के विरुद्ध होने के कारण शून्य था। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • समझौता करार और शपथपत्र पर:न्यायालय ने कहा कि पत्नी ने न केवल समझौता करार पर हस्ताक्षर किये थेअपितु कुटुंब न्यायालय के समक्ष एक शपथपत्र भी दायर किया था जिसमें उसने भरण-पोषण के अपने दावे को त्यागने की बात दोहराई थी और इस बात की पुष्टि की थी कि तलाक की याचिका स्वेच्छा सेबिना किसी प्रपीड़न या असम्यक् असर के दायर की गई थी। 
  • नए वाद-हेतुक की अनुपस्थिति पर:न्यायालय ने पाया कि घरेलू हिंसा अधिनियम का परिवाद समझौता करार से पहले के कथित कृत्यों से संबंधित थाऔर तलाक के बाद उत्पन्न होने वाले किसी भी नए वाद-हेतुक का उल्लेख नहीं किया गया था। 
  • दबाव के अभिवचन के आधार पर:न्यायालय ने कहा कि यद्यपि प्रत्यर्थियों ने दबाव के आधार पर समझौता करार और तलाक की डिक्री को चुनौती देने की मांग की थीलेकिन पत्नी ने डिक्री को अपास्त करने या समझौता करार को अमान्य घोषित करने की मांग के लिये कोई कार्यवाही संस्थित नहीं की थी। 
  • सचेत और स्वैच्छिक निष्पादन पर:न्यायालय ने माना कि किसी भी विधिक चुनौती के अभाव मेंकेवल प्रपीड़न के आरोप पर्याप्त नहीं हो सकतेऔर जो पक्षकार सुशिक्षित हैं और अपने अधिकारों से अवगत हैंउन्हें समझौता करार और संयुक्त तलाक याचिका पर सचेत और स्वैच्छिक रूप से हस्ताक्षर करने वाला माना जाना चाहिये 
  • पहले से तय दावों को पुनर्जीवित करने के विरुद्ध पूर्व निर्णय के संबंध में:न्यायालय नेधनंजय राठी बनाम रुचिका राठी के मामलेपर विश्वास कियाजहाँ उसने पक्षकारों के बीच वैध समझौते के होते हुए भि घरेलू हिंसा अधिनियम की कार्यवाही शुरू करने की प्रथा की निंदा की थी। 
  • पुत्री के स्वतंत्र अधिकार पर:न्यायालय ने माना कि चूँकि समझौता करार केवल पति और पत्नी के बीच निष्पादित किया गया थाऔर पुत्री (जो इसके निष्पादन से पहले बालिग हो चुकी थी) इसकी पक्षकार नहीं थीइसलिये यह नहीं कहा जा सकता कि पुत्री ने मौद्रिक दावों के अपने अधिकार को त्याग दिया था। 
  • उच्चतम न्यायालय ने केरल उच्च न्यायालय के निर्णय को अपास्त कर दिया और कलामासेरी के प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित कार्यवाही को निरस्त कर दियासाथ ही यह स्पष्ट किया कि पुत्री को आर्थिक अनुतोष की मांग करते हुए नई कार्यवाही शुरू करने की स्वतंत्रता रहेगीजिसका निर्णय मामले की गुण-दोष के आधार पर किया जाएगा।  

घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 क्या है? 

पृष्ठभूमि एवं उद्देश्य: 

  • यह एक सामाजिक हितैषी विधि है जिसे महिलाओं को हर प्रकार की घरेलू हिंसा से बचाने के लिये अधिनियमित किया गया है। 
  • इसे 26 अक्टूबर 2006 को लागू किया गया था। 
  • यह परिवार के भीतर होने वाली किसी भी प्रकार की हिंसा की शिकार महिलाओं के अधिकारों को प्रभावी संरक्षण प्रदान करता है।  
  • अधिनियम की उद्देशिका में यह स्पष्ट किया गया है कि इसका दायरा हिंसा पर भी लागू होता है - चाहे वह शारीरिकलैंगिकमौखिकभावनात्मक या आर्थिक हो - और इन सभी का निवारण इस संविधि के अधीन किया जाएगा। 

उद्देश्य: 

  • इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य महिलाओं के सांविधानिक अधिकारों को अधिक प्रभावी ढंग से संरक्षित करना और उन्हें परिवार के भीतर होने वाली किसी भी प्रकार की हिंसा से बचाना है। 
  • यह महिलाओं के अधिकारों को लागू करने का उपचार प्रदान करता हैजिसमें निवासभरण-पोषणअभिरक्षासंरक्षण और प्रतिकर का अधिकार शामिल है। 

घरेलू हिंसा (धारा 3): 

  • अधिनियम की धारा के अधीन "घरेलू हिंसा" शब्द को व्यापक रूप से परिभाषित किया गया है। 
  • कोई भी ऐसा कार्यलोप या आचरण जिससे पीड़ित व्यक्ति के स्वास्थ्यसुरक्षाजीवनअंग या मानसिक या शारीरिक कल्याण को हानिक्षति या खतरा होघरेलू हिंसा कहलाता है। 
  • यहाँ तक ​​कि दहेज या अन्य संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति की किसी भी विधिविरुद्ध मांग को पूरा करने के लिये उत्पीड़नधमकी या दबाव डालना भी इसके अंतर्गत आता है। 
  • इस प्रकारघरेलू हिंसा में वह सब कुछ शामिल है जो पीड़ित महिला को मानसिकशारीरिकभावनात्मकलैंगिक या आर्थिक रूप से नुकसान पहुँचाता है या पहुँचाने की प्रवृत्ति रखता है। 

इस मामले से संबंधित प्रमुख अवधारणाएँ: 

  • आर्थिक शोषण:इसमें पीड़ित व्यक्ति को उन वित्तीय संसाधनों से वंचित करना शामिल हैजिनका वह हकदार हैजिसमें भरण-पोषण भी शामिल है। 
  • मौद्रिक अनुतोष :यह अधिनियम के अंतर्गत एक ऐसा उपचार है जो अन्य व्यक्तिगत विधियों के अंतर्गत भरण-पोषण से भिन्न हैलेकिन वैधस्वैच्छिक समझौते की स्थिति में छूट के सिद्धांतों के अधीन है। 
  • समझौता करारों के साथ परस्पर क्रिया:न्यायालय ने निरंतर यह माना है कि घरेलू हिंसा अधिनियम की कार्यवाही का उपयोग उन दावों को फिर से उठाने के लिये नहीं किया जा सकता है जो एक वैधस्वैच्छिक समझौते का विषय थेजब तक कि कोई नया वाद-हेतुक न हो या उस समझौते को विधिक रूप से सफलतापूर्वक चुनौती न दी गई हो।